•            

                   पुनरूत्थित ईसा ने प्रेरितों को दर्षन दे कर कहा: ‘‘जिस तरह पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ। संसार के कोने-कोने में जा कर सारी सृश्टि को सुसमाचार सुनाओ ” (योहन 20: 21, मारकुस 16: 5) इस संसार में ईसा की निरंतरता एवं संस्कार है कलीसिया। ईसा की मुक्ति योजना का दौत्य जारी रखने के लिये कलीसिया नियुक्त है। इस दौत्य को निभाने में कलीसिया सदा वचनवद्ध थी। प्रारंभ से ही कलीसिया को इस में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस की अनेक संतानों को अत्याचार सहना और षहीद बनना पडा था। फिर भी प्रेरितिक कार्यों से कलीसिया बिलकुल पीछे नहीं हटी।

     

    कलीसिया मसीह की निरन्तरता और दौत्य वाहक

     

                    ईसा ने जो मुक्ति प्रदान की, वह न केवल पाप से आत्मा का छुटकारा है, वरन् मानव का सम्पूर्ण विमोचन है। इसलिए कलीसिया भी मानव का समग्र विमोचन को ध्यान में रखते हुए प्रयास करती है। पीड़ित, षोशित, कमज़ोर एवं तिरस्कृत लोगों के साथ मिल कर उन्हें सचेत एवं मुक्त करने हेतु प्रयास करने में कलीसिया सदा आगे है। साथ ही साथ सतानेवाली षक्तियों की कड़ी निन्दा करती है और प्रेम से गलतियों के विशय में उन्हें अवगत कराती है। कलीसिया सदा धर्म, वर्ण और जाति के नाम पर उत्पन्न छुआछूत और षोशण के खिलाफ खड़ी होती है। सभी बुराइयों से, जो व्यक्ति और समूह को गुलाम बना देती हैं, मुक्त होने के लिए कलीसिया उन्हें सचेत कराती है।

     

    कलीसिया संसार का अन्तःकरण

     

                    ईसा के जैसे कलीसिया आधुनिक युग में संसार का अंतःकरण होने का प्रयास करती है। व्यक्ति और समूह के विकास में बाधा डालने वाली सभी परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक) का विष्लेशण कर उचित निर्णय प्रस्तुत करने का भी वह ध्यान देती है। केवल विष्वास एवं नैतिकता के विशय पर नहीं, बल्कि जो भी घटनाएँ संसार में घटित होती हैं जो मनुश्य के कल्याण के लिए हानिकारक हैं, उनकी प्रतिक्रिया एवं समाधान के लिए भी संसार कलीसिया की ओर आषा के साथ देखता है। ऐसे विशयों पर संत पापा क्या कहते हैं, यह सुनने के लिए संसार के नेतागण कान लगाते हैं।

                    आज कलीसिया मानव के सर्वांगीण विकास के लिए भिन्न-भिन्न मार्ग अपनाती है। षिक्षा, राजनीति, सामाजिक सेवा कार्य तथा भिन्न भिन्न विविध माध्यमों का उपयोग, ये सब उन में कुछ है। इनमें सब से महत्वपूर्ण क्षेत्र है षिक्षा की प्रेरिताई।

     

    षिक्षा की प्रेरिताई

     

                    षिक्षा का सही उद्देष्य है मनुश्य के अंतिम लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उसके व्यक्तित्व को रूप देना (षिक्षा GE 1)। इस प्रकार की षिक्षा मानव के समग्र विकास की ओर ध्यान देती है। प्रेम, सत्य, न्याय, भ्रातृत्व, षांति आदि मूल्यों को जीवन में उतार कर क्रियान्वित कराने का होना चाहिए षिक्षा का लक्ष्य। षिक्षा व्यक्ति को बुराइयाँ तज कर भलाइयाँ ग्रहण करने के लिए सहायक होनी चाहिए। गरीबी, अज्ञानता, गुलामी, षोशण आदि समस्याओं का विष्लेशण कर उनका उन्मूलन करने के लिए भी षिक्षा सहायक होनी चाहिए।

                    द्वितीय वैटिकन महासभा सिखाती है कि £ीस्तीय षिक्षा का लक्ष्य न केवल मानव के व्यक्तित्व की पूर्णता है, वरन् बच्चों का विष्वास संबंधी एवं धार्मिक प्रषिक्षण भी है (GE 2)। मसीह की पूर्णता के अनुरूप सम्पूर्ण मानवीय व्यक्तित्व प्राप्त करने में इनसान की सहायता करना ख्रीस्तीय षिक्षा का मुख्य लक्ष्य है। अतः षैक्षिक संस्थाओं की स्थापना करने और समय के अनुसार नवीनीकरण लाने तथा बच्चों को अच्छी षिक्षा प्रदान करने में कलीसिया विषेश ध्यान देती है। बच्चों को अच्छी षिक्षा प्रदान करने के विशय में माता-पिताओं के कर्तव्य के बारे में भी द्वितीय वैटिकन महासभा सिखाती है (GE 3)।

     

    हम करें 1

                    निर्धनता, अज्ञानता, गुलामी, षोशण आदि सामाजिक बुराइयों से समाज को मुक्त करने में आज की षिक्षा प्रणाली, कहाँ तक लाभदायक है? चर्चा कीजिए।

     

    माध्यमों  द्वारा  प्रेरिताई

     

                    माध्यमों (मीडिया) ने जनमानस को अपने अधीन करके उनको प्रभावित किया है। द्वितीय वैटिकन महासभा ने माध्यमों के प्रभाव के बारे में एक आज्ञप्ति ही निकाली है। महासभा कहती है कि माध्यम मनोरंजन एवं ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ ईष्वर के राज्य के प्रचार के लिए भी उपयोगी होता है (सामाजिक माध्यम IM 2)। मगर अब तक कलीसिया का ध्यान मुद्रणालय प्रेरिताई पर सीमित था। जर्मनी के गुट्टन बर्ग ने मुद्रणकला का आविश्कार किया। पहली बार जो ग्रंथ मुद्रित किया गया था वह बाइबिल है। इसके बाद मसीही समाज ने अनेक किताबें विष्व को प्रदान कीं जो आध्यात्मिक विशयों पर आधारित एंव सामाजिक उन्नति के लिए लाभदायक है।

                    इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों के प्रचार से कलीसिया का ध्यान उसकी ओर आकर्शित हुआ। फिल्म, रेडियो, दूरदर्षन, कम्प्यूटर, इन्ट्रनेट आदि माध्यमों द्वारा सुसमाचार की घोशणा करने के लिए कलीसिया अपनी संतानों को स्मरण दिलाती है। सामाजिक सम्पर्क माध्यमों से संबंधित आज्ञप्ति यह उपदेष देती है: ‘‘सत्य की रक्षा एवं प्रचार करने तथा मानव समाज को ख्रीस्तीय रूप प्रदान करने के लिए कार्यरत काथलिक अखबार, पत्रिकाएँ, रेडियो-फिल्म, टेलीविजन-कार्यक्रम, प्रसारण केन्द्र आदि की सहायता व संरक्षण करने के लिए कलीसिया की संतानें बाध्य हैं। उसी प्रकार यह महासभा आर्थिक रूप से सक्षम एवं तकनीकी क्षेत्र में जानकार व्यक्तियों एवं संस्थाओं से आग्रह करती है कि वास्तविक सांस्कृतिक एवं प्रेरितिक कार्य में इन माध्यमों का उपयोग करने के लिए अपनी क्षमता और निपुण सेवा द्वारा उदारतापूर्वक सहायता करें’’ (IM 17)।

                    आधुनिक कलीसिया को जो इन्टरनेट के युग में रहती है, इस तकनीकी जानकारी का उपयोग भी महत्वपूर्ण है। कलीसिया की संतानों को भी, इस के उपयोग सही ठंग से करना सीखना एवं सिखाना चाहिये। इन्टरनेट का दुरूपयोग करने से समाज, विषेश कर, युवजन अधार्मिकता का मार्ग अपनाते हैं। हमें इसके खिलाफ जागरूक होना चाहिए। इस खतरे से अपनी संतानों को बचाने हेतु ‘सामाजिक सम्पर्क माध्यमों के लिए पोन्टिफिकल काउन्सिल‘ (धर्माध्यक्षीय महासभा) ने ’कलीसिया और इन्टरनेट’ एवं ’इन्टरनेट की धार्मिकता’ नामक दो प्रलेख निकाले हैं।

                    ‘कलीसिया और इन्टरनेट‘ नामक प्रलेख याद दिलाता है कि आधुनिक तकनीकी जानकारी जनता के समक्ष सुसमाचार की घोशणा करने का नूतन मार्ग प्रदान करती है। उसका उपयोग करने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए और यह उपयोग उत्तरदायित्व एवं विवेक के साथ होना चाहिए। ‘इन्टरनेट की धार्मिकता‘ सिखाती है कि ‘इन्टरनेट का उपयोग‘ इस प्रकार होना चाहिए कि उसका प्रयोग करने से मानव जाति के सर्वहित और सुदृढता को बढ़ावा मिले। अखबार, पत्रिकाएँ, टेलीविजन चैनल, वेब् साइट्स आदि के द्वारा कलीसिया आज इस क्षेत्र में सजीव रूप से कार्य करती है।

     

    हम करें  2

    समाचार माध्यमों को किस प्रकार सुसमाचार की घोशणा के मार्ग बना सकते है? चर्चा कीजिए।

     

     

    राजनीति

     

                    राजनीति के क्षेत्र में भी कलीसिया की संतानें कार्यरत हैं। जो बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृश्टिदान का और दलितों को स्वतंत्रता का सन्देष ले कर आए थे (लूकस 4: 18, 19) उस ईसा मसीह के उदाहरण एवं चेतना से प्रेरणा ले कर उन्हें आगे बढना चाहिए। उन्हें उन लोगों के संरक्षक बनना चाहिए जो समाज में अत्याचार एवं षोशण के षिकार होते हैं। जो विष्वासी राजनैतिक क्षेत्र में कार्य करते हैं, उनको चाहिये कि वे उन लोगों की आवाज़ बनें जिनकी वाणी कोई नहीं सुनता और वे कलंकरहित रूप से राजनीति के क्षेत्र में कार्य करें। उत्तम नागरिक बन कर सत्य, न्याय, सहानुभूति, स्वतंत्रता आदि के मनोभाव में समाज का निर्माण करने और राजनैतिक अधिकारियों के साथ प्रयत्न करने के लिए हर एक नागरिक बाध्य है। कलीसिया हमें यह भी सिखाती है कि यदि राजनीतिक अधिकारियों के निर्देष धार्मिक नियमों के खिलाफ हों तो उनका तिरस्कार करने के लिए भी अंतःकरण हमें बाध्य करता है। क्योंकि हमें मनुश्यों की अपेक्षा ईष्वर की आज्ञा मानना है’’ (CCC 2255-2256)।

    कला, साहित्य, सांस्कृतिक क्षेत्र

     

                    मानव की उन्नति में कला एवं साहित्य के महत्वपूर्ण योगदान के विशय में कलीसिया सचेत है। सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कलीसिया की संतानों की सेवा प्रषंसनीय है। ख्रीस्तीय साहित्यकार एवं कलाकार सुसमाचार के सन्देष से प्रभावित हो कर कार्य करें तो आध्यात्मिक चेतना विष्व में कायम रहेगी। उत्तम जीवन को प्रस्तुत करने के लिए कलाकार एवं साहित्यकार सक्षम हैं (कलीसिया आधुनिक युग में GS 62)। फिल्म, नाटक एवं नृत्य कला जो नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देते हैं, विषेश कर ख्रीस्तीय षिल्प कला आदि के द्वारा ख्रीस्तीय सन्देष का प्रचार करने के लिए कलीसिया की संतानें बाध्य हैं। इसलिए कलीसिया इस बात का ध्यान रखती है कि विविध धर्मसंघों द्वारा विष्वास प्रषिक्षण में बच्चों एवं युवजनों की कलात्मक एवं साहित्यिक क्षमताओं का विकास करें और सुसमाचार का प्रचार के लिए उनका उपयोग करें।

    पर्यावरण  संरक्षण

     

                    कलीसिया की संतानों को प्रकृति का संतुलन बनाये रखने में भी ध्यान देना चाहिए। सृश्ट वस्तुएँ समस्त मानव जाति के लिए हैं। सबों की भलाई के लिये उनका संरक्षण करने एवं न्यायपूर्वक उनका उपयोग करने के लिए हम बाध्य हैं। प्रकृति का षोशण करना, जो आने वाली पीढ़ी के लिये हानिकारक है, ठीक नहीं है। असीसी के संत फ्रांसिस प्रकृति एवं जीवजन्तुओं को प्यार करते थे और उन्हें ईष्वर के अनुभव की ओर की सीड़ियाँ मानते थे। सन्त फ्रांसिस को कलीसिया ने पर्यावरण के मध्यस्थ बना रखा है।

    सामाजिक  बुराइयों  के  खिलाफ  सुसमाचार  की आवाज़्

     

                    आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों में और भारत के बाहर भी कार्यरत अनेक मिषनरी हैं। अपने देष एवं घर छोड़ कर अन्य लोगों के बीच सुसमाचार का सन्देष पहुँचाने के लिए ये लोग जो त्याग करते हैं, वह महत्वपूर्ण है। वे वचन की घोशणा एवं जीवन के साक्ष्य द्वारा  अनेकों को ईसा की ओर ले आते हैं। उनकी प्रेरिताई के फलस्वरूप ज्ञान एवं मसीह का अनुभव प्राप्त कर सामाजिक बुराइयों के खिलाफ प्रतिक्रिया करने में लोग सक्षम हो गये हैं। जो अनभिज्ञ लोगों का षोशण करते हुए धनी हो रहे थे, उन के लिए मिषनरियें का सेवा कार्य धमकी बन गये और वे मिषनरियों के विनाष के लिए प्रयास करने लगे। अनेक स्थानों पर सरकार भी यह कहते हुए उनके खिलाफ हो गयी कि वे धर्मपरिवर्तन कराते हैं। इनके दुश्ट विचारों के षिकार हो कर अनेकों को जीवन त्यागना पड़ा और बहुतों को दुःख-तकलीफ झेलनी पड रही है। सिस्टर राणी मरिया और फादर अरूलदास इन में षामिल हैं।

                    सुसमाचार सनातन एवं नित्य नूतन है। जीवन का वचन दो हज़ार वर्श पहले घोशित किया गया है। उसे असली रूप में स्वीकार करना और आधुनिक युग के अनुरूप उस की व्याख्या करना कलीसिया का दायित्व है। षिक्षा, माध्यम, कला, सांस्कृतिक मंच आदि द्वारा सुसमाचार को आधुनिक संसार के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कलीसिया की संतानों को प्रयास करना चाहिए।

     

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें

    गलातियों 1: 11-24

     

    कंठस्थ करें

    ‘‘सुसमाचार सुनाओ, समय-असमय लोगों से आग्रह करते रहो’’ (2 तिमथी 4: 2)।

     

    हम प्रार्थना करें

    हे समग्र विमोचक ईसा, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में कार्यरत ख्रीस्तीय नेताओं को सुसमाचार की चेतना में दृढ़ हो कर अपना कार्य करने के लिए उन्हें आंतरिक षक्ति एवं स्फूर्ति प्रदान कीजिये।

     

    मेरा निर्णय

    ख्रीस्तीय मूल्यों पर आधारित एक व्यक्तित्व का विकास करने के लिये मैं प्रयास करूँगा/गी।

     

    कलीसिया के साथ विचार करें

    लोकधर्मियों के प्रेरितिक कार्य क्षेत्र विषाल एवं जटिल दुनिया हैः राजनीति, धन, व्यवसाय, षिक्षा, सामाजिक सम्पर्क माध्यम, तकनीकी विद्या, कला, खेलकूद इत्यादि की दुनिया है। एषिया के कई देषों में लोकधर्मी अच्छे ठंग से प्रेरितिक कार्यों में लगे हुए हैं। (एषिया की कलीसिया 45)