पाठ 11
एम्माउस अनुभव
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‘‘ईसा के दो षिश्य येरुसालेम से लगभग चार कोस दूर एम्माउस गाँव जा रहे थे। राह चलते उनकी चर्चा के विशय थेः ईसा के दुःखभोग, क्रूस पर की मृत्यु, पुनरुत्थान, आदि। वे निराष थे और उनके मुख मलिन थे। तब एक अपरिचित के रूप में ईसा स्वयं आकर उनके साथ हो लिये। ईसा ने उनसे कहा, ‘‘आप लोग किस विशय पर बातचीत कर रहे हैं ?‘‘ उत्तर में उनमें से एक, क्लेओपस, ने पूछा: येरुसालेम में रहने वालों में से आप ही एक ऐसे हंै, जो यह नहीं जानते कि इन दिनों वहाँ क्या-क्या हुआ है। ’’ईसा ने उनसे कहा, ‘‘क्या हुआ है ?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘बात ईसा नाजरी की है। वे ईष्वर और समस्त जनता की दृश्टि में कर्म और वचन के षक्तिषाली नबी थे। हमारे महायाजकों और षासकों ने उन्हें प्राणदण्ड दिलाया और क्रूस पर चढ़वाया। हम तो आषा करते थे कि वही इस्राएल का उद्धार करने वाले थे। यह आज से तीन दिन पहले की बात है। यह सच है कि हममें से कुछ स्त्रियों ने हमें बडे़ अचम्भे में डाल दिया है। वे बडे़ सवेरे कब्र के पास गयीं और उन्हें ईसा का षव नहीं मिला। उन्होंने लौटकर कहा कि उन्हें स्वर्गदूत दिखाई दिये, जिन्होंने यह बताया कि ईसा जीवित हंै। इसपर हमारे कुछ साथी कब्र के पास गये और उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया, जैसा स्त्रियों ने कहा था, परन्तु उन्होंने ईसा को नहीं देखा। तब ईसा ने उनसे कहा, ‘‘निर्बुद्धियो, नबियों ने जो कुछ कहा है तुम उसपर विष्वास करने में कितने मन्दमति हो ! क्या, यह आवष्यक नहीं था कि मसीह
वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेष करें।’’ तब ईसा ने मूसा से लेकर अन्य सब नबियों का
हवाला देते हुए अपने विशय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।
इतने में वे उस गाँव के पास पहुँच गये, जहाँ वे जा रहे थे। लग रहा था, जैसे ईसा आगे बढ़ना चाहते हैं। षिश्यों ने यह कहकर आग्रह किया, ‘‘हमारे साथ रह जाइए। साँझ हो रही है और अब दिन ढल चुका है,’’ और वह उनके साथ रहने भीतर गये। ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठ कर रोटी ली, आषिश की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर उन्हें दे दिया। इसपर षिश्यों की आँखें खुल गयीं और उन्होंने ईसा को पहचान लिया।.... किन्तु ईसा उनकी दृश्टि से ओझल हो गये (लूकस 24: 13 - 32)।
ईसा धर्मग्रन्थ का व्याख्या करते हैं
जो निराष होकर एम्माउस की ओर जा रहे थे, उन षिश्यों को ईसा ने सबसे पहले ईष्वर का वचन ही बाँटा था। मूसा से लेकर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए अपने विशय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब ईसा ने उन्हें समझाया (लूकस 24: 27)। उन वचनों ने षिश्यों के हृदय को उद्दीप्त कर दिया। निराषा में डूबे हुए मन प्रत्याषा से उभर गये और दिल से अन्धकार की छाया दूर हो गयी। पुराने विधान के ईष-वचन उस मुक्ति-योजना की ओर संकेत करते हैं जो ईष्वर के पुत्र ईसा द्वारा पूरी होने की थी। नये विधान में इस योजना की पूर्ति का हम अनुभव करते हैं। जब हम ईष-वचन ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं तब हम प्रभु ईसा को ही अनुभव करते हैं। उनकी उपस्थिति हमारे हृदय को उत्तेजित करती है। यही उत्तेजन पवित्र कुर्बाना में प्रभु ईसा का दिव्य सानिध्य पहचानने में हमारी मदद करता है।
पवित्र बलिदान (कुर्बाना) में ईष-वचन की षुश्रूशा
सीरो मलबार के पवित्र बलिदान में ईष-वचन की उपासना समारोह पूर्वक होती है। वचन वेदी पर जो ईष-वचन घोशित किया (बाँटा) जाता है उसे स्वीकार करने में हमें तैयार करने के लिए हमारी ‘पवित्र बलिदान की विधि में’ काफी लम्बी प्रार्थनाएँ हैं। ‘‘हमारे मन को आलोकित कर आपके जीवनदायी और दिव्य आदेषों की मधुर वाणी ध्यानपूर्वक सुने....।’’ यह प्रार्थना करते हुए हम पवित्र वचन ग्रहण करने के लिए तैयार होते है। पंचग्रन्थ, नबियों के ग्रन्थ, पत्र और सुसमाचार से वाचन होते हैं। इस प्रकार के ईष-वचन से पवित्रीकृत होकर पवित्र बलिदान अर्पित करने के लिए ईसा हमें योग्य बना देते हैं। गिरजाघर में जब ईष-वचन पढ़ा जाता है तब प्रभु ईसा ही हमसे बात करते हैं।
पवित्र बलिदान (कुरबाना) में ईसा की उपस्थिति
प्रभु ईसा द्वारा कलवारी पर अर्पित बलि का अनुभव हम आज पवित्र बलिदान में महसूस करते हैं। स्वयं ईसा ही बलिवेदी पर यह बलिदान अर्पित करते हैं। ईसा के जन्म से लेकर उनके द्वितीय आगमन तक के मसीही रहस्यों को पवित्र बलिदान में दुहराया और अनुभवदायी बनाया जाता है। पवित्र बलिदान ख्रीस्तीय जीवन का केन्द्र है।
पवित्र बलिदान एक बलि होने के साथ-साथ प्राीतिभोज भी है। इस प्रीतिभोज में जीवित ईसा स्वयं विराजमान होकर अपने षरीर और रक्त हमें भोजन और पेय के रूप में परोेसते हैं। पवित्र वचन से षिश्यों के हृदय उद्दीप्त हुए और जब ईसा ने उन्हें रोटी तोड़कर दी तब वे ईसा को पहचान सके। पवित्र बलिदान/परम प्रसाद (कुरबाना) जीवन की रोटी है। ईसा ने कहा ‘‘मैं जीवन की रोटी हँू’’ (योहन 6: 35)। ‘‘यदि कोई वह रोटी खायेगा तो वह सदा जीवित रहेगा। जो रोटी मैं दूँगा, वह संसार के जीवन के लिए अर्पित मेरा मांस है’’ (योहन 6: 51)। पवित्र बलिदान/परम प्रसाद में प्रभु ईसा जीवित रूप में उपस्थित हैं।
पवित्र कुरबाना/परम प्रसाद में ईसा अपने षरीर-रक्त के तत्व (सारांष) और अस्तित्व से समूचे एवं सम्पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। इसलिए जब हम पवित्र कुरबाना (बलिदान/परम प्रसाद) के समीप होते हैं तब हमें यह महसूस होना चाहिए कि हम ईसा के ही समीप हैं। ‘‘संसार के अंत तक मैं तुम्हारे साथ रहूँगा’’, ईसा के इस वादे की पूर्ति है पवित्र कुरबाना बलिदान/परम प्रसाद ।
भक्त्यादर से पवित्र बलिदान अर्पित करते एवं योग्य रीति से परम प्रसाद ग्रहण करते हुए हम प्रभु ईसा के साथ जीवन बिताएँ।
हम प्रार्थना करें
हे प्रभु मसीह, आप मार्ग, सत्य और जीवन हैं;
हम आपके पुनरुत्थान में आनंद मनाते हैं; आप हमें
अंधकार से प्रकाष की ओर, असत्य से सत्य की ओर
और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाइए।
हम गायें
गीत
मृतकों में से फिर से वह जीवंत हुआ
कब्र थी मुद्रित और उसी पर पहरा लगाया था
फिर भी प्रभुजी जीवित हो कर उसमें से निकला।
महिमामय इस पुनरुत्थान से हर्शित होता हूँ
भक्यादर से जीवित प्रभु का वन्दन करता हूँ।।
कविता
कब्रस्थान से येषु मसीह, तीसरे दिन में उत्थित है
महिमा उज्ज्वल पुनरूत्थान, ध्यान कर देना हम सभी में
येषु मसीहा उत्थान को, हम लोगों का आश्रय है
पुनरूथिन हो हम इक दिन, उसमें हमारे जीवन है।।
ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें
योहन 20: 1 - 21
मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन
‘‘मैंने जो तुुम्हें षिक्षा दी है, वह आत्मा और जीवन है’’ (योहन 6: 63)
हम करें
उन चिह्नों को खोज निकालिए और लिखिए जिन्हें प्रभु ईसा ने पवित्र
कुरबाना (बलिदान) के विशय में सिखाने के लिए एम्माउस घटना में प्रयोग किया।
मेरा निर्णय
पवित्र बलिदान को एक दिव्य अनुभव बनाने के लिए उसमें प्रयुक्त
चिह्नों और प्रतीकों को ज्यादा सीखने का प्रयास करूँगा/गी।