• पुनरुत्थान के बाद चालीस दिन तक ईसा षिश्यों के बीच प्रकट होकर उनको स्वर्गराज्य के बारे में सिखाते रहे; अपने जीवित रहने का सबूत देते हुए उनके बीच प्रकट हो गये। चालीसवें दिन ईसा उनको बेथनिया तक ले गये। जब वे एकत्रित हो गये, तब उन्होंने ईसा से पूछा, ‘‘प्रभु, क्या आप इस समय इस्राएल का राज्य पुनःस्थापित करेंगे’’?ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘पिता ने जो काल और मुहूर्त अपने निजी अधिकार से निष्चित किये हैं, तुम लोगों को उन्हें जानने का अधिकार नहीं है। किन्तु पवित्र आत्मा तुम लोगों पर उतरेगा और तुम्हें सामथ्र्य प्रदान करेगा और तुम लोगा येरुसालेम, सारी यहूदिया और समारिया में तथा पृथ्वी के अन्तिम छोर तक मेरे साक्षी होंगे’’।

     

                    इतना कहकर उन्होंने हाथ बढ़ाकर उन्हें आषिश प्रदान की और उनके देखते-देखते ईसा सर्वाेच्च की ओर आरोहित कर लिये गये; एक बादल ने उन्हें षिश्यों की आँखों से ओझल कर दिया। ईसा के चले जाते समय प्रेरित आकाष की ओर एकटक देख ही रहे थे कि उज्ज्वल वस्त्र पहने दो पुरुश उनके पास अचानक आ खडे़ हुए और बोले, ‘‘गलीलियो, आप लोग आकाष की ओर क्यों देखते रहते हैं ?वही ईसा, जो आप लोगों के बीच से स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये हैं, उसी तरह लौटेंगे, जिस तरह आप लोगों ने उन्हें जाते देखा है’’। (प्रेरित चहिन 1: 6-11)।

     

                    वे बड़ी खुषी के साथ येरुसालेम लौटे। वे ईष्वर की स्तुति करते हुए सदा समय मन्दिर में रहे। ईसा ने पहले से उनको यह आदेष दिया था कि ‘‘वे येरुसालेम नहीं छोडें, बल्कि पिता ने जो प्रतिज्ञा की, उसकी प्रतीक्षा करते रहें। उन्होंने कहा, मैं ने तुम लोगों को उस प्रतिज्ञा के विशय में बता दिया है। योहन जल का बपतिस्मा देता था, परन्तु थोडे ही दिनों बाद तुम लोगों को पवित्रात्मा का बपतिस्मा दिया जायेगाा’’ (पे्ररित : चरित 1ः4-5)।

     

     

    प्रेरिताई का दौत्य

     

                    ईसा के आदेषानुसार ग्यारह षिश्य गलीलिया की उस पहाड़ी पर गये। उन्होंने ईसा को देखकर दण्डवत किया, किन्तु किसी-किसी को सन्देह भी हुआ। ईसा ने उनके पास आकर कहा, ‘‘मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जाकर सब राश्ट्रों को षिश्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो-जो आदेष दिये हैं, तुम लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो - मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ’’ (मत्ती 28: 16 - 20 )। ईसा ने अपने स्वर्गारोहण के पहले ही षिश्यों को यह दौत्य दिया - ‘सारी मानव जाति के लिए मुक्ति का सुसमाचार पृथ्वी के सीमान्तों तक पहुँचाओ’। षिक्षा देना कलिसिया का मुख्य दौत्य है। जो सुसमाचार में विष्वास करते हैं उन्हें बपतिस्मा द्वारा ईसा से संयुक्त बनाकर ख्रीस्तीय विष्वास की पूर्णता की ओर उन्हंे ले जाना है। प्रेरितों को ये दो दौत्य सौंपे गए थे: 1. सारे संसार में पाप मोचन के पष्चाताप की घोशणा करना। 2. मुक्ति का सुसमाचार पृथ्वी के सीमान्तों तक पहुँचाना।

     

    पे्ररितकाल

     

                    कलीसिय की उपासना विधि के छठा काल है प्रेरितकाल। पेंतेकोस्त पर्व से लेकर यह काल आरम्भ होता है। पवित्रात्मा से परिपूरित होकर प्रेरितगण सुसमाचार का सन्देष लेकर संसार भर में गये और कलिसियायी समूहों की नींव डाली - प्रेरितकाल इसकी याद दिलाता है। पवित्रात्मा के कार्य, प्रेरितों और कलीसिया के बीच का दृढ़ सम्बन्ध, आदिम कलीसिया का धर्मोत्साह, कलीसिया का प्रेरिताई स्वभाव - ये हैं इस काल में, हमारे मनन-चिन्तन के मुख्य विशय।

                    पे्ररितकाल का पहला षुक्रवार, ‘स्वर्ण षुक्रवार’ के नाम से जाना जाता है। जब पेत्रुस योहन के साथ मन्दिर गये तब मन्दिर के फाटक के पास एक लंगड़े को यह कहते हुए चंगा किया: ‘‘मेरे पास न तो चाँदी है और न सोना; बल्कि मेरे पास जो है, वही तुम्हें देता हँू - ईसा मसीह नाज़री के नाम पर चलो (प्ररित 3: 6)। उस दिन हम इस घटना का स्मरण करते हैं; पेत्रुस के उन षब्दों से ‘स्वर्ण षुक्रवार’ का नाम प्रचलित हुआ।

     

    पेन्तेकोस्त का पर्व

     

                    ईसा के स्वर्गारोहण के दसवें दिन पवित्रात्मा प्रेरितों पर अग्नि की जीभों के रूप में उत्तर आया; यही घटना है इस पर्व का आधार। कलीसिया की औपचारिक स्थापना भी उसी दिन हुई थी। कलीसिया में रहने और उसकी की अगुआई करने के लिए पवित्रात्मा को भेजने का स्मरण पेन्तेकोस्त के पर्व में निहित है। कलीसिया और उसकी संतानों में पवित्रात्मा का उत्साह भर जाने के लिए यह पर्व सहायक है।

     

    संसार के सीमान्तों तक

     

                    ईसा के निर्देषानुसार सर्वोच्च से षक्ति मिलने तक प्रेरित येरुसालेम में ठहरे। पेन्तेकोस्त के दिन पवित्रात्मा का अनुभव करके प्रेरित सुसमाचार के प्रचार के लिए निकल पड़े। प्रेरित संत थोमस ईसा का सुसमाचार लेकर भारत आये; उसी प्रकार दूसरे प्रेरित भी संसार के कोने-कोने तक ईष-वचन फैलाने के लिए उत्साह के साथ निकले। पौलुस, बारहों में से एक नहीं था, फिर भी ईसा ने अपने पुनरुत्थान के बाद उन्हें प्रेरित बनाया। वे आदिम कलिसिया के सबसे बडे प्रेरित थे।

     

    प्रेरित चरित

     

                    नये विधान की पाँचवीं किताब है प्रेरित चरित। पवित्रात्मा को ग्रहण करने से षक्ति पाकर विष्वासियों के समुह और आदिम कलिसिया ने किस प्रकार साक्ष्य का जीवन बिताया, इसका वर्णन है इस ग्रन्थ में। इसमें ऐसे एक समूह को हम देखते हैं जो पवित्रात्मा की अगुआई में जीवन बिताता है। इसलिए इसे पवित्रात्मा का सुसमाचार भी कहते हैं।

     

    पत्र

     

                    कलिसिया के बढ़ने पर प्रेरित-चरित के बाद नये विधान में 21 पत्र भी लिखे गए। इनमें 14 पत्र पौलुस के नाम से जाने जाते हैं। इनके बाद के सात पत्र ‘‘काथोलिक पत्र’’ कहलाते हैं। क्योंकि ये पत्र किसी विषेश कलीसिया या व्यक्ति के नाम पर नहीं, परन्तु सार्वत्रिक कलीसिया के लिए लिखे गये हैं। इन पत्रों के रचयिता हैं याकुब, पेत्रुस, योहन, एवं यूदस थद्देयुस। पेत्रुस के दो और योहन के तीन पत्र हैं। ये पत्र विष्वास-जीवन में अच्छे फल उत्पन्न करने का मार्गदर्षन देते हैं।

     

    हर एक ईसाई एक प्रेरित

     

                    प्रेरितों ने जिस ईसा का अनुभव किया था, उसे संसार को प्रदान करने के लिए अपने ज्ञान, क्षमता आदि का पूरा-पूरा प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने अपना जीवन तक न्योछावर कर दिया। ंिफर भी संसार के सीमान्तों तक सुसमाचार पहुँचाने का दौत्य अभी तक पूरा नहीं हुआ। उसे जारी रखने का दायित्व हर एक मसीही षिश्य का है जिसने बपतिस्मा ग्रहण किया है। जब हम पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण करते हैं तब ईसा यह महत्वपूर्ण दौत्य हमें सौंपते हैं।

                    मानव की मुक्ति है सुसामाचार-सन्देष का लक्ष्य। यह मुक्ति ईसा मसीह द्वारा ही हमें प्राप्त होती है। ‘‘समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुश्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है’’ (प्रेरित चरित 4: 12)। इसलिए यह स्पश्ट रूप से घोशित करना चाहिए कि ‘ईसा प्रभु है’।

                    आदर्ष जीवन का साक्ष्य है सबसे महत्वपूर्ण सुसमाचार-घोशणा।

     

    हम प्रार्थना करें

     

    हे मसीह, आपने सुसमाचार की घोशणा के लिए षिश्यों को नियुक्त

    किया और संसार के अन्त तक सदा उनके साथ रहने का

    वादा किया; हमें आपके साक्षी बनकर जीने की कृपा दीजिए।

     

    हम गायें

     

    गीत

     

    चमत्कारों से प्रभु ने उनका साथ दिया

                    लंगड़ा आषा करता था कुछ तो मिल जाए

                    चाहा उससे ज्याद सिमोन द्वारा प्राप्त हुआ

                    आषातीत मिली चंगाई वरदान प्राप्त हुआ

                    अपने भक्तों पर आषिश बरसाता प्रभुजी सदा।।

     

    कवित

     

    उत्थित प्रभुवर येषु में, साक्षी हो गए प्रेशित लोग

    ‘रूहा’ आकर उनमें राहा, वे भी षक्ति षाली हुए

    भीती के बिन सुवार्ता, सारे जहाँ भी घोशित हुई

    हम लोगों के कदमों के, हम लोग एक साथ गायेंगे।।

     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

     

    लूकस 24: 50-53

     

     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

     

    ‘‘संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृश्टि को

    सुसमाचार सुनाओ’’ (मारकुस 16: 15)

     

    हम करें

     

    प्रेरित-चरित के अध्याय 8 और 9 पढ़कर संत पौलुस के

    मनपरिवर्तन की घटना का वर्णन कीजिए।

     

    मेरा निर्णय

     

    जभी मुझे मौका मिलेगा तब मैं ईसा के बारे में बोलूँगा/गी।