•                          ईसा ने अपने क्रूसमरण के ठीक पहले अपने शिष्यों के साथ पास्का पर्व मनाया। पास्का भोज के वक्त ईसा ने शिष्यों को एक नयी आज्ञा दी। वह प्रेम की आज्ञा थी। ईसा ने अपने सार्वजनिक जीवन में जो शिक्षा दी थी उसका सारांष है प्रेम की आज्ञा। ईसा ने पिता ईश्वर द्वारा पुराने विधान की जनता को दी गयी दस आज्ञाओं की व्याख्या एवं पूर्ति करने के पष्चात उनकी पूर्णता के रूप में प्रेम की आज्ञा दी। “जिस प्रकार मैंने तुम लोगों को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो”। (योहन 13ः34)

    आज्ञाओं का सारांष

                              आज्ञाओं का सारांष है प्रेम। आज्ञाएँ यह प्रकट करती हंै कि प्रेम के द्वारा ही मानव जीवन का मार्गदर्शन होना है। ईसा ने सिखाया कि ईश्वर से प्रेम करना सबसे पहली और महत्वपूर्ण आज्ञा है और दूसरी आज्ञा - ‘भ्रातृप्रेम - पहली आज्ञा के समान महत्वपूर्ण है। प्रेम रूपी सिक्के के दो पहलू हैं - ईश्वर से प्रेम और भ्रातृप्रेम। 

    ईष्वर से प्रेम

                              प्रेम स्वरूप ईश्वर को प्यार करना सृश्टियों का अधिकार और कर्तव्य है। प्रेम की पूर्णता से ही ईश्वर ने हमारी रचना की। यही ईश्वर हमारी देखभाल और  संरक्षण करता है। ईश्वर को प्रेम करने और उसे ‘अब्बा-पिता’ पुकारने में ईसा हमें योग्य बनाते हैं।
                            ईसा ने हमें दिखाया है कि हमें ईश्वर को कैसे प्यार करना है। हमारे जीवन में ईश्वर को प्रथम स्थान देते हुए और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हुए, उनको आराधना और कृतज्ञता अर्पित करते हुए तथा भाईचारे के कार्य करते हुए ही हमें ईश्वर के प्रति अपना प्रेम प्रकट करना है।

    भ्रातृप्रेम

                      “यदि कोई यह कहता कि मैं ईश्वर को प्यार करता हँू और वह अपने भाई से बैर करता, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई को जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता, तो वह ईश्वर को जिसे उसने कभी देखा नहीं, प्यार नहीं कर सकता। इसलिए हमें मसीह से यह आदेश मिला है कि जो ईश्वर को प्यार करता है, उसे अपने भाई को भी प्यार करना चाहिए” (1 योहन 4ः20-21)। ख्रीस्तीय जीवन का मूल सिद्धांत है भ्रातृप्रेम । मनुश्य के लिए स्वजीवन समर्पित करते हुए ईसा ने ईश्वर के प्रति अपना प्रेम प्रकट किया। भले समारी के दृश्टान्त द्वारा ईसा ने यही सिखाया था। ( लूकस 10ः 25-37)
                       जो प्यार और करुणा का पात्र है उसे एक ईसाई अनदेखी नहीं कर सकता। हर ईसाई को यह याद रखनी चाहिये कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और सबको प्यार करना एवं सेवा करना अपना कर्तव्य है। कार्यों द्वारा हमें भ्रातृप्रेम को प्रकट करना है। हर ईसाई के जीवन में दया के कार्यों अथवा भाईचारे के कार्यों का महत्वपूर्ण स्थान है। अंतिम न्याय के दिन भ्रातृप्रेम के आधार पर ही ईश्वर हमारा न्याय करेगा। इसलिये बचपन से ही हमें भ्रातृप्रेम का अभ्यास करना है। परिवार में ही इसकी षुरुआत होनी चाहिए। माता-पिता और भाई-बहनों को प्यार करते हुए प्रेम का प्राथमिक पाठ हमें हासिल करना है। स्कूलों में, दोस्तों के बीच, तथा जीवन के अन्य परिस्थितियों में हमें प्रेम का आदर्श बनना चाहिए। 

    षत्रु-प्रेम - भ्रातृप्रेम का षिखर

                                      गोलगोथा के क्रूसमरण द्वारा ईसा ने हमें षत्रु-प्रेम का उदात्त आदर्श दिया है। दुःख भोगते हुए क्रूस पर टंगे ईसा की हँसी उड़ाई एवं उनका उपहास किया जनता ने। निर्दोश होने पर भी दोशी ठहराए गए ईसा ने क्रूस पर से इस प्रकार प्रार्थना की: “पिता! इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं” (लूकस 23ः34)। ईसा ने उन लोगों के लिए प्रार्थना की जिन्होंने उनको क्रूस पर चढ़ाया। ईसा के वचन एवं कर्म, प्रेम से ही उत्पन्न हुए थे। उन्होंने किसी को भी दुश्मन नहीं समझा। उन्होंने उनको भी प्यार किया जिन्होंने उन्हें दुश्मन मानकर अत्याचार किया। अपने षत्रुओं से प्यार करते हुए ईसा ने हमको प्रकट कर दिया कि षत्रु प्रेम है, भ्रातृप्रेम का षिखर। संसार के इतिहास में उस समय तक किसी ने भी षत्रु-प्रेम का यह पाठ नहीं सिखाया था।
     

     

     

    ईसा का आह्वान

                  संसार की विशेष नीति है अपने प्यार करने वालों को ही प्यार करना। लेकिन हमारे मुक्तिदाता और प्रभु मसीह का आह्वान इस के विपरीत है। उन्होंने सिखायाः “तुम लागों ने सुना है कि कहा गया है। अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर। परन्तु मैं तुम से कहता हँू - अपने षत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिये प्रार्थना करो“। (मत्ती 5ः43-44)
                         ईसा स्पश्ट करते हैं कि षत्रु-प्रेम हम कैसे कर सकते हैं। “अपने षत्रुओं से प्रेम करो। जो तुमसे बैर करते हैं, उनकी भलाई करो। जो तुम्हें षाप देते हैं, उनको आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिये प्रार्थना करो। जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो” (लूकस 6ः27-29)। इस प्रकार षत्रु से प्रेम करने के कई मार्ग ईसा ने सिखाया। ईसा द्वारा सिखायी गयी आदर्श प्रार्थना के महत्वपूर्ण भाग है, “हमारे अपराध क्षमा कर जैसे हमने भी अपने अपराधियों को क्षमा किया है” (मत्ती 6ः12)। यह प्रार्थना भी यही संदेश हमें देती है। इस का अर्थ यह है: अगर हम दूसरों को क्षमा नहीं करंेगे तो ईश्वर हमको भी क्षमा नहीं करेंगे। षत्रु-प्रेम के महत्व के बारे में यह हमें अवगत कराता है। इसलिए षत्रुओं को क्षमा प्रदान करते हुए, उनसे प्रेम करते हुए और उनके लिये प्रार्थना करते हुए हम षत्रु को मित्र बनाकर स्वीकार करें। पाप में गिर जाना मानवीय है, लेकिन क्षमा करना ईश्वरीय है। जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं तब हम ईश्वरीय स्वभाव में षामिल हो जाते हैं।

     

    ईसा का आह्वान

                  संसार की विशेष नीति है अपने प्यार करने वालों को ही प्यार करना। लेकिन हमारे मुक्तिदाता और प्रभु मसीह का आह्वान इस के विपरीत है। उन्होंने सिखायाः “तुम लागों ने सुना है कि कहा गया है। अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर। परन्तु मैं तुम से कहता हँू - अपने षत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिये प्रार्थना करो“। (मत्ती 5ः43-44)
                         ईसा स्पश्ट करते हैं कि षत्रु-प्रेम हम कैसे कर सकते हैं। “अपने षत्रुओं से प्रेम करो। जो तुमसे बैर करते हैं, उनकी भलाई करो। जो तुम्हें षाप देते हैं, उनको आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिये प्रार्थना करो। जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो” (लूकस 6ः27-29)। इस प्रकार षत्रु से प्रेम करने के कई मार्ग ईसा ने सिखाया। ईसा द्वारा सिखायी गयी आदर्श प्रार्थना के महत्वपूर्ण भाग है, “हमारे अपराध क्षमा कर जैसे हमने भी अपने अपराधियों को क्षमा किया है” (मत्ती 6ः12)। यह प्रार्थना भी यही संदेश हमें देती है। इस का अर्थ यह है: अगर हम दूसरों को क्षमा नहीं करंेगे तो ईश्वर हमको भी क्षमा नहीं करेंगे। षत्रु-प्रेम के महत्व के बारे में यह हमें अवगत कराता है। इसलिए षत्रुओं को क्षमा प्रदान करते हुए, उनसे प्रेम करते हुए और उनके लिये प्रार्थना करते हुए हम षत्रु को मित्र बनाकर स्वीकार करें। पाप में गिर जाना मानवीय है, लेकिन क्षमा करना ईश्वरीय है। जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं तब हम ईश्वरीय स्वभाव में षामिल हो जाते हैं।

    ईसा द्वारा प्रदत्त नयी आज्ञा

                              अंतिम भोज के वक्त ईसा ने अपने शिष्यों के पैर धोये और उन्हें अँगोछे से पोंछे। प्रेम और विनम्रता का सबसे बड़ा प्रमाण देने के बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ‘मैंने तुम्हें एक उदाहरण दिया है’ (योहन 13ः15)। उसके बाद ईसा ने उन्हें एक आज्ञा दीः “मैं तुम लोगों को एक नयी आज्ञा देता हँू - तुम एक दूसरे को प्यार करो। जिस प्रकार मैंने तुम लोगों को प्यार किया उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो” (योहन 13ः34-35)। सभी आज्ञाओं की व्याख्या एवं स्पश्टीकरण देकर ईसा ने उन सबको ‘प्रेम’ की एक आज्ञा में संग्रहित किया। ईसा ने शिष्यों से आग्रह किया, ‘जिस प्रकार मैंने तुम लोगों को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।’ इस प्रेम को प्रकट करने के मार्ग हैं दया के कार्य।
                               ईसा के प्रेम की कुछ विशेषताएँ हैं; उनके प्रेम में स्वार्थता नहीं है। उन का प्रेम दूसरों की सेवा में स्वयं को समर्पित करता है और षत्रुओं को भी क्षमा करता है। उनका प्रेम किसी षर्त पर आधारित नहीं है, वह त्यागपूर्ण पे्रम है। उनका प्रेम सबको ईश्वर की ओर खींच लेता है।
                            ईसा के प्रेम की ये विशेषताएँ हमारे प्रेम में भी होनी चाहिए। तब हम हकीकत में उनके शिष्य बन जाते हैं। प्रेम में बढ़ने और प्रेम में बने रहने में हमें सक्षम होना चाहिए। अगर हम ईसा के समान प्रेम कर सकें तो इस संसार में ही हम ईश्वर के राज्य का अनुभव हासिल कर सकेंगे।

    दया के कार्य चैदह

    षरीर संबंधी सात

    1. भूखों को खिलाना।
    2. प्यासों को पिलाना
    3. नंगों को पहनाना।
    4. बेघरों को आश्रय देना।
    5. बीमारों और कैदियों से मिलना।
    6. कमज़ोरों और निराश्रितों की मदद करना
    7. मुर्दों को दफनाना। 

    आत्मा संबंधी सात

    1. अषिक्षितों को षिक्षा देना।
    2. भटकने वालों को मार्गदर्शन देना।
    3. दुःिखयों को दिलासा देना। 
    4. अपराधियों को सुधारना। 
    5. हानि करने वालों को क्षमा करना।
    6. दूसरों की कमियाँ सहनषीलता से झेलना।
    7. जीवितों और मृतकों के लिये प्रार्थना करना।
     

    हम प्रार्थना करें

    हे ईसा मसीह आपने भ्रातृप्रेम का परम उदात्त नमूना हमें दिया; जिस प्रकार आपने हमें प्यार किया उसी प्रकार एक-दूसरे को प्यार करने की कृपा हमें दीजिए।
     
     

    हम गायें

    ‘प्यारा है ईष्वर’ यह इक आज्ञा, प्यार की यह बात सब मानवों को
    पूर्ण मानस से, पूर्ण आत्मा से, प्यार करो ईष को सब से ऊपर।
    तुम जैसे इतरों को प्यार करो, तुम भी और इतरों को षिश्य होवो
    येसु ने दे दिया आचार अनुश्ठान, षत्रु को मित्र भी हम मानेंगे।
    ईष्वर को प्यार करो पूरित हृदय से, सत्क्रत्य, प्रार्थना, आराधना से
    कृपा से परिपूर्ण हृदय को ले लो, ईष्वर की इच्छा पूरित होवो।
    स्वर्गीय पिता के निर्मल प्यार से, जीवन बलि से दिया है येसु
    आदेष है प्रभु इतना श्रेश्ठतम, लिया करेंगे प्यार में जीवन।
     
     
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    योहन 13ः 1-20
     
     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

    “यदि मैं - तुम्हारे प्रभु और गुरु - ने तुम्हारे पैर धोये हैं, 
    तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोने चाहिए”। (योहन 13ः14)
     
     

    हम करें

    ईसा ने हमें प्रेम का नमूना दिया; 
    पाँच ऐसे संतों के नाम ढूँढिए जिन्होंने उसे अपनाकर जीवन बिताया।
     
     
     

    मेरा निर्णय\

    मैं हर दिन कम से कम दया का 

    एक कार्य करूँगा/गी।