पाठ-13
कलीसिया के नियम
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ईश्वर ने मूसा द्वारा पुराने विधान की जनता को आज्ञा दी थी। वे हैं इस्राएली जनता। उनकी संतान भी इन आज्ञाओं का पालन करने को बाध्य थी। नये विधान में कलीसिया की संतान भी इन आज्ञाओं का पालन करने को बाध्य है। हम सब नये इस्राएल के सदस्य हंै। पुराने विधान में दी गई आज्ञाओं की इसा ने नये विधान में व्याख्या की और उन्हें पूर्ण कर दिया।
ईश्वर ने मूसा द्वारा पुराने विधान की जनता को आज्ञा दी थी। वे हैं इस्राएली जनता। उनकी संतान भी इन आज्ञाओं का पालन करने को बाध्य थी। नये विधान में कलीसिया की संतान भी इन आज्ञाओं का पालन करने को बाध्य है। हम सब नये इस्राएल के सदस्य हंै। पुराने विधान में दी गई आज्ञाओं की इसा ने नये विधान में व्याख्या की और उन्हें पूर्ण कर दिया।
कलीसिया के नियम
कालांतर में कलीसिया में कुछ नियमों का रूप-धारण हुआ; वे हैं कलीसिया के नियम। इन नियमों का उद्देष्य समझकर उनका सही पालन करने का कर्तव्य कलीसिया के हर सदस्य का है।1. रविवारों और हुक्म पर्वों में पवित्र बलिदान में भाग लेना है। ऐसा कोई काम नहीं करना जो उन दिनों की पवित्रता को भंग करे।ईश्वर की दस आज्ञाओं में तीसरी से इसका सम्बन्ध है। कलीसिया की सर्वोच्च आराधना है पवित्र बलिदान। पवित्र बलिदान में भाग लेना और परम प्रसाद ग्रहण करना एक ईसाई के जीवन का बहुमूल्य अनुभव है। पवित्र बलिदान से जो षक्ति मिलती है वही हमें पवित्र जीवन बिताने की क्षमता देती है। रविवार के दिनों में पवित्र बलिदान में भाग लेना कलीसिया के सदस्यों का कर्तव्य है। कलीसिया का निर्देष है कि हम पवित्र बलिदान में पूर्ण रूप से भाग लें। संभव हो तो अपने ही पैरिष में पवित्र बलिदान में भाग लेना चाहिए। पैरिष के समूह के विकास और एकता के लिए यह अनिवार्य है।कलीसिया के साथ विचार करने और उसके साथ कार्य करने के अवसर के रूप में रविवार को देखना चाहिए। ईश्वर की आराधना में भाग लेने और दया के कार्यों में लगे रहने के लिए ही कलीसिया उस दिन अन्य काम नहीं करने का अनुरोध करती है। रविवार के जैसे ही हुक्म पर्वों को भी मानने का अनुरोध इस नियम के द्वारा कलीसिया हमसे करती है।2. कम से कम साल में एक बार मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करना और पास्का के समय योग्य रीति से परम प्रसाद स्वीकार करना चाहिए।संस्कारों को ग्रहण करना खी्रस्तीय जीवन में बहुत अनिवार्य है। पापों की क्षमा के लिए बीच बीच में मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करने का निर्देष कलीसिया देती है। लेकिन यदि कोई किसी कारणवष ऐसा नहीं कर सका तो उसे कम से कम साल में एक बार मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करके परम प्रसाद ग्रहण करना चाहिए - यही इस नियम का सारांष है। इसलिए कलीसिया पास्का समय इसके लिए प्रस्तुत करती है। पास्का समय का तात्पर्य है बड़े उपवास काल के आरंभ से लेकर पवित्र त्रित्व के पर्व के पिछले दिन तक की अवधि। इस काल के पवित्र या बड़े सप्ताह में कलीसिया मुक्ति के रहस्यों की विषेश रूप से याद करती है। इसीलिए इस अवधि में निष्चित रूप से मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करने के लिए कलीसिया अनुरोध करती है।3. निर्धारित दिनों में उपवास करना और वर्जित भोज्य वस्तुओं को त्यागना।उपवास और परहेज करना ख्रीस्तीय जीवन के अंष हैं। सभी सदस्यों को इसका पालन करना चाहिए; इसलिए कलीसिया विषेश दिन और काल निर्धारित करती है। उन दिनों में उपवास करना हर ईसाई का फर्ज है। षुक्रवार के दिन मांस का परहेज़ करने के लिए कलीसिया आदेश देती है। कलीसिया आह्वान करती है कि ईसाई बड़े उपवास काल में मांसाहार त्यागने के साथ-साथ कुछ विशेष भोज्य वस्तु को भी वर्जित करें और कुछ विषेश तपसचर्या अपनाएँ। ये ख्रीस्तीय जीवन को मजबूत बनाते हंै।4. प्रतिबंधित कालों में विवाह समारोह आयोजित करना और कलीसिया द्वारा प्रतिबंधित लोगों से विवाह करना मना है।उपवासकाल परित्याग के दिन हैं, समारोहों के अवसर नहीं है। इसलिए इस काल में विवाह समारोह और अन्य उत्सव मनाने की अनुमति नहीं है। उसी प्रकार कलीसिया यह चाहती है कि उन लोगों के साथ विवाह किया जाए जो कलीसिया के नियमों का पालन करते हैं। किसी न किसी कारण से कलीसिया द्वारा प्रतिबंधित व्यक्तियों से विवाह करने की अनुमति कलीसिया के सदस्यों को नहीं है। यही है इस नियम का सारांष।5. पल्ली और पल्ली-पुरोहितों को धर्माध्यक्ष द्वारा निर्धारित दषमांष या राषी और अन्य हिस्सा देना है।यह नियम हमें याद दिलाता है कि पल्ली का संरक्षण, पल्ली के सेवकों का परिपालन और गरीबों का संरक्षण करना कलीसियाई समूह का फर्ज है। विष्वासियों को एकत्र होने का और पवित्र बलिदान अर्पित करने का स्थान है पल्ली। ईश्वर की आराधना करने के लिये देवालय बनाने का कर्तव्य विष्वासियों का है। देवालय के सभी खर्च भी उन्हें उठाना है। पैरिष-समूह की सुस्थिति एवं उन्नति का केन्द्र भी है देवालय। इसलिए देवालय की आवश्यकता के अनुसार आर्थिक सहयोग देना हर विष्वासी का फर्ज है।विष्वासियों के प्रति देवालय में सेवा-षुश्रूशा के लिए नियुक्त हंै पुरोहित। उन के अलावा देवालय की सेवा-षुश्रूशा से जुड़े हुए अन्य लोग भी कलीसिया में हंै। उन की भी देख-भाल करना विष्वासियों का कर्तव्य है। इसलिए धर्माध्यक्ष यह निर्धारित करते हैं कि प्रत्येक संदर्भ में हमें पल्ली को, पल्ली-पुरोहितों तथा अन्य सेवकों और गरीबों को कितना हिस्सा देना है। इसको दषमांष कहते हंै। इस को यथासमय देना विष्वासी का कर्तव्य है।ईश्वर की दस आज्ञाएँ कभी नहीं बदलती हैं; मगर कलीसिया के पाँच नियमों में काल, प्रदेष और संस्कृति के अनुरूप बदलाव हो सकता है। केवल संत पापा और धर्माध्यक्षों को ही इसमें बदलाव लाने का अधिकार है।कलीसिया के सदस्यों के आध्यात्मिक विकास के अलावा एकता और अनुषासन के लिए भी ये नियम मददगार हैं। माता कलीसिया द्वारा अपनी संतानों को दिए जाने वाले अच्छे निर्देषों के रूप में इन्हें स्वीकार करना चाहिए। जब हम आज्ञाकारिता के मनोभाव और निश्ठा से कलीसियाई नियमों का पालन करते हैं तब हम कलीसिया की संतान एवं ईश्वर की संतान बन जाते हैं।कलीसिया के नियम
कालांतर में कलीसिया में कुछ नियमों का रूप-धारण हुआ; वे हैं कलीसिया के नियम। इन नियमों का उद्देष्य समझकर उनका सही पालन करने का कर्तव्य कलीसिया के हर सदस्य का है।1. रविवारों और हुक्म पर्वों में पवित्र बलिदान में भाग लेना है। ऐसा कोई काम नहीं करना जो उन दिनों की पवित्रता को भंग करे।ईश्वर की दस आज्ञाओं में तीसरी से इसका सम्बन्ध है। कलीसिया की सर्वोच्च आराधना है पवित्र बलिदान। पवित्र बलिदान में भाग लेना और परम प्रसाद ग्रहण करना एक ईसाई के जीवन का बहुमूल्य अनुभव है। पवित्र बलिदान से जो षक्ति मिलती है वही हमें पवित्र जीवन बिताने की क्षमता देती है। रविवार के दिनों में पवित्र बलिदान में भाग लेना कलीसिया के सदस्यों का कर्तव्य है। कलीसिया का निर्देष है कि हम पवित्र बलिदान में पूर्ण रूप से भाग लें। संभव हो तो अपने ही पैरिष में पवित्र बलिदान में भाग लेना चाहिए। पैरिष के समूह के विकास और एकता के लिए यह अनिवार्य है।कलीसिया के साथ विचार करने और उसके साथ कार्य करने के अवसर के रूप में रविवार को देखना चाहिए। ईश्वर की आराधना में भाग लेने और दया के कार्यों में लगे रहने के लिए ही कलीसिया उस दिन अन्य काम नहीं करने का अनुरोध करती है। रविवार के जैसे ही हुक्म पर्वों को भी मानने का अनुरोध इस नियम के द्वारा कलीसिया हमसे करती है।2. कम से कम साल में एक बार मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करना और पास्का के समय योग्य रीति से परम प्रसाद स्वीकार करना चाहिए।संस्कारों को ग्रहण करना खी्रस्तीय जीवन में बहुत अनिवार्य है। पापों की क्षमा के लिए बीच बीच में मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करने का निर्देष कलीसिया देती है। लेकिन यदि कोई किसी कारणवष ऐसा नहीं कर सका तो उसे कम से कम साल में एक बार मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करके परम प्रसाद ग्रहण करना चाहिए - यही इस नियम का सारांष है। इसलिए कलीसिया पास्का समय इसके लिए प्रस्तुत करती है। पास्का समय का तात्पर्य है बड़े उपवास काल के आरंभ से लेकर पवित्र त्रित्व के पर्व के पिछले दिन तक की अवधि। इस काल के पवित्र या बड़े सप्ताह में कलीसिया मुक्ति के रहस्यों की विषेश रूप से याद करती है। इसीलिए इस अवधि में निष्चित रूप से मेल-मिलाप संस्कार स्वीकार करने के लिए कलीसिया अनुरोध करती है।3. निर्धारित दिनों में उपवास करना और वर्जित भोज्य वस्तुओं को त्यागना।उपवास और परहेज करना ख्रीस्तीय जीवन के अंष हैं। सभी सदस्यों को इसका पालन करना चाहिए; इसलिए कलीसिया विषेश दिन और काल निर्धारित करती है। उन दिनों में उपवास करना हर ईसाई का फर्ज है। षुक्रवार के दिन मांस का परहेज़ करने के लिए कलीसिया आदेश देती है। कलीसिया आह्वान करती है कि ईसाई बड़े उपवास काल में मांसाहार त्यागने के साथ-साथ कुछ विशेष भोज्य वस्तु को भी वर्जित करें और कुछ विषेश तपसचर्या अपनाएँ। ये ख्रीस्तीय जीवन को मजबूत बनाते हंै।4. प्रतिबंधित कालों में विवाह समारोह आयोजित करना और कलीसिया द्वारा प्रतिबंधित लोगों से विवाह करना मना है।उपवासकाल परित्याग के दिन हैं, समारोहों के अवसर नहीं है। इसलिए इस काल में विवाह समारोह और अन्य उत्सव मनाने की अनुमति नहीं है। उसी प्रकार कलीसिया यह चाहती है कि उन लोगों के साथ विवाह किया जाए जो कलीसिया के नियमों का पालन करते हैं। किसी न किसी कारण से कलीसिया द्वारा प्रतिबंधित व्यक्तियों से विवाह करने की अनुमति कलीसिया के सदस्यों को नहीं है। यही है इस नियम का सारांष।5. पल्ली और पल्ली-पुरोहितों को धर्माध्यक्ष द्वारा निर्धारित दषमांष या राषी और अन्य हिस्सा देना है।यह नियम हमें याद दिलाता है कि पल्ली का संरक्षण, पल्ली के सेवकों का परिपालन और गरीबों का संरक्षण करना कलीसियाई समूह का फर्ज है। विष्वासियों को एकत्र होने का और पवित्र बलिदान अर्पित करने का स्थान है पल्ली। ईश्वर की आराधना करने के लिये देवालय बनाने का कर्तव्य विष्वासियों का है। देवालय के सभी खर्च भी उन्हें उठाना है। पैरिष-समूह की सुस्थिति एवं उन्नति का केन्द्र भी है देवालय। इसलिए देवालय की आवश्यकता के अनुसार आर्थिक सहयोग देना हर विष्वासी का फर्ज है।विष्वासियों के प्रति देवालय में सेवा-षुश्रूशा के लिए नियुक्त हंै पुरोहित। उन के अलावा देवालय की सेवा-षुश्रूशा से जुड़े हुए अन्य लोग भी कलीसिया में हंै। उन की भी देख-भाल करना विष्वासियों का कर्तव्य है। इसलिए धर्माध्यक्ष यह निर्धारित करते हैं कि प्रत्येक संदर्भ में हमें पल्ली को, पल्ली-पुरोहितों तथा अन्य सेवकों और गरीबों को कितना हिस्सा देना है। इसको दषमांष कहते हंै। इस को यथासमय देना विष्वासी का कर्तव्य है।ईश्वर की दस आज्ञाएँ कभी नहीं बदलती हैं; मगर कलीसिया के पाँच नियमों में काल, प्रदेष और संस्कृति के अनुरूप बदलाव हो सकता है। केवल संत पापा और धर्माध्यक्षों को ही इसमें बदलाव लाने का अधिकार है।कलीसिया के सदस्यों के आध्यात्मिक विकास के अलावा एकता और अनुषासन के लिए भी ये नियम मददगार हैं। माता कलीसिया द्वारा अपनी संतानों को दिए जाने वाले अच्छे निर्देषों के रूप में इन्हें स्वीकार करना चाहिए। जब हम आज्ञाकारिता के मनोभाव और निश्ठा से कलीसियाई नियमों का पालन करते हैं तब हम कलीसिया की संतान एवं ईश्वर की संतान बन जाते हैं।हम प्रार्थना करें
हे भले ईश्वर, हमारी भलाई के लिए कलीसिया जो नियम देती है,उन का सही चैतन्य समझकर उन के अनुसारजीवन बिताने में हमारी मद्द कीजिए।हम गायें
विष्वासियों के संगति में, विष्व के लोगो एक ही होंतारण मार्ग सबको लाने, कलीसिया ने आज्ञा दे दी।बलि के साथ ही सौभाग्य है, एक ही हो जाएं बाँट दियापष्चाताप ही कार्य से, अभ्यंजित कर बचा लेने।हृदय विषालता लोगों को, कोई मसीही खरीद लेंगेभूखा, उपवास, प्रार्थनाओं से, सत्कृत्यों को रहनो दो।कलीसिया के मनोहर तरु, तुच्छ है मनुश्य निकम्मा समानकलीसिया के साथ ही सोचें, कलीसिया के साथ ही करें।।ईष-वचन पढे़ं और वर्णन करें
मत्ती 16ः13-20मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन
“तुम पृथ्वी पर जिसका निशेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निशेधरहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भीउसकी अनुमति रहेगी।” (मत्ती 16ः19)हम करें
कलीसिया के नियम कंठस्थ कीजिए।मेरा निर्णय
कलीसिया के नियमों का पालन करते हुएमैं कलीसिया का/की निश्ठावान पुत्र/पुत्रीबनकर जीवन बिताऊँगा/गी।