• "यह मेरा प्रिय पुत्र है, मैं इसपर अत्यन्त प्रसन्न हैं।"

    ईसा नाजरेत नामक गाँव में माँ और बाप के साथ रहे। ईसा जब तीस वर्ष के हुए तब योहन बपतिस्ता पश्चाताप के ज्ञानस्नान का उपदेश देने आया। योहन ऊँट के रोवों का कपड़ा पहनता था और कमर में चमड़े का पट्टा बांधे रहता था। उसका भोजन टिड्डियाँ और वन का मधु था।

    वह यर्दन नदी में ज्ञानस्नान दिया करता था।

     

    एक दिन ईसा गलीलिया के नाज़रेत से आये। उन्होंने यर्दन नदी में योहन बप्तिस्ता से ज्ञानस्नान ग्रहण किया। ईसा पानी से निकल ही रहे थे कि उन्होंने स्वर्ग को खुलते और आत्मा को कपोत के रूप में अपने ऊपर आते देखा और स्वर्ग से पिता ईश्वर की यह वाणी सुनाई दीः

    "यह मेरा प्रिय पुत्र है, मैं इसपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।

    (मत्ती 3:17)

     

    इस प्रकार पिता ईश्वर ने दर्शाया कि ईसा ईश्वर के प्रिय पुत्र हैं।

    ईसा के ज्ञानस्नान का स्मरणोत्सव जनवरी 6 तारीख को कलीसिया मनाती है; उसे देनहा (दर्शनपर्व) कहते हैं।

    हम भी ज्ञानस्नान द्वारा ईश्वर के प्रिय पुत्र-पुत्रियाँ बन चुके हैं। हमें भी ईश्वर की संतान के अनुसार जीवन बिताना चाहिये।

     

    हम गायें

     

    बप्तिस्ता से उस दिन में

    ज्ञानस्नान को ग्रहण किया

    ईश्वरसुत है मम राजा

    नमन हो तेरा युग राजा।

    ज्ञानस्नान के द्वारा हमें

    ईश की संतान बनवाया

    ईशपिता की प्रीति में

    भू पर गायें सुनवायें।

     

    हम प्रार्थना करें

     

     

    हे प्रभु मसीह, आपको ईशपिता से यह गवाही मिलीः

    "यह मेरा प्रिय पुत्र है।" हमें ऐसी गवाही देने का

    अनुग्रह दीजिये कि आप प्रभु और ईश्वर हैं।

     

    पवित्रात्मा कपोत के रूप में ईसा पर उतर आया।

    नीचे दिये गये चित्र में रंग भरें।


     

    प्रभु का वचन पूरा कीजिये

     

    यह मेरा ……………………….

    इस पर ………………………….

    प्रिय पुत्र है । अत्यंत प्रसन्न हूँ ।

     

    क्या आपको मालूम है ?

     

    (माता-पिता से पूछ कर लिखिये)

     

    ज्ञानस्नान में मेरा नाम

    मेरे ज्ञानस्नान की तारीख

    मेरे धर्मपिता का नाम

    मेरी धर्ममाता का नाम

     

    हम अनुसरण करें

     

     

    ईश-पुत्र ईसा की तरह हम भी ईश्वर की संतान बन कर जियें ।