•               फरीसी और षास्त्री इस ताक में रहते थे कि ईसा में कुछ न कुछ गलतियाँ ढूँढ़ निकालें। एक दिन उन्होंने ईसा से षिकायत की कि उनके षिश्यों ने बिना हाथ धोये भोजन किया है। उन्होंने षिश्यों पर दोश लगाया कि वे पुरखों की परम्परा तोड रहेे हैं। ईसा ने उसका जवाब देते हुए कहा, माता-पिता का आदर करने की आज्ञा ईष्वर ने दी है। लेकिन तुम लोग कैसे कह सकते हो कि कुरबानी देने से उन के प्रति तुम ने अपना कर्तव्य पूरा किया है। ईसा ने उन से अनुरोध किया कि उन्हें परम्परा के नाम पर ईष्वर की आज्ञा का उल्लंघन करना छोड़ देना चाहिए। (मारकुस 7ः1-13)

                                    

    चैथी आज्ञा - पुराने विधान में

                                 मूसा द्वारा दी गई ईष्वर की आज्ञाओं में चैथी इस प्रकार हैः “अपने माता-पिता का आदर करो जिससे तुम बहुत दिनों तक उस भूमि पर जीते रहो, जिसे तुम्हारा प्रभु ईष्वर तुम्हंे प्रदान करेगा” (निर्गमन ग्रंथ 20ः12)। इस आज्ञा की व्याख्या हम पुराने विधान के प्रवक्ता ग्रंथ में देखते हंै। ‘‘प्रभु का आदेष है कि संतान अपने पिता का आदर करे; उसने माता को अपने बच्चों पर अधिकार दिया है। जो अपने पिता पर श्रद्धा रखता है, वह अपने पापों का प्रायष्चित करता है और जो अपनी माता का आदर करता है, वह मानो धन का संचय करता है... जो अपने पिता का आदर करता है, वह दीर्घायु होगा। जो अपनी माता को सुख देता है, वह प्रभु का आज्ञाकारी है’’ (प्रवक्ता ग्रंथ 3ः3-7)।
                         माता-पिता का आदर करने से जो आषीर्वाद मिलती है, उस के बारे में पुराने विधान के कई स्थानों में विवरण दिया गया है। इस प्रकार इस आज्ञा का उल्लंघन करने से जो हानियाँ होती हैं उन के बारे में चेतावनियाँ भी हैं (सूक्ति ग्रंथ 30ः17)। “जो अपने पिता का त्याग करता, वह ईष-निन्दक के बराबर है। जो अपनी माता को दुःख देता है, वह ईष्वर द्वारा अभिषप्त है’’ (प्रवक्ता ग्रंथ 3ः18)। जो इस आज्ञा का पालन करता है, ईष्वर ने उसको लम्बी आयु का वादा भी किया है। (विधि-विवरण ग्रंथ 5ः16)

    .चैथी आज्ञा - नये विधान में

                            समाज का मूल आधार परिवार है। अच्छे परिवार से अच्छा समाज और अच्छी दुनिया बनती है। जहाँ माता-पिता और बच्चे एक दूसरे को प्यार करते और सहयोग देते रहते हंै, वे ही आदर्ष परिवार हैं। चैथी आज्ञा का पालन अच्छे परिवारों का सृजन करता है। इस के लिए आवश्यक निर्देष और आदर्श नये विधान में हम देख सकते हंै।
                              ईसा ने एक परिवार के सदस्य के रूप में जन्म लिया। मरियम और यूसुफ़ के अधीन रहकर नाज़रेत में जीवन बिताया (लूकस 2ः51)। ईष्वर के पुत्र ईसा ने अपने माता-पिता के अधीन जीवन बिताकर हमारे लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया। माता-पिता हमारे स्वर्गीय पिता के प्रतिनिधि हैं। उनका आदर करना और उन्हें प्यार करना ईश्वर का ही आदर और प्यार करने के बराबर हैं। नाज़रेत का पवित्र परिवार हमें यह सिखाता है कि एक ईसाई परिवार किस प्रकार होना चाहिए। उसमें माता-पिता को बच्चों के प्रति और बच्चों को माता-पिता के प्रति कर्तव्य होते हैं। उनके बारे में नया विधान आधिकारिक रूप से हमें सिखाता है।

    बच्चों के कर्तव्य

                             ईष्वर के बाद हमारे जीवन और विकास के उत्तरदायी और सरंक्षक माता-पिता हंै। इसलिए उन का आदर और उनसे प्यार करना बच्चों का कर्तव्य है। यह एक ईष्वरीय आज्ञा और प्राकृतिक नियम है। इसलिए संत पौलुस कहते हैं: “बच्चो! अपने माता-पिता काी आज्ञा मानो, क्यांेकि यह उचित है” (एफेसि. 6ः1)। माता-पिता की आज्ञा मानते हुए उनका आदर करना है। माता-पिता का आदर करना केवल बचपन में नहीं, बल्कि जीवन भर बच्चों का कर्तव्य है। परिवार की षान्ति और कल्याण के लिए यह जरूरी है। माता-पिता को ईश्वरीय आज्ञा के विरुद्ध और अनैतिक सलाहें बच्चों को नहीं देनी चाहिए। इस प्रकार की आज्ञाओं का पालन करने के लिए बच्चे बाध्य नहीं हैं। 
                          “सारे हृदय से अपने पिता का आदर करो और अपनी माता का दुःख न भुलाओ। याद रखो कि तुम्हें उनसे जन्म मिला” (प्रवक्ता ग्रंथ 7ः29-30)। यह माता-पिता के प्रति बच्चों के कर्तव्यों की याद दिलाता है। हमें यह समझकर माता-पिता से प्यार करना चाहिए कि अपने जीवन और ज़िन्दगी के पीछे की महत्वपूर्ण ताकत माता-पिता का त्याग और कुरबानी है। हमें उनके प्रति हमेषा कृतज्ञ रहना चाहिए; अपनी कथनी और करनी द्वारा यह प्रकट करना है। माता-पिता जब बीमार होते हैं और बूढ़े होते हैं तब उनकी सेवा-षुश्रूशा द्वारा उन्हें सांत्वना देनी चाहिए। उन्हें षारीरिक और आध्यात्मिक सहायतायें उपलब्ध करानी चाहिए। प्रेमपूर्ण परिचर्या एंव बातचीत द्वारा उनके अकेलेपन और कठिनाइयों को दूर करना चाहिए। ये हैं माता-पिता के प्रति बच्चों के महत्वपूर्ण कर्तव्य। 
                     अपने बूढ़े माता-पिता का उचित देखभाल न करके उन्हें बेसहारा छोड़ना बच्चों का बड़ा अपराध है। माता-पिता का उपहास करना और अपमान करना, उन्हें गालियाँ देना और षारीरिक पीड़ा देना आदि इस आज्ञा के खिलाफ़ गंभीर गलतियाँं हैं।
     

     

    माता-पिता के कर्तव्य

                              “पिता अपने बच्चांे को खिझाया नहीं करें, बल्कि प्रभु के अनुरूप षिक्षा और उपदेष द्वारा उनका पालन -पोशण करें” (एफेसि. 6ः4)। बच्चे ईष्वर की देन हैं; इसलिए उनकी देखभाल इस प्रकार करनी चाहिए कि वे ईष्वर के प्यारे हों। माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों का आध्यात्मिक, षारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण और सुविधा प्रदान करें।
                              माता-पिता के प्यार से ही बच्चे ईश्वर के प्यार की गहराई और अर्थ समझते हंै। इसलिए उन्हें अपने बच्चों के प्रति अपना प्यार प्रकट करना है। अच्छे प्रषिक्षण देकर उनका पालन-पोशण करना भी माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। दूसरी महत्वपूर्ण बात माता-पिता का आदर्ष जीवन है। बढ़ती उम्र में बच्चों को अच्छा आदर्श प्रस्तुत करने में माता-पिता को ध्यान देना चाहिए। 

    माता-पिता के कर्तव्य

                              “पिता अपने बच्चांे को खिझाया नहीं करें, बल्कि प्रभु के अनुरूप षिक्षा और उपदेष द्वारा उनका पालन -पोशण करें” (एफेसि. 6ः4)। बच्चे ईष्वर की देन हैं; इसलिए उनकी देखभाल इस प्रकार करनी चाहिए कि वे ईष्वर के प्यारे हों। माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों का आध्यात्मिक, षारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण और सुविधा प्रदान करें।
                              माता-पिता के प्यार से ही बच्चे ईश्वर के प्यार की गहराई और अर्थ समझते हंै। इसलिए उन्हें अपने बच्चों के प्रति अपना प्यार प्रकट करना है। अच्छे प्रषिक्षण देकर उनका पालन-पोशण करना भी माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। दूसरी महत्वपूर्ण बात माता-पिता का आदर्ष जीवन है। बढ़ती उम्र में बच्चों को अच्छा आदर्श प्रस्तुत करने में माता-पिता को ध्यान देना चाहिए। 

    अधिकारियों और बुज़ुर्गो का आदर करना

                                  चैथी आज्ञा की सीमा में न केवल माता-पिता, बल्कि गुरुजन और अधिकारी लोग भी आते हैं। बच्चों को गुरुजनों का आदर और आज्ञापालन करना चाहिए। विद्यार्थियों को गुरु-षिश्य रिष्ते का महत्व समझकर व्यवहार करना चाहिए। अधिकारियांे का आदर करना हमारा फ़र्ज़ है, क्यांेकि अधिकार ईष्वर का दिया हुआ है। (रोमि. 13ः1) 
                                  ज्येश्ठ भाई-बहनों का हमें विशेष रूप से आदर करना है। हम से बड़े किसी भी व्यक्ति से आदर के साथ व्यवहार करने की विनम्रता हम में होनी चाहिए। पड़ोसियों और रिष्तेदारों से आदर के साथ व्यवहार करने में हमें ध्यान हम स्वर्ग को लक्ष्य बनाकर जी रहे हैं; चैथी आज्ञा हमें इस संसार में आनंद और षांति से जीने का मार्गदर्षन करती है। “पुत्र! अपने पिता की षिक्षा पर ध्यान दो, अपनी माता की सीख अस्वीकार मत करो। यह मानो तुम्हारे सिर का सुन्दर मुकुट होगा तुम्हारे कण्ठ को सुषोभित करने वाली माला” (सूक्ति ग्रंथ 1ः8-9)। यह ईष-वचन याद कर हम इस के अनुसार जीयें
     

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रेममय ईसा, आप नाज़रेत के पवित्र परिवार में माता-पिता के अधीन रहकर बड़े हो गये; वैसे ही माता-पिता के अधीन रहकर बढ़ने और परिपक्व होने की मुझे आषिश दीजिए।
     
     

    हम गायें

    आदर करना माता-पिता का, ईष-आदेष को येसु पाला
    जो कोई माँ-बाप अनुकरण करे, ईष के मार्ग उसमें चलाते।
    उक्त प्रकार की अवज्ञा कर तो, षाप व मृत्यु भी हाथ में लोगे
    प्यार और संतोश घर में रहते, वह घर सर्वत्र स्वर्गी समन।
    माता-पिता व सारे लोगो, प्यार के बंधन से सूत्र में बाँधें
    प्यार के समर्पण, धन्यवद, ऐष्वर्य, घर की कुलीनता, जीवन हो।
     
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    एफेसि. 6ः1-4
     
     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

    ‘‘अपने माता-पिता का आदर करो जिससे तुम बहुत दिनों 
    तक उस भूमि पर जीते रहो जिसे तुम्हारा प्रभु ईश्वर 
    तुम्हें प्रदान करेगा।’’ (निर्गमन ग्रंथ 20ः12)
     

    हम करें

    माता-पिता की सहायता करने के पाँच अवसर लिखिए।
     
     

    मेरा निर्णय

    मैं माता-पिता और बुजु़र्गों का आदर करूँगा/गी।