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                        एक बार ईसा येरुसालेम के मंदिर में लोगों को षिक्षा दे रहे थे। कई लोगों ने उनके वचन सुने। कुछ लोगों ने ईसा से प्रष्न भी किया और ईसा ने उन्हें जवाब दिया। तब एक षास्त्री ने आकर ईसा से पूछा कि पहली आज्ञा कौन-सी है ? ईसा ने उत्तर दिया; “पहली आज्ञा यह है -‘इस्राएल सुनो! हमारा प्रभु ईष्वर एकमात्र प्रभु है। अपने प्रभु ईष्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी बुद्धि और सारी षक्ति से प्यार करो।” (मारकूस 12ः29-30)

     

    भ्फ्उू क्ष्,ंउॅू

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    ईष्वरीय पुण्य

                  ईष्वर चाहता है कि हम ईष्वर में विष्वास, भरोसा और प्रेम रखते हुए जीवन बितायें। इसीलिए ईश्वर ने अपने आपको प्रकट किया था। ख््राीस्तीय विष्वास का आधार है ईष्वरीय पुण्य: विष्वास, भरोसा और प्रेम। ये पुण्य ईष्वरीय देन ही हैं।

    विष्वास

                      जो अपने स्वयं को प्रकट करता है उस ईश्वर को संपूर्ण समर्पण द्वारा मनुश्य का प्रत्युत्तर है विष्वास। ईष्वर हमारा सृश्टिकर्ता और संरक्षक है। हमें उसको जानना, प्रेम करना और उससे सम्बन्ध बनाये रखना है। इसमें विष्वास हमें मदद करता है।

    भरोसा

                       विष्वास हमें भरोसे की ओर ले जाता है। ईश्वर जो सर्वषक्तिमान, करुणामय एवं प्रतिज्ञाओं में निश्ठावान है, हमें आवष्यक कृपा और अनुग्रह प्रदान करेगा - यह दृढ़ धारणा है भरोसा। भरोसा यह प्रतीक्षा भी है कि ईष्वर की संतान होकर जीने का और मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग ईष्वर प्रषस्त करेगा। भरोसा हमें यह ज्ञान (आत्मविष्वास) प्रदान करता है कि ईष्वर सदा सभी बातों में मेरा संरक्षक है। निराषा भरोसे के विरुद्ध पाप है।

    प्रेम

                          ईष्वर प्रेम है। वह हमसे प्रेम करता हंै। उस प्रेम के बदले में ईश्वर से प्रेम करना हमारा कर्तव्य है। हमें चाहिए कि हम पूर्ण हृदय से ईष्वर को प्यार करें। सबसे प्रथम ईष्वर को और अपने समान दूसरों को प्यार करने में ईष्वरीय पुण्य प्रेम हमें सक्षम बनाता है।

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    हम प्रार्थना करें

    हे प्रभु हमारे ईष्वर, आप को सदा हमारे प्रभु 
    और ईष्वर मानकर स्वीकार करने की हमें सहायता दीजिए।
     

    हम गायें

    पहली बार को नियम देता, ‘‘मैं तुम्हारा प्रभु ईष्वर’’
    मेरे नाथ और मेरे ईष, सबके जीवन तू ही है।
    मेरे अपने मोचित जन, मेरे अपने प्रतिज्ञात जन
    तुम सब अपने लाड़ के जन, तुम सब परस्पर लाड़ के जन।
    विष्वास का तो विनीत मन, आराधना के अर्पित करो
    प्रत्याषा प्यार के ले लो, संतोश के साथ जीयेंगे।
     
     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    (दानिएल 3ः1-30)
     
    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन
    “अपने प्रभु ईष्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, 
    अपनी सारी बुद्धि और सारी षक्ति से प्यार करो।” (मारकुस 12ः30)
     

    हम करें

    विष्वास, भरोसा और प्रेम की विनतियाँ कंठस्थ कीजिए।

    विष्वास की विनती 

    हे मेेरे ईष्वर, जिन्हें पवित्र काथलिक कलीसिया विष्वास करती और सिखाती है, मैं उन सब सत्यों पर दृढ़ विष्वास करता/करती हूँ, क्योंकि तूने ही उन्हें प्रकट किया है; तू न तो धोखा दे सकता  न धोखा खा सकता है। 

    भरोसे की विनती 

    हे मेरे ईष्वर, तू सर्वषक्तिमान, अनन्त दयालु और प्रतिज्ञाओं में विष्वस्त है। इसलिए मैं भरोसा रखता/ती हूँ कि हमारे प्रभु और मुक्तिदाता ईसा मसीह की योग्यता से पापमोचन, कृपावरदान और अनन्त जीवन प्राप्त करूँगा/गी। 

    प्रेम की विनती 

    हे मेरे ईश्वर, तू अनन्त भलाई एवं प्रेम के अति योग्य है। इसलिए मैं सारे हृदय से सबों से ज़्यादा तुझे प्यार करता/ती हँू। तेरे प्रेम के प्रति मैं दूसरों को भी अपने समान प्यार करता/ती हूँ। मै उन सबों को माफ़ करता/ती हँू जिन्होंने मेरे साथ अन्याय किया है। मैं उन सबों से माफ़ी माँगता/ती हूँ जिनके साथ मैंने अन्याय किया है।
     
     
     

    मेरा निर्णय

    पवित्र बलिदान में सक्रिय रूप से भाग 
    लेकर मैं ईष्वर की आराधना करूँगा/गी।