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                        ईसा के जीवन के बारे में विस्तष्त विवरण सुसमाचार में दिया गया है। चारों सुसमाचारों में ईसा की कथनी और करनी का विवरण है। ईसा के प्रबोधनों का संक्षिप्त रूप है पर्वत पर प्रवचन। एक सच्चा ख्रीस्तीय कौन है, उसे कैसे जीवन बिताना है, उसे क्या-क्या सौभाग्य मिलते हैं आदि ईसा ने इसमें विस्तृत रूप से सिखाया है। ईसा ने यह सिखाया कि सभी भविश्यवाणियों और नियमों का आधार है - ‘दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।’ पर्वत पर प्रवचन जिसमें ईसा के प्रबोधन समाहित हैं, वह संत मत्ती के सुसमाचार के पाँचवें अध्याय से सातवें अध्याय तक मिलता है।

    ईसा के षिश्यों के सौभाग्य

    पर्वत पर प्रवचन के सब से प्रमुख भाग हैं अश्ट सौभाग्य यानी आषीर्वचन। आठ सौभाग्यों के विशय में ईसा यहाँ कहते हैं, जिन्हें उनके अनुयायी प्राप्त करेंगे। ये आषीर्वचन निम्नलिखित हैं:
    1. धन्य हैं वे, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।
    2. धन्य हैं वे, जो नम्र हैं! उन्हें प्रतिज्ञात देष प्राप्त होगा।
    3. धन्य हैं वे, जो षोक करते हैं! उन्हें सान्त्वना मिलेगी।
    4. धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं! वे तृप्त किये जायेंगे।
    5. धन्य हैं वे, जो दयालु हैं! उन पर दया की जायेगी।
    6. धन्य हंै वे, जिनका हृदय निर्मल है। वे ईश्वर के दर्शन करेंगे।
    7. धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।
    8. धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है। 
    (मत्ती 5ः3-10)

    ईसा के षिश्य के रूप और भाव

                            ईसा के शिष्य को क्या-क्या सौभाग्य प्राप्त हांेगे और वास्तव में वह कौन है - यह ईसा ने सिखाया। उन्होंने बताया कि ईसा के शिष्य पृथ्वी का नमक और संसार की ज्योति हैं (मत्ती 5ः13-14)। उन्होंने कहा कि नमक को नमकीन होना है और दीपक जलाकर दीवट पर रखना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि ख्रीस्तीयों को चाहिए कि वे समस्त संसार को स्वाद और प्रकाश प्रदान करें। ईसा ने यह भी पढ़ाया कि तुम्हारी ज्योति मनुश्यों के सामने चमकती रहे, जिससे लोग तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें। (मत्ती 5ः16)
                  ईसा ने सिखाया कि पृथ्वी के नमक और संसार की ज्योति बनने के लिए आज्ञाओं का पालन करना अनिवार्य है। ‘मैं तुम लोगों से यह कहता हँू कि आकाष और पृथ्वी भले ही टल जाये, किन्तु संहिता की एक मात्रा अथवा एक बिन्दु भी पूरा हुए बिना नहीं टलेगा। इसलिए जो उन छोटी से छोटी आज्ञाओं में एक को भी भंग करता और दूसरों को ऐसा करना सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में छोटा समझा जायेगा। जो उनका पालन करता और उन्हें सिखाता है वह स्वर्गराज्य में बड़ा समझा जायेगा।’
                      ईसा र्का िषश्य वह है जो ईश्वर पर भरोसा रखकर जीता है। सदैव ईश्वर पर भरोसा रख कर जीने की आवश्यकता पर जोर देते हुए ईसा ने सिखायाः भोजन और कपड़े के बारे में चिन्ता मत करो। इसका मतलब यह नहीं है कि भोजन और कपड़ों की ज़रूरत नहीं है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि स्वर्गिक पिता अपनी सन्तानों को ये सब प्रदान करेंगे। ईसा ने आगे कहाः तुम सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीज़ें तुम्हें यों ही मिल जायेंगी। (मत्ती 6ः33)
           ईसा के वचन सुनकर उनके अनुसार जो जीवन बिताते हैं वे ही हैं ईसा के सच्चे शिष्य। ईसा ने सिखाया कि यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो। (योहन 13ः35)
     

    सा का एक सच्चा षिश्य बनने बावत

                  पर्वत पर प्रवचन में ईसा ने सिखाया कि ईसा के एक सच्चे शिष्य के गुण क्या-क्या होने चाहिए। जो लोग दिखावे मात्र के लिये नियमों का पालन करते, परन्तु विश्वास के जीवन में नहीं बढ़ते हैं, उनसे ईसा ने कहा कि ‘जो लोग मुझे प्रभु-प्रभु कह कर पुकारते हंै, उन में सबके सब स्वर्गराज्य में प्रवेश नहीं करेंगे। जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही स्वर्गराज्य में प्रवेश करेगा’। (मत्ती 7ः21)
                   एक सुंदर दृश्टान्त देते हुए ईसा अपना पर्वत पर प्रवचन समाप्त करते हैं। जो मेरी ये बातें सुनता और उन पर चलता है, वह उस समझदार मनुश्य के सदृश्य है, जिसने चट्टान पर अपना घर बनवाया था। पानी बरसा, नदियों में बाढ़ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। तब भी वह घर नहीं ढ़हा, क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गयी थी। जो मेरी ये बातें सुनता है, किन्तु उन पर नहीं चलता, वह उस मूर्ख के सदृष है, जिसने बालू पर अपना घर बनवाया। पानी बरसा, नदियों में बाढ़ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। वह घर ढ़ह गया और उसका सर्वनाश हो गया। (मत्ती 7ः24-27)
                   ईसा के इस दृश्टान्त के चट्टान जैसा हमारे जीवन को बल और मजबूती प्रदान करता है ईष-वचन क्योंकि ईसा सिखाते हंै कि आकाष और पृथ्वी टल जाएँ तो भी ईष-वचन कभी नहीं टलेगा। इसलिए जो ईष-वचन पर आधारित जीवन का निर्माण करते हैं वे सषक्त रहेंगे। वे किसी भी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम भी रहेंगे। 
                         ईसा यह आग्रह करते हैं कि उनके सच्चे शिष्य बनने के लिए हमें न केवल ईश्वर पर विश्वास रखना है बल्कि उसकी इच्छा जानकर उस के अनुसार कार्य भी करना अनिवार्य है। ईश्वर की इच्छा आज हमें ईष-वचन द्वारा प्रकट हो जाती है। इन वचनों को खुले मन से स्वीकार कर उनके अनुसार जीवन बिताते हुए ईसा के सच्चे शिष्य बनने, अनन्त जीवन के भागीदार होने और स्वर्गराज्य अपनाने का हम परिश्रम करें।

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रभु, आप ने मुक्ति का मार्ग हमें सिखाया। आपके वचन 
    सुनकर उन के अनुसार जीवन बिताकर स्वर्गराज्य के भागीदार बनने की कृपा हमें प्रदान कीजिए। 

    हम गायें

    वचन येसु के सुनते हो, देव का हित पूछेंगेदेव के प्यार में उतरेंगे, विष्व का जीवन ज्योति है।पहाड़ पर प्रभु वचन दिया, सुवार्ता की प्रमुखता
    उस जीवन का येसु मन, दिखती ईष्वर की महिमा।ईष्वर की महिमा उसमें हो, मकान का काम निर्दोशी
    निर्विघ्न पाप के आधार, उद्घोशित है मकान केदार।
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करंे

    (मत्ती 7ः21-28)
     

    मार्गदर्षन के लिये एक पवित्र वचन

    “जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही स्वर्गराज्य 
    में प्रवेश करेगा।” (मत्ती 7ः21)
     

    हम करें 

    आषीर्वचन को कंठस्थ कीजिए। 
     

    मेरा निर्णय

    मैं ईसा के वचन के अनुसार जीवन बिताऊँगा/गी।