पाठ-7
पवित्र बलिदान ईष्वर से ऐक्य की विधि एवं समापन
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मेलमिलाप की विधि
ईसा अपने षरीर और रक्त देते हुए हमारे लिए भोज तैयार करते हैं; उसमें योग्यता से भाग लेने के लिए मेलमिलाप का पवित्र वस्त्र पहनना चाहिए। मेलमिलाप हमें ‘ईष्वर से ऐक्य’ की ओर ले जाता है; मेलमिलाप हासिल करने में परम प्रसाद ग्रहण करने के पहले की ‘मेलमिलाप की विधि’ हमारी मदद करती है।रहस्य प्रार्थना ‘हे मसीह, स्वर्गवासियों की षांति... तथा उसके बाद पष्चाताप का स्तोत्र भाग ‘हे ईष्वर तू दयालु है...’- इन दोनों से मेलमिलाप की विधि प्रारंभ होती है। इस समय का धूपार्पण हमें पापमोचन की ओर ले जाता है।पवित्र रोटी तोड़ने की विधि
आगे का अनुश्ठान - पवित्र रोटी तोड़ने की विधि - पवित्र बलिदान का पापमोचक स्वभाव व्यक्त करता है। ‘‘स्वर्ग से उतरी...’’ - इस प्रार्थना या गीत के समय याजक पवित्र रोटी ऊपर उठाता है; फिर उसे दो भागों में विभाजित करता है और एक भाग पवित्र रक्त में डुबाकर, दोनों भागों को मिलाकर पकड़ता है; हमारे पापों के प्रायष्चित हेतु तोड़े गए ईसा के पवित्र षरीर तथा रक्त की, स्नेहादर के साथ आराधना करता है।गतिविधि-1
उत्पत्ति 3: 1-19 ध्यान से पढ़कर पता लगाइये कि पाप के कारण आपसी संबन्धों की क्या-क्या हानियाँ हुई है; जाँच कीजिए कि आज की हमारी परिस्थितियों में ऐसी हानियाँ हैं या नहीं; यदि हैं, तो उदाहरणों को प्रस्तुत कर व्यक्त कीजिए ।हमारे प्रभु ईसा मसीह की कृपा...
इस प्रार्थना के साथ पवित्र रोटी तोड़ने की विधि समाप्त होती है। यह कानोना (प्रार्थना) संत पौलुस का अभिवादन है। मसीह की कृपा, पिता का प्रेम और पवित्रात्मा का संसर्ग हमें स्वर्गीय जीवन का अनुभव प्रदान करता है। हर मसीही इस ईष्वरीय सान्निध्य का हकदार है; यह ईष्वरीय सान्निध्य सदा हमारे साथ रहे - इस कृपा के लिए याचना करते हुए ही हमें यह आषीर्वाद स्वीकार करना चाहिए।मेलमिलाप की घोषणा प्रार्थना माला
‘हम सब श्रद्धा-भक्ति से...’ यह घोशणा प्रार्थना माला परम प्रसाद ग्रहण करने की निकटतम तैयारी है। यह प्रार्थना हमें याद दिलाती है कि परम प्रसाद ग्रहण करने के लिए क्या-क्या करना है और परम प्रसाद के फल क्या-क्या हैं। ‘हे प्रभु, तू अपनी असीम कृपा से अपने सेवकों के पाप तथा अपराध क्षमा कर’ - याजक की इस पापमोचक प्रार्थना के साथ मेलमिलाप की विधि समाप्त होती है।ईश्वर से ऐक्य की विधि
इस विधि का मुख्य कार्य परम प्रसाद ग्रहण करना तथा उसके द्वारा प्राप्त ‘ईष्वर से ऐक्य’ हैं। पवित्र बलिदान के सभी भाग हमें परम प्रसाद स्वीकार करने की ओर ले चलते हैं।हे हमारे पिता..., जो स्वर्ग में है।
परम प्रसाद ग्रहण करने की निकटतम तैयारी में भक्त समूह स्वर्गिक पिता को पुकार कर प्रार्थना करता है। यद्यपि ईष्वर से हमारा मेल हुआ और हमने पापमय जीवन त्याग दिया, फिर भी हम परीक्षाओं की परिस्थिति में ही जीते हैं। इसलिए परीक्षा में नहीं पड़ने की सहायता के लिए ईष्वर से विषेश याचना करते हुए याजक आगे प्रार्थना करता है।परमप्रसाद ग्रहण करने का आह्वान
परमप्रसाद ग्रहण करने की तैयारी में समूह को याजक षांति का अभिवादन करता है। जो जीवन की रोटी है उस मसीह के पवित्र षरीर और रक्त ग्रहण करने से प्रत्येक व्यक्ति अपने हृदय में मसीह को प्रभु मानकर स्वीकार करता है। इस षांति अभिवादन का अर्थ यह है कि ’’आराधना समूह’’ के हर एक व्यक्ति को यह अनुभव प्राप्त हो। पुनरुत्थित मसीह को ही परम प्रसाद में हमपरमप्रसाद ग्रहण करनेकी तैयारी में हमें चाहिएःअन्तःकरण षुद्ध करना मनमुटाव हटानाकलह मिटाना क्रोध छोड़नाबैर तजनाएकता बरतना प्रेमभाव रखनागतिविधि 2
पवित्र बलिदान की पुस्तक में से ढूँढ निकालिएः1. वे प्रार्थनाएँ और अनुश्ठान जो पाप का बोध प्रकट करते हैं।2. वे प्रार्थनाएँ जो ईष्वर की पवित्रता का बखान करती हैं।3. वे प्रार्थनाएँ जो यह सूचित करतीं कि पवित्र बलिदान द्वारा पाप मोचनत्रित्वैक ईश्वर की पवित्रता में सहभागिता
पवित्र बलिदान पवित्र त्रित्व से अटूट संबन्ध रखता है। इसलिए परम प्रसाद का ग्रहण ईष्वर की पवित्रता अपनाने में हमारी सहायता करता है। ‘पवित्र वस्तु पवित्र लोगों के लिए है’ - यह घोशणा हमें स्मरण दिलाती है कि परम प्रसाद ग्रहण करने से हम पवित्र पिता, पवित्र पुत्र और पवित्रात्मा से संबन्ध रखते हैं तथा इसके द्वारा ईष्वर की पवित्रता में भागीदार बनते हैं।परम प्रसाद का ग्रहण
‘पवित्र वस्तु पवित्र लोगों के लिए है’ - याजक की इस घोशणा के जवाब में भक्तजन स्वीकार करते हैं कि एकमात्र ईष्वर पवित्र है। उसकी कृपा ही हमें परम प्रसाद ग्रहण करने योग्य बनाती है। इस कृपा के लिए दिल में प्रार्थना करते हुए ही हमें परम प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। परम प्रसाद ग्रहण करना बलि समर्पण का अनिवार्य भाग है। पवित्र बलिदान बलि तथा भोज है; जब हम इसमें भाग लेते हैं तब ईसा हमारे लिए अपने पवित्र षरीर और रक्त परोसते हैं। उन्हें स्वीकार करना पवित्र बलिदान के अनुभव की पूर्णता के लिए जरूरी है। इसलिए परम प्रसाद ग्रहण करने के लिए आवष्यक तैयारी और पवित्रता के साथ ही हमें पवित्र बलिदान में भाग लेना चाहिए।पवित्र बलिदान के फल
पवित्र बलिदान बलि तथा भोज है। यह हमें अपराधों की माफी, पापों की क्षमा और ईष्वरीय जीवन प्रदान करता है तथा मृत्यु से पुनरुत्थान की महान आषा और स्वर्ग राज्य में नव जीवन की प्रतिज्ञा करता है। इसलिए पवित्र बलिदान द्वारा हम ईष्वर की पवित्रता में भागीदार बनेंगे तथा ईष्वरीय जीवन प्राप्त करेंगे। यह हमे मुक्ति का अनुभव प्रदान करता है। इसलिए पवित्र बलिदान ख्रीस्तीय जीवन का केन्द्र है।समापन विधि
ईष्वर की अवर्णनीय देन, ‘पवित्र बलिदान’ के प्रति समूह, उपयाजकगण एवं याजक जो कृतज्ञता प्रार्थनाएँ अलग-अलग करते हैं, वे हैं समापन विधि की विशय वस्तु। ‘हे हमारे पिता ......’ (समारोही विधि में), समापन आषीर्वाद, ‘क्षमा की वेदी प्रणाम ......’ और बलिवेदी का चुंबन - ये सब हैं इस विधि की अन्य प्रार्थनाएँ और अनुश्ठान।कृतज्ञता प्रार्थनाएँ
पवित्र बलिदान द्वारा आराधना-समूह स्वर्ग का पूर्वानुभव प्राप्त करके इस युग के अंत एवं स्वर्गीय जीवन में आषा रखते हुए कृतज्ञता प्रार्थनाओं द्वारा प्रभु का गुणगान करता है; ईष्वर के मुक्तिदायक कार्यों की याद करते हुए, युगान्त में होने की मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हुए और प्रभु के अनुग्रहों का वर्णन करते हुए मसीह की स्तुति करता है। आराधना-समूह यह प्रार्थना करता है - ‘हे प्रभु हमने विष्वास के साथ जिन रहस्यों को ग्रहण किया है वे हमें पापों की क्षमा प्रदान करें तथा हमें इस योग्य बना दें कि हम तेरे पुनरागमन के समय भरोसे के साथ तेरे दर्षन करें और स्वर्गदूतों के साथ तेरी महिमा गा सकें।’ इस जीवनदायी बलिदान में भाग लेने योग्य बन जाने के प्रति धन्यवाद देते हुए, बलि समर्पण के फलों - अपराधों की माफी, पुनरुत्थान और स्वर्ग राज्य में नवजीवन - को प्राप्त करने के लिए याचना करता है।प्रभु की विनती
यदि इस समय प्रभु की विनती बोलते हैं तो उसके द्वारा आराधना समूह, जो ईसा के साथ एक बन चुका है, आनन्द विभोर होकर स्वर्गीय पिता की स्तुति करता है।समापन आशीर्वाद
अपने स्वर्गारोहण के पहले षिश्यों को आषीर्वाद देते हुए ईसा ने कहा, ‘‘संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृश्टि को सुसमाचार सुनाओ’’ (मारकुस 16: 15)।जो पवित्र बलिदान में भाग लेते हैं उनमें से हर एक को यही दौत्य जारी रखने के लिए ईसा आषीर्वाद देकर भेजते हैं। पवित्रात्मा की कृपा तथा षक्ति वे हममें भर देते हैं। इसके द्वारा ईसा यह आषीर्वाद देते हैं जिससे हम आगे के जीवन में वचन तथा कर्म द्वारा ईष-वचन के गवाह बनें। ईष्वर के सम्मुख जो आराधक पहुँच चुके हैं, वे जीवन का वचन सुनकर, मसीह के पासका रहस्यों में भाग लेकर और जीवन की रोटी स्वीकार कर, पवित्रीकृत होकर, प्रेरिताई के लिए भेजे जा रहे हैं।‘क्षमा की वेदी प्रणाम’
पवित्र बलिवेदी, जो प्रभु की कब्र तथा हमारे पवित्रीकरण की वेदी है, उस पर माथा टेकते हुए याजक यह विदाई प्रार्थना बोलता है।ईष्वर की बिखरी हुई संतान को एकत्र करने (योहन 11: 52) के लिए ईसा स्वयं बलि हो गए। उन्होंने चाहा कि मानवों के टूटे रिष्तों को सुधार कर उन्हें एकता और जीवन की ओर ले चलें। इसके लिए उन्होंने अपने षरीर और रक्त भोजन और पेय के रूप में दिए। जो उनकी बलि में भाग लेकर उनके षरीर तथा रक्त ग्रहण करता है वह मुक्तिदायक ईष्वरीय जीवन प्राप्त करेगा।पवित्र बलिदान में भाग लेकर उनके षरीर और रक्त ग्रहण करते हुए हम उनके साथ एक हो जाएँ। पवित्र बलिदान से प्राप्त प्रेरणा के अनुसार हम अपनी कर्मवेदी पर, प्रेम तथा सेवा की बलिवेदी पर, अपने-आप को अर्पित करें। तब हमारा जीवन धन्य बनेगा; मुक्तिदायक बनेगा।ईषवचन पढ़ें और मनन करें
(योहन 6: 48-59)कंठस्थ करें
‘‘जो मेरा माँस खाता और मेरा रक्त पीता है उसे अनंत जीवन प्राप्त है और मैं उसे अंतिम दिन पुनर्जीवित करूँगा।’’ (योहन 6: 54)हम प्रार्थना करें
हे ईसा, आपने अपने षरीर तथा रक्त से हमें पोशित किया; आपके षाष्वत भोज में हमें भी सहभागी बना दीजिए।मेरा निर्णय
जब-जब मैं पवित्र बलिदान में भाग लूँगा/गी, तब-तब परम प्रसाद स्वीकार करूँगा/गी।कलीसिया के आचार्य कहते हैं
‘मिस्र में इस्राएल जनता ने मेमने को खाया। उसके प्रतीक ने उन्हें पवित्र किया। तो सच्चा मेमना जनता को कितना अधिक पवित्रीकृत नहीं करेगा।’ (मार एफ्रेम)