• पेंतेकोस्त का दिन आया; सब षिश्य सर्वोच्च से षक्ति पाने के इंतजार में माता मरियम के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे। एकाएक आँधी-जैसी आवाज़; उससे सारा घर भर गया जहाँ वे एकत्र हुए थे। उन्होंने अग्नि की ज्वाला जैसी जीभों को अपने हर एक के ऊपर आकर ठहरते देखा। वे सब पवित्रात्मा से परिपूरित हो गए; पवित्रात्मा द्वारा प्रदत्त वरदान के अनुसार वे भिन्न-भिन्न भाशाओं में बोलने लगे। (प्रेरित चरित 2ः1-4)

                    आकाष के नीचे सभी राश्ट्रों से आये हुए धर्मी यहूदी येरुसालेम में थे। आँधी जैसी आवाज़ सुनकर वे एकत्र हो गये थे। हर एक अपनी-अपनी भाशा में षिश्यों का भाशण सुनकर विस्मित हो गया। क्योंकि भिन्न-भिन्न भाशाएँ बोलने वाले उन लोगों को षिश्यों की बात अपनी-अपनी बोली में सुनाई दे रही थी। षिश्य ईष्वर के महान कार्यों के विशय में बोल रहे थे। इसका अर्थ न समझकर लोग अचम्भे में पड़कर चकित रह गये।

     

    पेत्रुस का भाशण

     

                    उस समय पेत्रुस खडे होकर आत्मा की षक्ति से बोलने लगा, ‘‘आप मेरी बात ध्यान से सुनें और यह जान लें कि ये लोग मतवाले नहीं हैं, जैसा कि आप समझते हैं।...... यह वह बात है जिसके विशय में नबी योएल ने कहा है, ‘‘प्रभु यह कहता है - मैं अन्तिम दिनों सब षरीरधारियों पर अपना आत्मा उतारूँगाा। तुम्हारे पुत्र और पुत्रियाँ भविश्यवाणी करेंगे, तुम्हारे नवयुवकों को दिव्य दर्षन होंगे और तुम्हारे बडे-बूढे़ स्वप्न देखेंगे। मैं उन दिनों अपने दास-दासियों पर अपना आत्मा उतारूँगा और वे भविश्यवाणी करेंगे’’ (प्रेरित चरित 2: 14-21)। इसके बाद पुराने विधान से भविश्यवाणियों का सहारा लेते हुए पेत्रुस ने यह स्पश्ट किया कि ईसा ईष्वर पुत्र थे, उन्होंने अपने दुःखभोग और मृत्यु द्वारा हमें बचाया और पिता ईष्वर ने उन्हें पुनर्जीवित किया। ‘‘इस्राएल का सारा घराना यह निष्चित रूप से जान ले कि जिन्हें आप लोगों ने क्रूस पर चढाया, ईष्वर ने उन्हीं ईसा को प्रभु भी बना दिया है और मसीह भी ’’( प्रेरित चरित 2: 36)। इतना कहकर पेत्रुस ने अपना भाशण समाप्त किया।

                    लोग यह सुनकर व्याकुल हो गये और उन्होंने पेत्रुस तथा अन्य प्रेरितों से पूछा, ‘‘भाइयो, हमें क्या करना चाहिए।’’ पेत्रुस बोले, ‘‘आप लोग पष्चाताप करें। आप लोगों में प्रत्येक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए ईसा के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण करें’’ (प्रेरित चरित 2: 38)। उनकी बात सुनकर उसी दिन लगभग तीन हज़ार लोग षिश्यों में सम्मिलित हो गये। प्रभु प्रतिदिन उनके समुदाय में ऐसे लोगों को मिला देता था, जो मुक्ति प्राप्त करने वाले थे।

     

    प्रेरित संत थोमस भारत में

     

                    ईसा का सुसमाचार लेते हुए  षिश्य समूह दुनिया के चारों ओर निकल पड़े। दिदीमूस नामक थोमस भारत में आये; वे सन् 52 ईसवी में भारत पहुँचे। वे जहाज में आकर कोडुंगल्लूर में उतरे, जो मुसिरिस कहलाता था। उस समय वहाँ बहुत-से यहूदी रहते थे। 21 नवम्बर को हम प्रेरित संत थोमस के भारत आगमन की याद करते हैं।

     

    सात गिरजे (मसीही समूह)

     

                    यह परम्परागत विष्वास है कि प्रेरित संत थोमस ने भारत में सात गिरजों की स्थापना की। इसे अक्षरषः, ’इमारतों का निर्माण‘ नहीं समझना चाहिए, परन्तु यह कि संत थोमस ने सात जगहों पर कलीसिया के समूहों की स्थापना की। निरनम् , कोल्लम, निलक्कल, कोक्कमंगलम्, कोट्टक्काव, कोडुंगल्लूर और पालयूर - ये सात जगहें हैं। दूसरा एक गिरजा जो संत थोमस द्वारा स्थापित कहलाता है, वह तिरुवितांकोड ‘‘आधा-पल्लि’’ (आधा गिरजा) नाम से जाना जाता है।

                    संत थोमस के बारे में बहुत जानकारी प्राप्त करने का एक अप्रामाणिक ग्रंथ है ‘‘थोमस चरित’’। प्रेरित थोमस भारत में कैसे आये, उन्होंने सुसमाचार की घोशणा कैसे की और वे कैसे षहीद हुए, इन सबका विवरण उसमें है। पौराणिक गीत, मार्गमकलि, परिचमुट्टुकलि आदि कलारूप-कृतियाँ भी भारत में प्रेरित संत थोमस के प्रेरितायी कार्यों का साक्ष्य देती हैं।

                    सन् 72 ईसवी में दुष्मनों के भाले से घायल होकर वे मैलापुर के चिन्नामला से दौड़े और पेरियमला में षहीद हुए। उन्हें मैलापुर में दफनाया गया। जुलाई 3 तारिख को ‘‘दुक्राना’’ पर्व के नाम से भारत के ईसाई समूह इसकी याद करते हैं। 1972 में प्रेरित संत थोमस के स्वर्गवास की 19वीं षताब्दी मनाई गई। उस समय संत पापा पौलुस छठवें ने उन्हें ‘‘भारत के प्रेरित’’ घोशित किया।

     

    फलागमन काल

     

                    पेंतेकोस्त पर्व के सात सप्ताहों के बाद के रविवार को फलागमन काल षुरू होता है। उस दिन 12 प्रेरितों का, जो कलीसिया की नींव हैं, पर्व हम मनाते हैं। प्रेरितों के परिश्रम के फलस्वरूप पनप कर और बढ़ कर कलीसिया ने अनेक संतों और षहीदों को जन्म दिया। स्वर्गराज्य के प्रतीक के रूप में कलिसिया पवित्रता के फल प्रचुर मात्रा में उत्पन्न करते हुए बढ़ती रहती है; फलागमन काल में हम इसका स्मरण करते हैं। सिरियायी षब्द ‘‘कैता’’ का अर्थ है ‘‘ग्रीश्मकाल’’।

                    फलागमन काल के षुक्रवारों में हम कलीसिया की विष्वस्त संतानों - सच्चे और वफादार संतों और षहीदों - का स्मरण करते हैं। पवित्रता के सत्फल उत्पन्न करने के लिए यह काल हमें सहायता देता है।

     

    हम प्रार्थना करें

     

    हे प्रभु, भारत को ऐसे अनेक मिषनरियों को प्रदान कीजिए, जो हमारे पिता

    प्रेरित संत थोमस की भाँंति आपके साथ मरने के लिए तैयार हैं।

     

    हम गायें

     

    गीत

     

    ाश्ट्रों में तव मुक्ति विधान का ज्ञान होवे

                    पेन्तेकोस्त के षुभ दिन में, आग की जीभ में प्रकट हुआ

                    प्रभु ईसा के षिश्यों पर, पावन आत्मा/उतर आया।।

                    मैंने सुरक्षित रखी दित में तव आज्ञा

                    पवित्रात्मा की षक्ति तथा, जीवन से भरपूर हुए

                    वे दुनिया के सारे जहाँ, षुभ संदेष के/साक्षी बने

     

    कविता

     

    पेन्तेकुस्ता सुदिन आया, रूप व भाव में आग्नी की

    पे्रषिश लोगों पर निकली, पवित्र आत्मा तू देख लेना

    नव चैतन्य को मानव में, नव मानस को दिल दिल में

    सुवार्ते की नव किरणें, सुवार्ते हैं सारे जहाँ।।

     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    प्रेरित चरित 2: 1 - 47

     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

     

    ‘‘नये विष्वासी दत्तचित्त होकर प्रेरितों की षिक्षा सुना करते थे, भ्रातृष्त्व के निर्वाह में

    ईमानदार थे और प्रभु-भोज तथा सामूहिक प्रार्थनाओं में नियमित

    रूप से षामिल हुआ करते थे’’ (प्रेरित चरित 2: 42)।

     

    हम करें

     

    ंत थोमस द्वारा स्थापित सात गिरजों के नाम लिखिए।

     

    ेरा निर्णय

     

    वित्र आत्मा की प्रेरणाओं को न तज कर

    इनके अनुरूप अपना जीवन बिताऊँगा/गी।