पाठ 1
भविश्यवाणियाँ पूरी हो जाती हैं
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ईष्वर का दूत गलीलिया के नाज़रेत नामक नगर में एक छोटे घर में दिखाई दिया। वहाँ एक कुँवारी थी जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुश से हुई थी। उस कुँवारी का नाम था मरियम। गब्रिएल स्वर्गदूत मरियम के निकट आया और बोलाः ‘‘प्रणाम, प्रभु की कृपापात्री! प्रभु आपके साथ है।’’ वह इन षब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है। तब स्वर्गदूत ने उससे कहा, ‘‘देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी। वे महान होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु ईष्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा। वह याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’ पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहाः ‘‘यह कैसे हो सकता है?मेरा तो पुरुश से संसर्ग नहीं है।’’ स्वर्गदूत ने उत्तर दियाः ‘‘पवित्रात्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की षक्ति की छाया आप पर पडे़गी। इसलिए जो आपसे उत्पन्न होंगे, वह पवित्र होंगे और ईष्वर के पुत्र कहलायंेगे ... (लूकस 1: 28-35)
भविश्यवाणियाँ
संसार के प्रारम्भ से ही मानव वंष उस षुभ संदेष के लिए तरस रहा था। ‘‘हो जाये’’- इन ष्ब्दों से ईष्वर ने आदि में स्वर्ग और पृथ्वी की रचना की; मनुश्य को सारे विष्वमण्डल का मुकुट बनाया । ईष्वर ने अपने ही प्रतिरूप और अपने सदृष मनुश्य की सृश्टि की।
मगर आदि माता-पिता ने ईष्वर की आज्ञा तोड़ कर पाप किया। आज्ञा लंघन के लिए ईष्वर ने उन्हें दंड दिया; अदन वाटिका से उन्हें निकाल दिया। ईष्वर ने दंडाज्ञा के साथ-साथ मुक्ति की प्रतिज्ञा भी की थी, ‘‘मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंष और उसके वंष में षत्रुता उत्पन्न करूँगा। वह तेरा सिर कुचल देगा’’ (उत्पत्ति 3: 15)। सर्प का सिर कुचलनेवाली एक स्त्री और उसके पुत्र के प्रति उमंग भरी प्रत्याषा भू पर उमड़ पड़ी।
ईष्वर ने इस मुक्तिदाता के प्रति जो प्रतिज्ञा की थी उसको पूर्वजों और नबियों द्वारा दोहराया ‘‘मैं उनके ही भाइयों में से उनके लिए तुम-जैसा एक नबी उत्पन्न करूँगा’’ (विधि-विवरण 18: 18)। नबी मूसा से की गयी यह प्रतिज्ञा एवं बिलआम की भविश्यवाणी, ‘‘याकूब के वंष में एक तारे का उदय होगा, इस्राएल के वंष में एक राजा उत्पन्न होगा’’ (गणना 24: 17) तथा इसायाह नबी की भविश्यवाणी, ‘‘एक कुँवारी गर्भवती है। वह एक पुत्र को प्रसव करेगी और वह उसका नाम इम्मानूएल रखेगी’’ (इसायाह 7: 14)। इन सब भविश्यवाणियों से मुक्तिदाता के आगमन की प्रतीक्षा इस्राएल में जाग्रत हुई । इस्राएल जनता प्रार्थना करते हुए मुक्तिदाता के इंतजार में रही। समय की पूर्ति में ईष्वर ने अपने वादों को पूरा करने की इच्छा प्रकट की। इस्राएल जनता जो मुक्तिदाता की प्रतीक्षा मंे रहती थी, उसकी प्रत्याषा प्रभु ईसा के आगमन के संदेष में पूरी हुई ।
प्रभु ईसा का जन्म
मुक्तिदाता के जन्म का विवरण संत लूकस के सुसमाचार में इस प्रकार हैः उन दिनों कैसर अगस्तस ने समस्त जगत की जनगणना की राजाज्ञा निकाली। यूसुफ दाऊद के घराने और वंष का था; इसलिए वह गलीलिया के नाजरेत से यहूदिया में दाऊद के नगर बेथलेहेम गया, जिस से वह अपनी गर्भवती पत्नी मरियम के साथ नाम लिखवाये। वे वहीं थे जब मरियम के गर्भ के दिन पूरे हो गये। रात रुकने की जगह ढूँढते-ढूँढते उन्होंने बेथलेहेम के घरों एवं सरायों के दरवाजे खटखटाए। किसी ने उन्हें जगह नहीं दी; अन्त में उन्होंने वहाँ की एक गौषाला में रात बितायी। उसी रात को मरियम ने अपने पहलौठे पुत्र को जन्म दिया और उसे कपड़ों में लपेट कर चरनी में लिटा दिया। (लूकस 2ः 1-7)
उस प्रान्त में चरवाहे खेतों में रहा करते थे। वे रात को अपने झुण्ड पर पहरा देते थे। प्रभु का दूत उनके पास आकर खड़ा हो गया। ईष्वर की महिमा उनके चारों ओर चमक उठी और वे बहुत अधिक डर गये। स्वर्गदूत ने उनसे कहा, ‘‘डरिये नहीं। देखिए, मैं आप को सभी लोगों के लिए बडे़ आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ। आज दाऊद के नगर में आपके मुक्तिदाता, प्रभु मसीह, का जन्म हुआ है’’ (लूकस 2: 10-11)। एकाएक उस स्वर्गदूत के साथ स्वर्गीय सेना का विषाल समूह दिखाई दिया; वे यह कहते हुए ईष्वर की स्तुति करते थे, ‘‘सर्वोच्च स्वर्ग में ईष्वर की महिमा प्रकट हो और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को षान्ति मिले’’ (लूकस 2: 14)। पवित्र बलिदान के प्रारम्भ में हम यह स्तुतिगान गाते हुए, प्रभु ईसा के जन्म का पावन स्मरण करते हैं। स्वर्गदूतों से सूचना पा कर चरवाहे षीघ्र बेथलेहेम चल पड़े। उन्होंने वहाँ मरियम, यूसुफ तथा चरनी मंे लेटे हुए बालक को पाया और ईष्वर की स्तुति एवं महिमा की (लूकस 2: 15, 16)।
ज्योतिशियों का आगमन
ईसा मसीह के जन्म की सूचना देते हुए पूर्व मंे एक तारा उदित हुआ। इस तारे को देखकर पूर्व से ज्योतिशी निकले कि प्रभु ईसा को दण्डवत करें। वे बालक ईसा की तलाष में राजा हेरोद के महल पहुँचे। ज्योतिशियों से ईसा के जन्म की खबर सुनकर राजा हेरोद घबरा गया। राजा ने महायाजकों और षास्त्रियों की सभा बुला कर उनसे पूछा कि मसीह कहाँ जन्म लेंगे। उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘यहूदिया के बेथलेहेम में ।’’ नबी ने लिखा है - ‘‘बेथलेहेम, यूदा की भूमि, तू यूदा के प्रमुख नगरों में किसी से कम नहीं है; क्योंकि तुझमें एक नेता उत्पन्न होगा, जो मेरी प्रजा इस्राएल का चरवाहा बनेगा।’’ तब हेरोद ने ज्योतिशियों को बुलाया और उनसे पूछताछ कर यह पता कर लिया कि वह तारा ठीक किस समय उन्हें दिखाई दिया था। फिर उसने उन्हें बेथलेहेम भेजते हुए कहा, ‘‘जाइए, बालक का ठीक-ठीक पता लगाइए और उसे पाने पर मुझे खबर दीजिए, जिससे मैं भी जा कर उसे दण्डवत करुँ।’’ वे राजा की बात सुनकर चल दिये। उन्होंने जिस तारे को पूर्व में देखा था, वह उनके आगे-आगे चलता रहा। जहाँ बालक था, उस जगह के ऊपर पहुँचकर वह ठहर गया। वे तारा देख कर बहुत आनन्दित हुए। घर में प्रवेष कर उन्होंने बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा और उसे साश्टांग प्रणाम किया। फिर अपना-अपना सन्दूक खोलकर उन्होंने उसे सोना, लोबान और गन्धरस की भेंट चढ़ायी। (मत्ती 2ः1-12)
सुसन्देष काल - जयन्ती काल
सीरो मलबार कलीसिया के आराधना क्रम के वर्श के भिन्न-भिन्न काल में हम मसीह-रहस्य का, जो हमारी मुक्ति का आधार ह,ै स्मरण और अनुभव करते हैं। उनमें प्रथम काल सुसन्देष काल है जिस में मसीह के जन्म की तैयारी के चार सप्ताह हैं। सिरियायी भाशा में यह काल ‘‘सूबारा’’ जाना जाता है। इस पद का अर्थ है ‘घोशणा’ या ‘सूचना’। उसके बाद के दो सप्ताह हंै जयन्ती काल। मसीह-जयन्ती की तैयारी में पच्चीस दिन परहेज रखने का रिवाज कलीसिया में है। इस काल में रविवारों के वाचनों में मुक्तिदाता के जन्म से संबन्ध रखने वाली बातें आती हैं।
इन कालों में हम इन मुक्तिदायक घटनाओं का स्मरण करते हैं।
सुसन्देष काल
सुसन्देष काल - मनुश्य की सृश्टि, पाप और उसका परिणाम, पुराने विधान में ईष्वर के मुक्तिदायक हस्तक्षेप, मुक्तिदाता के विशय में भविश्यवाणियाँ, जकरियस को प्राप्त समाचार, कुँवारी मरियम को दिया हुआ षुभ सन्देष, मरियम का एलिजबेत से मिलन, मरियम का स्तुतिगान, योहन बपतिस्ता का जन्म, सन्त यूसुफ को सूचना।
जयन्ती काल
जयन्ती काल - प्रभु ईसा का जन्म, चरवाहों एवं ज्योतिशियों की भेंट, प्रभु ईसा का नामकरण, मन्दिर में प्रभु ईसा का समर्पण, नाज़रेत का पवित्र परिवार, प्रभु ईसा का रहस्यमय जीवन।
मसीह जयन्ती
सुसन्देष काल और जयन्ती काल का केन्द्र बिन्दु प्रभु ईसा का जन्म है। पच्चीस दिसम्बर को मसीह जयन्ती या क्रिस्त्मस का पर्व मनाया जाता है। मसीह जयन्ती के दिन पवित्र बलिदान और अन्य धार्मिक कार्यों में हमें भक्त्यादर से भाग लेना चाहिए। मुक्तिदाता को भेजने के प्रति पिता ईष्वर से कृतज्ञता एवं स्तुति, पवित्र कुँवारी मरियम से आदर और मुक्तिदाता के जन्म की खुषियों का भाव इन कालों में हममें उभर रहना चाहिए।
हम प्रार्थना करें
हे प्रभु ईसा मसीह पूर्वजों ने आपके लिए प्रत्याषापूर्वक इन्तजार किया। हे प्रभु,
आपके कृपादानों से हमें धन्य बना दीजिए। आपके मनुश्यावतार के पुण्यफलों
से हमें आलोकित कर दीजिए।
हम गायें
गीत
सकलेष्वर ने पुरखों से, सदय किया था इक वादा
तुम लोगों को बचाने को, भेजूँगा मैं इक त्राता।
उसी वचन की पूर्ति में, दाऊद पुत्री मरियम ने
जो प्रभु संदेष पाया वह, है
आष्वासन मुक्ति का।।
दूत की वार्ता मानी संग, धन्या मरियम इक दूत ने
आकर जन्म ले कन्य नन्द, बेतलेहम की गोषाला में
देवकुमार का दर्षन देकर, गरीब हो गये मेंढपाल लोग
राजर्शि लोग पूर्वदेष में, राजाधीराजा को दर्षन लिया
माँ के साथ अभी षिषु को, आदर पूर्वक दर्षन करो।
हम ईश का वचन पढ़े और वर्णन करें
मत्ति 1: 18 - 2: 23
मार्ग दर्शन के लिए एक पवित्र वचन
‘‘देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ ;
आपका कथन मुझमें पूरा हो जाये।’’ (लूकस 1: 38)
हम करें
संत लूकस के सुसमाचार के आधार पर
ईसा मसीह के जन्म का वर्णन तैयार कीजिये।
मेरा निर्णय
मेरे हृदय में बसने वाले ईसा की उपस्थिति
का मैं रोज स्मरण करूँगा/गी।