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                         बेथानिया का लाज़रुस ईसा का घनिश्ठ मित्र था। उनकी बहनों ने प्रभु के पास खबर पहुँचायी कि लाज़रूस बीमार है। मगर प्रभु ने दो दिन बाद ही बेथानिया की ओर प्रस्थान किया। जाने से पहले उन्होंने अपने षिश्यों से कहाः ‘‘हमारा मित्र लाज़रुस सो रहा है। मैं उसे जगाने जा रहा हूँ’’। तब थाॅमस ने अन्य षिश्यों से कहाः ‘‘हम भी चलें और उनके साथ मर जाएँ’’ (योहन 11: 11-16)। थाॅमस की यह घोशणा उस समय हुई जब षिश्यों के मन में यह आषंका भर गयी थी कि षायद यहूदियों द्वारा उनका वध किया जाएगा। ईसा के स्वर्गारोहण के बाद भी संत थाॅमस ने यह साहस प्रकट किया जो उन में क्रियाषील था। इसी साहस ने उन्हें दूरवर्ती भारत में आकर सुसमाचार की घोशणा करने  के लिए प्रेरित किया। 

                         प्रेरित संत थाॅमस के सुसमाचार की घोशणा के फलस्वरूप केरल में एक ख्रीस्तीय समूह का जन्म हुआ और उसका विकास होता रहा। वे ‘मार थाॅमा मसीही‘ नाम से जाने जाते हैं। अपनी  कलीसिया की प्रेरितिक उत्पत्ति के बारे में वे बोधवान हैं। यही एकमात्र कलीसिया है जो अपने प्रेरित संस्थापक के नाम से जानी जाती है। अन्य सभी कलीसियाएँ अपने उद्भव स्थानों से केन्द्रित हो कर जानी जाती हैं।

     

    मार थाॅमा मसीहियों का प्रेरितिक स्वभाव

     
                  मार थाॅमा मसीहियों को सुसमाचार प्रचार में अपनी ही षैली थी। अन्य बहुमत वाले धर्मावलंबियों के बीच अपना ख्रीस्तीय विष्वास को बनाये रखने और उसका साक्ष्य देने में वे विषेश महत्व देते थे। वे अपना विष्वास दूसरों पर बलपूर्वक या ज़बरदस्ती थोपना नहीं चाहते थे। उन का धार्मिक जीवन उच्च स्तर का होने से अन्य लोग उनका सम्मान करते थे। जिस समाज में वे रहते थे उस में उन्हें ऊँचा स्थान प्राप्त था। अन्य धर्मावलम्बी भी मार थोमा मसीहियों को प्यार करते एवं उनका आदर करते थे।
     
                   मार थाॅमा मसीहियों का विष्वास जीवन बेहतर था, वे सुसमाचार के प्रेरित ही थे। परम्परा के अनुसार भारत से चीन तक मिषनरी जाया करते थे। फिर भी यह कहना गलत नहीं है कि प्राचीन काल से यहाँ प्रचलित अनेक धार्मिक-विष्वास, भारतीय संस्कृति की धार्मिक सहिश्णुता, जाति व्यवस्था आदि के फलस्वरूप मार थाॅमा मसीहियों के प्रेरितिक कार्य धीमी गति में आ गये।
     
                  16वीं षताब्दी में पाष्चात्य मिषनरियों के आगमन से भारत के प्रेरितिक कार्य विषेश रूप से सजीव हो गये। मगर बाद में हुई कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के फलस्वरूप सीरो मलबार कलीसिया की संतानों को अपनी कलीसिया में रहते हुए प्रेरितिक कार्य करना असंभव हो गया। प्रेरितिक बुलाहट के क्षेत्र में सीरो मलबार कलीसिया में अपेक्षाकृत वृद्धि हुई। सीरो मलबार कलीसिया के अनेक युवा-युवतियाँ पुरोहित बनने और समर्पित जीवन बिताने के लिए तैयार हो गये। वे लातीनी धर्मप्रांतों एवं लातीनी धर्मसंघों के सदस्य बन कर प्रेरितिक कार्य करते रहे। इस प्रकार, व्यक्ति एवं धन देते हुए, पष्चिमी कलीसिया के प्रेरितिक उद्यमों का नेतृत्व - एक सीमा तक -  हम मार थाॅमा मसीहियों ने ही किया। यहाँ जो अनेक सन्यास धर्मसंघों एवं प्रेरितिक संघठनों की स्थापना हुई उनके 70 प्रतिषत सदस्य सीरो मलबार कलीसिया के थे। वे भारत और विदेषों में समर्पित जीवन बिता कर ईसा के साक्षी बने। 

    सीरो मलबार कलीसिया एवं प्रवास 

     
                   16वीं षताब्दी तक मार थाॅमा मसीहियों को समस्त भारत में कलीसिया संबंधित कार्य करने का अधिकार था। आर्च डीकन कलीसिया का षासन करता था; वे पूरे भारत के आर्च डीकन माने जाते थे। मगर पष्चिमी मिषनरियों के आगमन से यह अधिकार नश्ट हो गया। मार थाॅमा मसीहियों के निरन्तर अनुरोध के कारण 1923 दिसम्बर 21 को संत पापा पीयुस ग्यारहवें ने सीरो मलबार धर्मतन्त्र (विषेश षासन व्यवस्था) की स्थापना की। फिर भी सीरो मलबार कलीसिया का कार्य क्षेत्र उत्तर में भारतपुशा और दक्षिण में पम्पा नदी के बीच सीमित कर दिया गया। मार थोमा मसीही मेहनती हैं; वे लोग केरल के अन्दर और बाहर विविध क्षेत्रों में प्रवासी के हो कर रहते थे। इस प्रकार केरल और निकटवर्ती राज्यों में प्रवासी हो कर रहने वालों के लिए उन क्षेत्रों में पैरिषों एवं धर्मप्रांतों की स्थापना कर के उनको धर्मसेवा दिलाना सीरो मलबार कलीसिया का कर्तव्य है।
     
                 व्यक्ति का विष्वास-जीवन उसकी मातृ कलीसिया के परम्परागत विष्वास पर आधारित है। अपनी कलीसिया की पूजन-पद्धति से ही विष्वास के लिए आवष्यक आध्यात्मिकता उसको प्राप्त होती है। इसलिए प्रत्येक वैयक्तिक कलीसिया का कर्तव्य है कि जहाँ कहीं भी उसके सदस्य निवास करते हैं, उनको मेशपालीय षुश्रूशा प्राप्त कराये। पूर्वी कलीसिया से संबंधित आज्ञप्ति में स्पष्ट रूप से कलीसिया सिखाती हैः ‘‘संसार भर की प्रत्येक वैयक्तिक कलीसिया का संरक्षण एवं विकास करने को ध्यान देना है। जहाँ भी जरूरी हो, वहाँ विष्वासियों की आध्यात्मिक भलाई के लिए पैरिषों एवं उनके अपने ही धर्मतंत्र की स्थापना करनी चाहिये है (पूर्वी कलीसियाएँ OE 4)। वैटिकन महासभा सिखाती है कि अपने परम्परागत विष्वास के आधार पर ईष्वर के वचन की घोशणा करना और अपनी षासन प्रणाली की स्थापना एवं उसका विकास करना, प्रत्येक वैयक्ति कलीसिया का अधिकार है और उसके लिए वह स्वतंत्र है। इस के अनुसार मलबार क्षेत्र के प्रवासियों के लिए सन् 1953 में तलषेरी धर्मप्रांत की स्थापना हुई। सन् 1955 में चंगनाषेरी धर्मप्रान्त की सीमा कन्याकुमारी तक बढाई, तृषूर धर्मप्रांत की सीमा में कोयम्बत्तूर धर्मप्रांत का क्षेत्र भी मिलाया और तलषेरी धर्मप्रांत की सीमा में मैसूर एवं मंगलापुरम धर्मप्रांतों के क्षेत्र भी षामिल कर दिये। 
     
                रोज़्ागार के कारण भारत के विविध षहरों और अन्य जगहों पर बसे हुए लोगों की आध्यात्मिक कार्यों पर ध्यान देने के विषेश इंतज़ाम नहीं थे। उन्होंने वहाँ के लातीनी धर्मप्रांत की पैरिष के सदस्य बन कर जीवन बिताया और उस पूजन-पद्धति में भाग लिया जिससे वे अपरिचित थे। इस समस्या को हल करने  के लिए 1988 अप्रैल 30 को भारत में मुम्बई, पूना और नासिक के मार थाॅमा मसीहियों के लिए कल्याण धर्मप्रांत और सन् 2001 में भारत के बाहर अमेरीका के मार थाॅमा मसीहियों के लिए चिक्कागो धर्मप्रांत की स्थापना हुई। मगर भारत के अनेक स्थानों पर आज भी सीरो मलबार कलीसिया के विष्वासीगण अपनी पूजन-पद्धति के अभाव में जीवन बिता रहे हैं। इसलिए भारत में दिल्ली, बांॅग्लूर, चेन्नई आदि विविध स्थानों पर और भारत के बाहर विविध देषों में सीरो मलबार पूजन-पद्धति का इंतजाम करना है अथवा ज़्ारूरी हो तो सीरो मलबार धर्मप्रांतों की स्थापना करनी है।

     

    सीरो मलबार कलीसिया के मिषन धर्मप्रांत

     
                    सीरो मलबार कलीसिया की संतानों की यह तीव्र इच्छा थी कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जो गैरईसाई भाई-बहन रहते हैं, उनके बीच प्रेरितिक कार्य करें। इस की जानकारी सीरो मलबार के अधिकारी गण संत पापा को देते रहते थे। इसके फलस्वरूप चान्दा, उज्जैन, सतना, सागर, जगदलपुर, बिजनोर, राजकोट, गोरखपुर, तक्कला, अदिलाबाद,  भद्रावति आदि मिषन धर्मप्रांत सीरो मलबार कलीसिया को प्राप्त हुए। मगर सीरो मलबार कलीसिया के निजी प्रेरिताई कार्य के लिए और भी धर्मप्रांतों की ज़रूरत है।
     

    हम करें - 1

     
    सीरो मलबार कलीसिया के मिषन धर्मप्रांत कौन-कौन से हैं ? चर्चा कीजिए कि उन धर्मप्रांतों की सहायता कैसे कर सकते हैं ?

     

    प्रेरितिक कार्य की मुख्य षैली 

     
              जीवन साक्ष्य है प्रत्येक मसीही का प्रथम प्रेरितिक कार्य। भारत में विविध धर्मों की परम्परायें हैं, जिनकी जड़ें गहरी हैं। इन परम्पराओं का अनुसरण करने वाले लोगों के बीच ईसा की घोशणा करने का षक्तिषाली उपाय मसीहियों का प्रेमपूर्ण जीवन है। दूसरा उपाय आपसी धर्मसंबंधी संवाद है। भारत के हिन्दुओं और ईसाइयों के बीच धर्म संबंधी विशयों पर संवाद हुआ करता था। संवादों के जरिये कलीसिया अन्य धर्मावलम्बियों की परम्पराओं को समझती और ख्रीस्तीय परम्पराओं पर आधारित ईष्वरानुभव में भाग लेने के लिए उन्हें अमंत्रित करती है। जो संवाद के जरिये प्रेरितिक कार्य में लगे रहत हैं, उन्हें अडोस-पड़ोस के लोगों के साथ अच्छे संबंध रखने और ज़्ारूरत पड़ने पर अपने विरोधियों की भी मदद करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। मसीही अन्य धर्मावलम्बियों के साथ मिलकर देश की सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए कार्य करते हैं। इसके साथ साथ हमें अपना विष्वास और ईष्वरानुभव दूसरों के साथ बाँटना भी चाहिए।
     
                भारत के सीरो मलबार कलीसिया की परम्परा में तपस्वी एवं आश्रम जीवन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिये सीरो मलबार कलीसिया आह्वान करती है कि अपने समर्पितों को अन्य लोगों में तीव्र भक्ति जगाने वाले सुसमाचार प्रचारक भी होना चाहिये (सीरो मलबार कलीसिया के प्रेरितिक कार्यों का मार्गदर्षक 6, 2-5)।
     

    हम करें - 2

     
    सीरो मलबार कलीसिया के किसी एक मिषन धर्मप्रांत के बारे में एक विवरण तैयार कर अपनी कक्षा में पेष कीलिये।
     
     
                   संत पापा पौलुस छठवें के ‘सुसमाचार की घोशणा आज’ नामक उद्बोधक आज्ञप्ति में विषेश रूप से ‘क्षेत्रीय आराधना-समूहों‘ के बारे में चर्चा हुई है। ऐसे आराधना समूहों को षुरू करने के लिए हमारे प्रेरितगण को ध्यान रखना चाहिये। इन समूहों को एकत्र होना चाहिए कि वे ईष्वर का वचन सुनें, उस पर मनन करें, संस्कारों को स्वीकार करें और प्रीतिभोज में भाग लें (EN 58)। 
    प्रत्येक क्षेत्र की संस्कृति के अनुरूप प्रेरितिक कार्य की षैली कलीसिया की संतानें अपनाती हैं। इस प्रकार विभिन्न षैलियाँ अपनाते हुए सीरो मलबार कलीसिया अपना प्रेरितिक कार्य जारी रखती है। कलीसिया के इस प्रेरितिक विकास पर हम गर्व करें और जितना हम से बने, उस में अपना सहयोग प्रदान करें।

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें 

    (1 कुरन्थियों 3: 5-9)
     

    कंठस्थ करें

    ‘‘हम ईष्वर के सहयोगी हैं और आप लोग हैं ईष्वर की खेती, ईष्वर का भवन’’ (1 कुरिन्थियों 3: 9)।

     

    हम प्रार्थना करें 

    हे हमारे प्रभु ईष्वर, संत थाॅमस ने कहा, ‘हम भी चलें और उनके साथ मर जायें‘; उन के जैसे विष्वास के साक्षी बनने की षक्ति हमें भी प्रदान कीजिये।
     

    मेरा निर्णय 

    मेरे पैरिष के मिषन रविवार समारोह में प्रार्थना, त्याग, दान आदि द्वारा मैं सक्रिय रूप से भाग लूँगा/गी।
     

    कलीसिया के साथ विचार करें 

    वैयक्तिक कलीसियाएँ सार्वत्रिक कलीसिया का प्रतिनिधित्व करने के लिए बाध्य हैं। वे इस बात पर ध्यान रखें कि वे ऐसे लोगों की ओर भेजे हुए हैं जो उनके साथ रहते हैं लेकिन मसीह में विष्वास नहीं करते हैं। इस वैयक्तिक कलीसिया को ऐसा एक चिह्न होना चाहिए जो समस्त समाज और हर व्यक्ति के जीवन साक्ष्य द्वारा मसीह को दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करती है (AG 20)।