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             संत मत्ती के सुसमाचार में हम ईसा मसीह को, पति-पत्नी के सम्बन्ध के महत्व के बारे में फरीसियों से बातें करते देखते हैं। यहाँ ईसा स्पश्ट करते हैं कि विवाह के ज़रिये पति और पत्नी एक हो जाते हैं। ‘‘इस तरह अब वे दो नहीं बल्कि एक शरीर हैं। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है उसे मनुश्य अलग नहीं करें’’ (मत्ती 19ः6)। प्रभु ने यह सिखाया।

    वैवाहिक सम्बन्ध पुराने विधान में

                      उत्पत्ति ग्रन्थ यह व्यक्त करता है कि ईश्वर ही स्त्री-पुरुशों को वैवाहिक सम्बन्ध और पारिवारिक जीवन की ओर ले जाता है। ईश्वर ने स्त्री और पुरुश, दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में बनाया। ईश्वर ने चाहा कि मनुश्य के लिए अकेला रहना अच्छा नहीं; इसलिए वे परस्पर साथी और सहारा बनकर जीयें (उत्पत्ति 2ः18)। उन्होंने एक-दूसरे को अपने माँस के माँस और हड्डी की हड्डी मानकर स्वीकारा। संतानों को देते हुए ईश्वर ने उनके प्रेम की एकता को अनुगृहीत किया।
                         पुराने विधान की जनता विवाह को एक आदर्श जीवन की स्थिति मानती थी। उन्हें मालूम था कि यह एक अति पवित्र करार है। इसीलिए इस्राएल और ईश्वर के बीच के संबन्ध को पति-पत्नी के आपसी सम्बन्ध से वे तुलना करते  थे। नबियों ने अविष्वासी इस्राएल को विश्वासघाती पत्नी के रूप में प्रस्तुत किया। यहूदी जनता दाम्पत्य जीवन के विष्वासघात को घोर पाप मानती थी।

     

    वैवाहिक सम्बन्ध नये विधान में

                     ईसा अपने सार्वजनिक जीवन का पहला चमत्कार काना के विवाह भोज के अवसर पर करते हंै। इस विवाह भोज में ईसा की उपस्थिति का बडा महत्व है। यह उपस्थिति उस कृपा को सूचित करती है जो विवाह के द्वारा दम्पति स्वीकार करते हंै। विवाह ईसा की उपस्थिति का फलदायक चिह्न बन गया।
                                 ईसा और कलीसिया के बीच जो सम्बन्ध है उसे संत पौलुस वैवाहिक सम्बन्ध के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। “पतियो! अपनी पत्नी को उसी तरह प्यार करो, जिस तरह मसीह ने कलीसिया को प्यार किया। उन्होंने उस के लिए अपने को अर्पित किया” (एफेसियों 5ः25)। मसीह और कलीसिया के बीच के संबन्ध की ओर विवाह संकेत करता है। इस संबन्ध का संस्कार है विवाह। इस संस्कार के द्वारा पति-पत्नी प्रचुर मात्रा में ईश्वर की कृपा प्राप्त करते हैं।।
     

    वैवाहिक सम्बन्ध नये विधान में

                     ईसा अपने सार्वजनिक जीवन का पहला चमत्कार काना के विवाह भोज के अवसर पर करते हंै। इस विवाह भोज में ईसा की उपस्थिति का बडा महत्व है। यह उपस्थिति उस कृपा को सूचित करती है जो विवाह के द्वारा दम्पति स्वीकार करते हंै। विवाह ईसा की उपस्थिति का फलदायक चिह्न बन गया।
                                 ईसा और कलीसिया के बीच जो सम्बन्ध है उसे संत पौलुस वैवाहिक सम्बन्ध के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। “पतियो! अपनी पत्नी को उसी तरह प्यार करो, जिस तरह मसीह ने कलीसिया को प्यार किया। उन्होंने उस के लिए अपने को अर्पित किया” (एफेसियों 5ः25)। मसीह और कलीसिया के बीच के संबन्ध की ओर विवाह संकेत करता है। इस संबन्ध का संस्कार है विवाह। इस संस्कार के द्वारा पति-पत्नी प्रचुर मात्रा में ईश्वर की कृपा प्राप्त करते हैं।।
     

    विवाह की अभेद्यता

                            विवाह मरण तक बने रहने का सम्बन्ध है। स्त्री और पुरुश के बीच के सम्बन्ध से अतिरिक्त वे दोनों विवाह के द्वारा मसीह में एक बन जाते हैं। चूँकि ईश्वर ही यह सम्बन्ध जोड़ता है इसलिए इसे अलग नहीं किया जा सकता है। इसको विवाह की अभेद्यता कहते हैं।
    टूटते पारिवारिक सम्बन्धमनुश्य के आपसी सम्बन्धों में सब से पवित्र है वैवाहिक सम्बन्ध। वैवाहिक पवित्रता की उपेक्षा करने के कारण आधुनिक युग में पारिवारिक संबन्धों के षिथिल होने का मुख्य कारण वैवाहिक  पवित्रता की उपेक्षा है। वैवाहिक शुद्धता मुख्यतः अविष्वस्तता के कारण भंग होती है। एक-दूसरे के लिए संपूर्ण रूप से समर्पित हैं पति और पत्नी।
                           धन, सौन्दर्य आदि को वैवाहिक जीवन के आधार मानने पर पारिवारिक सम्बन्ध टूटने लगते हंै। पारिवारिक जीवन का बुनियाद निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए।
                               यदि जीवनसाथी का आदर और निश्कलंक प्रेम नहीं किया जाता है, तो पारिवारिक सम्बन्ध दुर्बल हो जाते हैं। यदि पारिवारिक जीवन में दुःख और कठिनाइयों को खुषी से झेलने और एक-दूसरे की गलतियों को क्षमा करने में वे असमर्थ होते हैं, तो इसका कारण है परस्पर आदर और प्रेम का अभाव।चाहे मुसीबतें कितनी भी बड़ी क्यों न हों विवाहितों को एक शरीर और एक मन होकर जीवन बिताना चाहिए। स्वार्थता ही अकसर दम्पतियों को विवाह-विच्छेद के लिए प्रेरित करती है। विवाह-विच्छेद समाज के सुव्यवस्था को ठेस पहुंँचाता है। विवाह-विच्छेद का बुरा असर सब से ज़्यादा बच्चों पर पड़ता है। इस के द्वारा माता-पिता के प्रेम और संरक्षण से बच्चे वंचित रह जाते हैं। ईसा ने निस्संदेह सिखाया कि विवाह-विच्छेद की अनुमति नहीं है। वे कहते हैं: “जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुश्य अलग नहीं करे”। (मत्ती 19ः6)

    वैवाहिक षुद्धता

                         विवाह के द्वारा दम्पति एक पवित्र जीवन में प्रवेश करते हैं। एक दूसरे के प्रति संपूर्ण समर्पण है पवित्रता का उनका मार्ग। वे अपने तन, मन और आत्मा जीवन साथी को प्रदान करते हैं। इसलिए ‘परस्त्री का लालच मत करो’ की आज्ञा का अर्थ यह है कि इस वैवाहिक संबन्ध में किसी तीसरे व्यक्ति का प्रवेश न हो। यह वैवाहिक शुद्धता सुरक्षित रखने की आज्ञा है। यह आज्ञा याद दिलाती है कि अपने जीवनसाथी को पूर्ण रूप से प्यार करना चाहिए। संत पौलुस यह भी याद दिलाते हैं कि जो अपने जीवनसाथी को ऐसे प्यार करता है मानो वह अपना शरीर है, वह खुद को ही प्यार करता है। (एफेसियों 5ः28-29)
                                  अच्छे परिवार हैं कलीसिया और समाज की रीढ़। इसलिए ख्रीस्तीय दम्पति वैवाहिक पवित्रता में अटल रहते हुए मसीह के शरीर रूपी कलीसिया का निर्माण करें।

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रभु, वैवाहिक जीवन के महत्व और पवित्रता को समझते हुए 
    परस्पर प्रेम एवं एकता में ईश्वर के साथ जीवन 
    बिताने का अनुगृह दम्पतियों को दीजिए।
     

    हम गायें

    ईष ने नर को प्यार किया, वह अपना दान नर को दिया
    निर्मल प्यार के बाग में ही, स्त्री और पुरुश भी एक बनें।
    पवित्र है ये दिव्य बन्धुता, ईष्वर की है सत्य बंधुता
    विष्वस्तता है प्रतिबंधुता, अभेद्यता ही यह बंधुता।
    षरीर, देही और मानस, पावन वेदी पर बलि समान
    नव जीवन ही बढ़ने दे, नव ज्योति अब देने को।
    नन्हें लाड़के बढ़े होते, कलीसिया के रूप में ही
    दिव्य प्रसाद को दर्षाते, पिता परमेष्वर वर दे दे।
     
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    उत्पत्ति 2ः22-24
     
     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

    धन्य हैं वे, जिन का हृदय निर्मल है; 
    वे ईश्वर के दर्शन करेंगे। (मत्ती 5ः8)
     
     

    हम करें

    पारिवारिक संबन्ध सुदृढ़ बनाने के लिए 
    क्या क्या जरूरी हैं, इस पर चर्चा कीजिए।
     
     
     

    मेरा निर्णय

    परिवारों की पवित्रीकरण के लिए 
    मैं हर दिन प्रार्थना करूँगा/गी।