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            ईसा ने एक बार अपने षिश्यों को प्रार्थना करना सिखाया। उस प्रार्थना का प्रांरभ इस प्रकार है, “हे हमारे पिता, जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाए।” इसके द्वारा ईसा यह व्यक्त करता है कि ईष्वर के नाम का उपयोग सम्मान और आदर के साथ करना चाहिए। ईष्वर की आज्ञाओं में दूसरी यह है - “प्रभु अपने ईष्वर का नाम व्यर्थ मत लो।”

     

    ईष्वर का नाम पुराने विधान में

        ’ईष्वर का नाम’ - इसको हमें पुराने विधान की पृश्ठभूमि में समझना चाहिए। जब ईश्वर ने झाड़ी में प्रकट होकर बातें कीं तब मूसा ईश्वर से नाम पूछता है। परन्तु ईश्वर मूसा को अपना नाम स्पश्ट रूप से नहीं बताता; बल्कि यही जवाब देता है कि “मेरा नाम सत् है” (निर्गमन 3ः13-14)। किसी एक विषेश नाम में पूरा ईष्वरत्व समा नहीं सकता है। ईष्वर होने से किसी एक विषेश नाम में उसे सीमित रखना भी असंभव है।
                           ‘ईष्वर का नाम’ ईष्वर का सान्निध्य ही है। किसी का नाम जानने का मतलब उस व्यक्ति को जानना है। नबी के द्वारा प्रभु यह कहता हैः “उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक राश्ट्रों के बीच में मेरा नाम महिमावान है” (मलआकी 1ः11)। इस्राएली “यहोवा” षब्द को, जो ईश्वर को सूचित करता है, अपनी बातचीत में इस्तेमाल नहीं करते थे; वे उसे आज्ञा का उल्लंघन समझते थे। किसी को नाम लेकर पुकारना उस व्यक्ति पर अधिकार को सूचित करता है। ईष्वर पर मनुश्यों का कोई अधिकार नहीं है। हम केवल उसकी आराधना कर सकते हैं। 

    ईष्वर का नाम पुराने विधान में

        ’ईष्वर का नाम’ - इसको हमें पुराने विधान की पृश्ठभूमि में समझना चाहिए। जब ईश्वर ने झाड़ी में प्रकट होकर बातें कीं तब मूसा ईश्वर से नाम पूछता है। परन्तु ईश्वर मूसा को अपना नाम स्पश्ट रूप से नहीं बताता; बल्कि यही जवाब देता है कि “मेरा नाम सत् है” (निर्गमन 3ः13-14)। किसी एक विषेश नाम में पूरा ईष्वरत्व समा नहीं सकता है। ईष्वर होने से किसी एक विषेश नाम में उसे सीमित रखना भी असंभव है।
                           ‘ईष्वर का नाम’ ईष्वर का सान्निध्य ही है। किसी का नाम जानने का मतलब उस व्यक्ति को जानना है। नबी के द्वारा प्रभु यह कहता हैः “उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक राश्ट्रों के बीच में मेरा नाम महिमावान है” (मलआकी 1ः11)। इस्राएली “यहोवा” षब्द को, जो ईश्वर को सूचित करता है, अपनी बातचीत में इस्तेमाल नहीं करते थे; वे उसे आज्ञा का उल्लंघन समझते थे। किसी को नाम लेकर पुकारना उस व्यक्ति पर अधिकार को सूचित करता है। ईष्वर पर मनुश्यों का कोई अधिकार नहीं है। हम केवल उसकी आराधना कर सकते हैं। 

     

    ईष्वर का नाम नये विधान में

                             ईसा ने एक बार इस प्रकार प्रार्थना कीः ‘पिता ! अपनी महिमा प्रकट कर।’ उसी समय यह स्वर्गवाणी सुनाई पड़ी, ‘मैने उसे प्रकट किया है और फिर उसे प्रकट करूँगा’ (योहन 12ः28)। ईष्वर के नाम को महिमान्वित करने में ईसा ज़्यादा महत्व दिया करते थे। ईसा अपने पिता से बातचीत करने के लिए सरल एवं हृद्यस्पर्षी षब्द ‘आबा’ का उपयोग करता था जिसका उपयोग बच्चे अपने पिता को पुकारने के लिए करते थे।
                       इ्र्रष्वर के नाम के जैसा उसके पुत्र ईसा का नाम भी पूजनीय है। ईसा के नाम में मुक्तिदायक षक्ति है। इसलिए ईसा ने सिखाया, “तुम पिता से जो कुछ माँगोगे, वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा” (योहन 16ः23)। जन्म से लंगड़े एक व्यक्ति को प्रेरित पेत्रुस ने यह कहते हुए चंगाई दी थीः “ईसा मसीह नाज़री के नाम पर चलो” (प्रेरित-चरित 3ः6)। फिर एक बार संत पेत्रुस ने इस प्रकार भाशण दियाः “समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुश्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है” (प्रेरित-चरित 4ः12)। इसलिए हमें ईष्वर के नाम को महिमान्वित करना है। धर्मग्रन्थ हमें सिखाता है कि जब हम ईष्वर के नाम की महिमा गाते हंै तब हम ईष्वर की ही महिमा गाते हैं।

    ईष्वर का नाम नये विधान में

                             ईसा ने एक बार इस प्रकार प्रार्थना कीः ‘पिता ! अपनी महिमा प्रकट कर।’ उसी समय यह स्वर्गवाणी सुनाई पड़ी, ‘मैने उसे प्रकट किया है और फिर उसे प्रकट करूँगा’ (योहन 12ः28)। ईष्वर के नाम को महिमान्वित करने में ईसा ज़्यादा महत्व दिया करते थे। ईसा अपने पिता से बातचीत करने के लिए सरल एवं हृद्यस्पर्षी षब्द ‘आबा’ का उपयोग करता था जिसका उपयोग बच्चे अपने पिता को पुकारने के लिए करते थे।
                       इ्र्रष्वर के नाम के जैसा उसके पुत्र ईसा का नाम भी पूजनीय है। ईसा के नाम में मुक्तिदायक षक्ति है। इसलिए ईसा ने सिखाया, “तुम पिता से जो कुछ माँगोगे, वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा” (योहन 16ः23)। जन्म से लंगड़े एक व्यक्ति को प्रेरित पेत्रुस ने यह कहते हुए चंगाई दी थीः “ईसा मसीह नाज़री के नाम पर चलो” (प्रेरित-चरित 3ः6)। फिर एक बार संत पेत्रुस ने इस प्रकार भाशण दियाः “समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुश्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है” (प्रेरित-चरित 4ः12)। इसलिए हमें ईष्वर के नाम को महिमान्वित करना है। धर्मग्रन्थ हमें सिखाता है कि जब हम ईष्वर के नाम की महिमा गाते हंै तब हम ईष्वर की ही महिमा गाते हैं।

    ईष्वर के नाम का उपयोग

                                   ईष्वर के नाम का उपयोग हमेषा आदर से ही करना चाहिए। कभी हलफ़नामा या षपथ लेते समय ईष्वर के नाम का उपयोग करना जरूरी हो सकता है। अदालतों एवं प्रषासकीय स्थानों में ईष्वर के नाम पर सच्चाई का प्रस्ताव करना पड़ता; बड़ी ज़िम्मेदारी को संभालते समय ईष्वर के नाम पर षपथ खानी पड ती है; इन अवसरों पर ईष्वर की महिमा के अनुरूप सम्मान के साथ उस पवित्र नाम का उपयोग करना चाहिए।
                                 ईष्वर के नाम पर झूठे शपथ लेना और कसम खाना भी पाप है। ईष्वर से सम्बन्धित बातें करते समय आदर भरे षब्दों का प्रयोग करना चाहिए। ईष्वर के  बारे में ऐसे षब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जो परिहास, घृणा, निन्दा आदि को अभिव्यक्त करते हैं।। ये सब ईष-निन्दा हैं। ईष्वर की परिपालनिक षक्ति पर प्रष्न उठाना और ईष्वर को दयाहीन एवं अन्यायी ठहराना गंभीर गलतियाँ हंै।
                     क्रोध आ जाने पर अभिषाप भरे षब्दों का उपयोग करने वाले हंै। वे दूसरी आज्ञा का उल्लंघन करते हैं। ईष्वर की छाया में बनाये गये भाई-बहनों पर षाप बरसाना ईष्वर के नाम की अवहेलना है। गाली, झूठा कथन, अनुचित बातचीत आदि से बचकर रहना चाहिए। हमें अपनी ज़बान का उपयोग ईष्वर की महिमा बढ़ाने के लिए करना चाहिए। दूसरी आज्ञा हमसे यह आग्रह करती है कि हमें अपनी ज़बान का उपयोग ईष्वर की महिमा एवं दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए। ईष-निन्दा एवं अपषब्द इस आज्ञा के खिलाफ़ बुराइयाँ हैं।
     

    पवित्र लोगांे एवं वस्तुओं का आदर करना

                              पवित्र कुँवारी मरियम एवं अन्य संतों के बारे में हमें आदर से बोलना चाहिए। वे ईष्वर के प्यारे हैं। हमें उन व्यक्तियों, स्थानों एवं चीज़ों का सम्मान करना चाहिए जो ईष्वर के लिए समर्पित हंै। पुरोहित, सन्यासी एवं सन्यासिनियाँ ईष्वर को समर्पित हैं, इसलिए उनका आदर करना चाहिए। गिरजाघर, तीर्थस्थान, उपगिरजाघर आदि ईष्वर की आराधना एवं संतों के आदर के लिए प्रतिश्ठित पवित्र स्थान हैं। उनकी पवित्रता के अनुरूप आदर के साथ हमें व्यवहार करना है। पवित्र बलिवेदी, बलि वस्तुएँ, संस्कारों में प्रयुक्त वस्तुएँ, आदि के उपयोग में पवित्रता बरतनी चाहिए। पवित्र बाइबिल में जीवनदायी ईश-वचन निहित हैं; जब भी हम धर्मग्रंथ हाथ में लेते हंै, पढ़ते हैं या वापस रखते हैं, तब हमें श्रद्धा एवं सम्मान का मनोभाव होना चाहिए। 
                            ईष्वर को समर्पित लोगों की अवहेलना करना, पवित्र स्थानों में अनादरपूर्वक व्यवहार करना एवं पवित्र वस्तुओं को अषुद्ध करना दूसरी आज्ञा के विरुद्ध घोर अपराध हैं।
     

    ख्रीस्तीय नाम

                                दूसरी आज्ञा हमें यह याद दिलाती है कि ख्रिस्तीय नाम लेना और उनका उपयोग करना हमारे लिए आवष्यक है। पवित्र ग्रन्थ में हम देखते हंै कि विषेश रूप से चुने गये लोगों को ईष्वर ही उपयुक्त नामांे से अलंकृत करता है। ईष्वर ‘अब्राम’ को ‘इब्राहीम’ (उत्पत्ति 17ः5) और ‘याकूब’ को ‘इस्राएल’ (उत्पत्ति 32ः28) नाम देता है। इस प्रकार ज्ञानस्नान के ज़रिए ईष्वर की संतान बनते समय हमें कलीसिया के द्वारा ईष्वर जो नाम प्रदान करता है उसे ज्ञानस्नान (बपतिस्मा)-नाम कहते हैं। पवित्र त्रित्व के नाम पर ही यह दिया जाता है।
                          अकसर बपतिस्मा में संतों के नाम दिये जाते हैं जिन्हांेने ईष्वर को महिमान्वित किया। ऐसे नाम भी दिये जाते हैं जो ईष्वरीय रहस्यों या ईष्वरीय गुणों को सूचित करते हैं। संतों के आदर्षों के अनुसार जीने और उनकी विषेश मध्यस्थता प्राप्त करने में उनके नाम हमारी मदद करते हैं। इसलिए ज्ञानस्नान-नाम का उपयोग जारी रखना है। हमें इस नाम पर गर्व करने और इसके चैतन्य के अनुसार जीने की कोषिष करनी है। कलीसिया यह सिखाती है कि माता-पिता, धर्म, माता-पिता एवं धर्मगुरुजन ज्ञान स्नान में ऐसे नाम न दें जो ख्रीस्तीय चैतन्य के खि़लाफ हों। (सी.सी.सी.2156)
                            दूसरी आज्ञा स्मरण दिलाती है कि हमें दैनिक जीवन में हर प्रकार से ईष्वर के नाम के प्रति आदर प्रकट करना चाहिए। ईष्वर के आराध्य नाम को हर समय स्तुति, सम्मान एवं वन्दना अर्पित करने के लिए हमें तैयार रहना है। हमारे हृदयों को ईष-स्तुति से भरना चाहिए। ईष्वर की दी हुई अनंत कृपाओं के प्रति धन्यवाद भरे दिल से उसका गुणगान करें। इस प्रकार ईष्वरीय नाम हमारे जीवन में आराध्य नाम बन जायेगा।
     

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रभु ईष्वर, तेरे पवित्र नाम की षक्ति को समझने एवं 
    उसका अनुभव करने की कृपा हमें प्रदान कीजिए। 
     
     

    हम गायें

    ईष्वर नाम संपूज्य नाम, स्तुति गायेंगे तोश के साथ
    सुन्दर नाम आराध्य नाम, हल्लेलूया कीर्तित नाम।
    उस पुण्य नाम में विष्वासी जन, कुछ भी माँगें तो लभ्य है
    आकाष नीचे दूसरे औ’ नाहीं, मानव षांति मिलने नाम।
    ईष्वर नाम पावन नाम, ईष्वर ने दिया आज्ञाधारी
    ज्ञान-स्नान बाद पवित्र होंगे, संतों के पाथे आगे बढ़ें।
     
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    प्रेरित-चरित 3ः1-10
     
     
     

    मार्गदर्षन के लिए पवित्र वचन

    “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - तुम पिता से जो कुछ माँगोगे, 
    वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा।” (योहन 16ः23)

    हम करें

    अपने ज्ञानस्नान नाम के/की संत की जीवनी अवष्य पढ़िए। 
     
     

    मेरा निर्णय 

    मैं हर ज़रूरत में ईसा के 
    पवित्र नाम की दुहाई दूँगा/गी।