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            संत पौलुस विष्वासियांे को यह उपदेष देते हैं: “जो चोरी किया करता था, वह अब से चोरी नहीं करे, बल्कि ईमानदारी से अपने हाथों से परिश्रम करे। इस प्रकार वह दरिद्रों की भी कुछ सहायता कर सकेगा” (एफेसियों.4ः28)। चोरी करना सामाजिक बुराइयों में एक प्रमुख पाप है। इसीलिए यह आज्ञा - ’चोरी मत करो’ सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। यही आज्ञा, ’चोरी मत करो‘, पुराने एवं नये विधानों में उस के मूल रूप में देखा जा सकता है। संत पौलुस भी यही शिक्षा देते हैं: “चोर, लोभी, षराबी, निन्दक और धोखेबाज़ ईश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं होंगे”।  (1 कुरिंथि. 6ः10)

     

    सातवीं आज्ञा की बुनियादी विचारधारायंे

                         धन ईश्वर की देन है। उत्पत्ति ग्रन्थ में सृश्टि के विवरण में हम पढ़ते हैं कि ईश्वर ने संसार और सब वस्तुओं का सृजन किया और उन्हें मनुश्यों के उपयोग के लिए दे दिया। धन मनुश्यों के उपयोग के लिए है (उत्पत्ति 1ः28)। यह अन्याय मार्ग से एकत्रित करने का नहीं है। धन दूसरों के साथ न बाँटना या उस का दुरुपयोग करना, दोनों बुराई हैं।

    सार्वजनिक धन और निजी धन

                        मनुष्य को पैसा और अन्य वस्तुएँ न्यायसंगत ढ़ंग से अर्जित करने तथा उसका उपयोग करने का अधिकार है। धन दो प्रकार का है - सार्वजनिक धन और निजी धन। सार्वजनिक धन समाज के लिए है और सब को इस पर अधिकार होता है। निजी धन वह है जिसे कोई भी व्यक्ति अपना सकता है और उसका उपयोग कर सकता है। व्यक्तियों को यह अधिकार है कि वे सृश्टवस्तुओं को न्यायसंगत तरीके से अपनायें और उन का इस्तेमाल करें। समाज की सुस्थिति और मानव की उन्नति के लिए यह अनिवार्य है। निजी धन का अधिकार मनुश्य को परिश्रम करने और फल उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है। निजी धन व्यक्तियों की सुस्थिति एंव सुरक्षा सुनिष्चित करता है। दूसरों के धन का अपहरण है चोरी। यह निजी धन पर अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही साथ निजी धन को अन्याय रीति से अंिर्जत करना और उसे उड़ा देना, दोनों बुराई हैं।

    न्याय का अनुमान

                                   संत थोमस अक्वीनास कहते हैं: “न्याय वह पुण्य है जो हर एक व्यक्ति को प्रेरित करता है कि वह दूसरों का अधिकार माने और प्रदान करे।” जो दूसरों के अधिकारों का आदर करते हैं वे ही न्यायपूर्वक व्यवहार कर सकते हैं। 
                                   एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्ति के लिए कर्तव्य बनता है। उदाहरण: 1. सृश्टिकर्ता के रूप में ईश्वर आराधना के पात्र हैं; आराधना करना हमारा कर्तव्य है। 2. जिसने हमारे लिए काम किया है उसे वेतन मिलने का अधिकार है; वेतन देना हमारा फर्ज़ है। 3. आदर किया जाना माता-पिता का अधिकार है; आदर करना बच्चों का कर्तव्य है। 
                       आपसी कर्तव्यों का पालन करना न्याय का बुनियादी नियम है। ईसा चाहते हैं कि हमारे न्याय का आधार प्यार और भाईचारा हों। भले समारी के दृश्टांत में हम यही पाते हैं। लूटे गये घायल और अधमरे मनुश्य की स्थिति सहायता एवं सेवा के योग्य रही। वहाँ मदद करने का अपना फर्ज प्रेमपूर्वक स्वयं स्वीकार लिया भले समारी ने; उसको प्रस्तुत करते हुए ईसा हमसे कहते हैं: “जाओ, तुम भी ऐसा करो”। (लूकस 10ः37)
                                  जो न्याय का पालन नहीं करते हैं उनसे अंतिम न्याय के दिन ईसा इस प्रकार कहेंगेः “मैंने तुम लोगों को कभी नहीं जाना। कुकर्मियो, मुझसे दूर हटो”। (मत्ती 7ः23)

    धन का अधिकार और चोरी

                        जैसे अपने धन पर हमारा अधिकार है वैसे ही दूसरों का अपने धन पर अधिकार भी महत्वपूर्ण है। किसी अन्य व्यक्ति के इस हक़ का उल्लंघन करने का अधिकार हमें नहीं है। इस प्रकार के अधिकार का उल्लंघन चोरी होती है। उदाहरण के लिए, यात्री किराया गाड़ी मालिक का अधिकार है। सफर के बाद पैसा न देना अधिकार का उल्लंघन है। उस पैसे को गाड़ी मालिक से चुराया गया धन मानना चाहिए।
     

    सार्वजनिक धन के प्रति आदर

     

                                  हम अपने दैनिक जीवन में जिनका उपभोग करते हैं उन में अधिकांश सार्वजनिक धन हैं। प्राकृतिक संपदा, सरकारी संस्थान, सड़क, सड़क-बत्तियाँ आदि सार्वजनिक धन हैं। इसीलिए सार्वजनिक धन का किसी भी अन्याय मार्ग से हासिल कर के इस्तेमाल करना या नश्ट करना सामाजिक अधिकार का उल्लंघन है। अनेकों के अधिकारों का उल्लंघन होने से बुराई की गंभीरता बढ़ती है।
     
     

     

    ईष-वचन पढ़ें और वर्णन करें

    लूकस 10: 30-37
     

    मार्गदर्षन के लिए एक पवित्र वचन

    “चोर, लोभी, षराबी, निन्दक और धोखेबाज़ 
    ईश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं होंगे।” 
    (1 कुरिंथि. 6ः10)
     

     

    हम करें

    सातवीं आज्ञा के अन्तर्गत आनेवाले पापों को ढूँढ़कर उनका हल 
    निकालने के बारे में चर्चा कीजिए।
     

    मेरा निर्णय

    सार्वजनिक वस्तुओं को किसी भी हालत में मैं नश्ट
    नहीं करूँगा/गी न उनका दुरुपयोग करूँगा/गी।