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                            पुराने विधान में ईश्वर द्वारा दी गई संहितायें और नये विधान में ईसा द्वारा सिखाई गई प्रेम की आज्ञा मनुश्य को सही जीवन बिताने में मदद करती हैं। भलाई करना, बुराई न करना - ये हैं इन आज्ञाओं का सारांष। फिर भी मनुश्य अक्सर पाप में गिर जाते हैं। गलती करने से हमारा मन अषांत हो जाता है। अपने अन्तरतम की ईश्वरीय षक्ति गलतियों पर पष्चाताप करने में हमें मदद करती है।

                                   

    अन्तःकरण

                                    हर व्यक्ति में एक स्वाभाविक आन्तरिक षक्ति है। अपने अन्तरतम की यही षक्ति निर्देष देती है कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है। हर अवसर पर भलाई करने में यह हमें प्रेरणा देती है। अन्तःकरण वह षक्तिषाली आन्तरिक आह्वान है जो हमें भलाई करने का प्रोत्साहन देते हुए उसके अनुसार कार्य करने को प्रेरित करता है। अन्तःकरण ईश्वर की आवाज़ है। यद्यपि यह आवाज़ मनुश्य के अन्तरतम से गूँजती है, फिर भी यह मनुश्य की नहीं, बल्कि ईश्वर की आवाज़ है। 
                                    अन्तःकण हमें अच्छाई स्वीकार करने और बुराई छोड़ देने का आह्वान देता है। यदि हम हृदय में गूँजती अन्तःकरण की फुसफुसाहट का अनुसरण करें तो वह हमें भलाई की ओर ले जायेगी। अन्तःकरण का तिरस्कार करने से हमारे मन में बुराई बढ़ती है। द्वितीय वत्तिकान महासभा अन्तःकरण के बारे हमें यह सिखाती है कि हर मनुश्य के हृदय में ईश्वर द्वारा अंकित एक नियम है। 

    मनुश्य के अन्तरतम की भलाई और बुराई

                                             मनुश्य भलाई से प्यार करता है और भलाई करना चाहता है। वह सत्य, न्याय, त्याग, प्यार आदि मूल्यों को अपनाने का इच्छुक है जो भलाई के भिन्न-भिन्न भाग हैं। इन्हें कार्यान्वित करने की स्वतंत्रता भी उसे प्राप्त है। इस स्वतंत्रता में मनुश्य जो निर्णय लेेता है उसे अन्तःकरण का निर्णय कहते हंै।
                                           मनुश्य जो भलाई से प्यार करता है वह अक्सर बुराई करते हुए दिखाई देता है। इसका कारण मनुश्य में निहित पाप का प्रभाव है। भलाई और बुराई का यह संघर्श मनुश्य में सदा सक्रिय है। संत पौलुस इसके बारे में कहते हैंः “भलाई करने की इच्छा तो मुझमें विद्यमान है, किन्तु उसे कार्यान्वित करने की षक्ति नहीं है। मैं जो भलाई चाहता हँू वह नहीं कर पाता, बल्कि मैं जो बुराई नहीं चाहता, वही कर डालता हँू।” (रोमिः 7ः18-19)
     

    अन्तःकरण पवित्र ग्रन्थ में

                       पवित्र बाइबिल के पुराने विधान में ‘अन्तःकरण’ षब्द का प्रयोग सामान्य रूप से नहीं दिखाई देता है। पुराने विधान में अन्तःकरण षब्द का अर्थ है - ‘हृदय’। हृदय ही हमें भलाई करने को प्रेरित करता है। लेकिन नये विधान में संत पौलुस अन्तःकरण के बारे में विस्तृत रूप से सिखाते है। वे कहते हैं कि जिन्होंने ईसा के आदेशों को नहीं अपनाया है वे भी अन्तःकरण की आवाज़ के अनुसार काम करने को बाध्य हैं। उन्हें विशेष नियम तो नहीं मिला है, लेकिन वे स्वाभाविक रूप से अपने हृदय में नियम स्वीकार कर चुके हैं। उन के लिए अपने अन्तःकरण का अनुसरण करना नियम का पालन करने के समान है।

    अन्तःकरण और विष्वास

                        जो ईसा में विश्वास करते हैं उनका विष्वास ही अन्तःकरण की बुनियाद है। इसलिए विष्वास के सत्यों के आधार पर हर विष्वासी को अपना अन्तःकरण तैयार करना है। ख्रीस्तीय विष्वास में आधारित धार्मिक आवाज़ को ख्रीस्तीय अन्तःकरण कहते हैं।
                          मनुश्य जो ईश्वर की संतान हैं उन सभी में ईश्वरीय चेतना विद्यमान है। इसलिए यह कहा जाता है कि अन्तःकरण की आवाज़ ईश्वर की ही आवाज़ है। लेकिन ख्रीस्तीय, जो ज्ञानस्नान और तैलाभिशेक संस्कारों द्वारा पवित्रात्मा को स्वीकार कर चुके हैं, उन्हें अन्तःकरण के निर्णयों में पवित्रात्मा की विशेष मदद मिलेगी। संत पौलुस सिखाते हैं, ‘मेरा अन्तःकरण पवित्रात्मा से प्रेरित है’। (रोमियों. 9ः1)

    अन्तःकरण का निर्माण

                                  मनुश्य जो भलाई चाहने पर भी बुराई करते हैं उन्हें भलाई में दृढ़ बने रहने में सच्चा अन्तःकरण मदद करेगा। वास्तविक ख्रीस्तीय जीवन में सच्चे अन्तःकरण का निर्माण आवश्यक है। भलाई और बुराई को पहचानना ही अन्तःकरण के निर्माण का प्रथम कार्य है। भलाई और बुराई को पहचानने का प्रशिक्षण भी प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक है। हम ख्रीस्तीयों को ईष-वचन और कलीसिया के प्रबोधन यह प्रशिक्षण प्राप्त करने में मदद देते हैं।
                              दूसरा कार्य मन का वह प्रशिक्षण है जो बुराई छोड़ने और भलाई के अनुरूप निर्णय लेने में हमें तैयार करता है। भलाई के जीवन की चुनौतियों का सामना करने में और भलाई में दृढ़ बने रहने में इस प्रशिक्षण के द्वारा हमारे मन को परिपक्वता और षक्ति मिलती है। भलाई करते हुए ईश्वर और अपने भाई-बहनों को प्यार करने की तत्परता भी यह प्रदान करता है। ये सब हैं - अन्तःकरण के निर्माण में हमारी मदद करने की महत्वपूर्ण बातें। 

    ख्रीस्तीय अन्तःकरण का निर्माण

                            ईष-वचन और कलीसिया के प्रबोधन के अनुसार गढ़ा हुआ अन्तःकरण है ख्रीस्तीय अन्तःकरण। जिस अन्तःकरण का निर्माण सही रूप से नहीं हुआ है, उस का निर्णय गलत हो सकता है। इसलिए हमें ख्रीस्तीय अन्तःकरण के निर्माण में ध्यान रखना चाहिए। निम्नलिखित बातें इसमें सहायक हैं:
                      1. सही ज्ञान प्राप्त करना: मानवीय और ख्रीस्तीय मूल्यों के बारे में ज्ञान और प्रषिक्षण लेना है। हर परिस्थिति में भलाई और बुराई को पहचानने का ज्ञान हमें  इसके द्वारा मिलेगा। 
                       2. सन्देहों को दूर करना: भलाई और बुराई के विशय में सही ज्ञान के आधार पर ही हमें निर्णय लेना है। यदि हमें कुछ संदेह हैं तो उन्हें दूर करने के लिए अच्छी पुस्तकें पढ़ना या किसी ज्ञानी से पूछना चाहिए। तब हम सही निर्णय ले सकेंगे। 
                        3. मन की स्वतंत्रता बनाये रखना: यदि स्वतंत्रता है, तो ही अन्तःकरण का कार्य सही होगा। अपनी स्वार्थता और दूसरों के असीमित प्रभाव के कारण     अन्तःकरण की स्वतंत्रता नश्ट न होने का ध्यान रखना है। तब ही हम अन्तःकरण की प्रेरणा के अनुसार कार्य कर सकेंगे। 
                       4. पवित्रात्मा की मदद माँगना: भलाई और बुराई को पहचानने में और भलाई को चुनकर कार्य करने में हमें पवित्रात्मा की षक्ति की जरूरत है। पवित्रात्मा के वरदान इसमें हमारी मदद करेंगे। इसलिए पवित्रात्मा की षक्ति के लिए हमें प्रार्थना करनी चाहिए।
    ईष-वचन और पवित्र कलीसिया के नियमों के अनुसार गढ़ा हुआ ख््राीस्तीय अन्तःकरण ईसा के यथार्थ जीवन बिताने में हमारी सहायता करेगा। अगर अन्तःकरण का सही निर्माण हुआ है तो सही रूप से अपने आपकी जाँच करने और उसके अनुसार जीवन को सुव्यवस्थित करने में हम सक्षम हो जायेंगे। समस्याओं से भरे आज के युग में सही ख्रीतीय जीवन बिताने में उपयुक्त मार्ग है उत्तम ख्रीस्तीय अन्तःकरण।

    हम प्रार्थना करें

    हे ईश्वर, भलाई करने और बुराई छोड़ने की प्रेरणा आप हमें अन्तःकरण द्वारा देते हैं। हमें अन्तःकरण की प्रेरणा के 
    अनुसार जीने की सहायता कीजिए।
     
     

    हम गाये

    बुराई को छोड़ देंगे, भलाई को हाथ में लेंगेएवं सब जन गायेंगे, आन्तरिक षब्द सुनेंगे।
    ईष का षब्द सुनने दे, कलीसिया की आज्ञा मानमनः साक्षी का आधार, षिला हो येसु षिश्यों का।
    विष्वास के उस प्रकाष में, भलाई को उत्थित होवेमन को सीधा ही बनाओ, है यह मन का कर्तव्य।
    स्वतन्त्रता के मनो-भाव, मूल बोधों को सोचेंगेपावन आत्मा षक्ति से, भलाई राह देखेंगे।
    उत्तम एवं मनःसाक्षी, देवजनों को लागू होनित्य जीवन मार्गों का, नित्य हमेषा चलने दे।
     
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    रोमियोंः 2ः1-16
     
     
     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

    “वे निर्मल अन्तःकरण से विष्वास के प्रति ईमानदार रहे।” (1 तिमथी 3ः9)
     

    हम करें

    अन्तःकरण और उससे प्राप्त प्रेरणा के बारे में अपने 
    मित्रों के साथ चर्चा कीजिए। 
     
     

    मेरा निर्णय

    अन्तःकरण की आवाज़ को कान देकर उसके अनुसार मैं कार्य करुँगा/गी।