•             ईसा के प्रेरितिक कार्यों के बारे में सुसमाचारक इस प्रकार वर्णन करते हैं, ‘‘दूसरे दिन ईसा बहुत सबेरे उठ कर घर से निकले और किसी एकान्त स्थान जा कर प्रार्थना करते रहे। सिमोन और उसके साथी उनकी खोज में निकले और उन्हें पाते ही यह बोले, ‘सब लोग आप को खोज रहे हैं‘। ईसा ने उन्हें उत्तर दिया ‘हम आसपास के कस्बों में चलें। मुझे वहाँ भी उपदेष देना है - इसलिए तो आया हूँ’ (मारकुस 1: 35-38)। ”ईसा उनके सभागृहों में षिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और निर्बलता दूर करते हुए, सारी गलीलिया में घूमते रहते थे” (मत्ती 4: 23)।  

                    ईसा के प्रेरितिक कार्य ही कलीसिया के प्रेरितिक कार्यों का आधार एवं आदर्ष हैं। लम्बे समय तक पिता से प्रार्थना करते हुए ही ईसा ने अपने कार्यों के लिए आवष्यक षक्ति प्राप्त की थी। सुबह से ले कर षाम तक उन्होंने सुसमाचार की घोशणा की। वे सब की भलाई करते हुए घूमते रहे। उनके दुःख-भोग एवं क्रूस पर मृत्यु उनके समस्त प्रेरितिक कार्यों की पूर्ति थी।

                    कलीसिया के प्रेरितिक कार्यों का मक़सद सुसमाचार की घोशणा द्वारा ईष्वर का राज्य संसार के सीमान्तों तक फैलाना है। सभी लोग मुक्ति प्राप्त करें और सत्य को जानें ईष्वर की यही इच्छा है प्रेरितिक कार्यों का बुनियाद (AG 7)। प्रार्थना, वचन की घोशणा, सेवा एवं दुःख-भोग द्वारा कलीसिया यह दौत्य पूरा करती है। जो इन मार्गों से अनेकों को ईसा की ओर ले आए, उन संत जनों की मिसाल कलीसिया की संतानों के लिए प्रेरणात्मक है।

     

     

    प्रार्थना की प्रेरिताई

     

                    कलीसिया के प्रेरितिक कार्यों में महत्वपूर्ण है प्रार्थना के ज़रिये प्रेरिताई। कलीसिया जानती है तथा उसका अनुभव भी है कि मध्यस्थ-प्रार्थना द्वारा अनेकों को पष्चात्ताप की ओर ले आ सकती है और उन्हें आत्मषक्ति प्रदान कर सकती है। प्रभु ईसा ने अपने षिश्यों के लिए प्रार्थना की और उन्हें षक्ति प्रदान की। उन का अनुकरण करते हुए आदिम कलीसिया भी सुसमाचार की घोशणा करने वालों एवं सुसमाचार के प्रति पीड़ाएँ सहने वालों के लिए प्रार्थना करने लगी। खुले रूप से सुसमाचार की घोशणा करने में बाधा आने पर तथा वचन की घोशणा करने के कारण प्रेरित तथा षिश्य गण बन्दीगृह में डाले जाने पर सारी कलीसिया ने प्रार्थना में षरण ली (प्रेरित-चरित 4: 23-31)।

                    किसी भी परिस्थिति में हम प्रार्थना का प्रेरिताई कार्य अवष्य कर सकते हैं। इस में लिस्यु की संत तेरेसा हमारे लिए आदर्ष है। जब फ्रांसीनी नामक मुलजिम को प्राणदंड की आज्ञा सुनाई गयी थी, संत तेरेसा ने मन लगा कर प्रार्थना की । उसके फलस्वरूप मृत्यु के पहले फ्रांसीनी ने पष्चाताप किया और प्रभु के साथ उसका मेलमिलाप हुआ। संत तेरेसा की प्रार्थना में ईष्वर को निकट से जानने तथा प्यार करने की संवाद षैली थी। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया कि एक छोटा सा पाप भी करके प्रभु के साथ अपना संबन्ध और उनकी मित्रता नश्ट न करें। संत तेरेसा ने अपनी सारी दुःख-तकलीफें धर्मप्रचारकों के लिए समर्पित कीं। वे सारे विष्व में सुसमाचार का सन्देष पहुँचाना चाहती थी और रोगषय्या पर भी समस्त संसार के मनपरिवर्तन के लिए प्रार्थना करती रही। जो समस्त विष्व की मिषनरी बनना चाहती थी, उस संत तेरेसा को 1927 में विष्व भर के प्रेरितिक कार्यों की मध्यस्था घोशित किया गया। जो एषिया में अयाजक वर्ग का सब से बड़ा धर्मिक संगठन है, उस ‘चेरू पुश्पा मिषन लीग’(Little Flower Mission League) की स्वर्गीय मध्यस्था भी संत तेरेसा है। 

                    धन्य एवुप्रासिया कार्मल धर्मसंघ की सदस्या थी। उन्होंने प्रार्थना का जीवन को केन्द्र बनाया था। लोग उन्हें ‘प्रार्थना की माँ‘ कहते थे; वे दिन रात प्रार्थनालय में बैठी हुई प्रार्थना एवं जपमाला-विनती किया करती थीं। प्रार्थना थी इस सर्मिर्पता का मुख्य भोजन। कामकाज में लगे रहते समय में भी उनकी अन्तरात्मा प्रार्थना में लीन थी। धन्य एवुप्रासिया का जीवन इस बात का सबूत है कि प्रार्थना एवं मनन-चिंतन आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए बहुत ही सहायक हैं। 1982 अगस्त 21 को ये पुण्य सर्मिर्पता स्वर्गीय पुरस्कार प्राप्त करने के लिए बुलायी गयीं। 2006 दिसम्बर 3 को संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने उनको धन्य घोशित किया।

     

    वचन की घोशणा द्वारा प्रेरिताई

     
                    सुसमाचार की घोशणा सबसे महत्वपूर्ण प्रेरितिक कार्य है। क्योंकि वचन की घोशणा द्वारा ही ईसा मसीह को जान सकते हैं और ईष्वर के राज्य के रहस्यों को समझ सकते हैं। जैसे प्रेरित संत पौलुस कहते हैं, ‘‘यदि नहीं सुना हो तो कैसे विष्वास करेगा और यदि घोशणा नहीं की जाये तो कैसे सुनेगा ? वास्तव में सुसमाचार की घोशणा कलीसिया का बुलावा एवं दौत्य है‘‘ (EN 14)। सभी प्रेरित वचन के सषक्त उदघोशक थे। असीसी के संत फ्रांसिस , संत फ्रांसिस ज़्ोवियर जैसे अनेक संत सुसमाचार की घोशणा द्वारा प्रभु ईसा के साक्षी बने।
     
    धन्य चावरा कुरियाक्कोस एलियास और धन्य तेवरपरम्पिल कुंजच्चन ने संसार को यह कर दिखाया कि हम कामकाजों के बीच तथा उनके जरिये वचन की घोशणा कार्यान्वित कर सकते हैं। अपने गुरूजनों, माननीय फादर पोरूक्करा और माननीय आचार्य पालय्कल, के साथ धर्माध्यक्ष की अनुमति से कलीसिया में नया जीवन लाने के लिए धन्य चावरा कुरियाक्कोस ने नये सन्यास समूहों की स्थापना की। वे समझते थे कि मनुश्य के सर्वांगीण विकास के लिए षिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है । चुंकि वे सीरो मलबार कलीसिया के प्रातिधर्माध्यक्ष थे अपने उस अधिकार का उपयोग करते हुए उन्होंने गिरजाघरों के पास स्कूलों का आरंभ करने का आदेष दिया। 
     
    परिवारों में ख्रीस्तीय सन्देष पहुँचाने में माध्यमें का महत्वपूर्ण योगदान समझ कर उन्होंने मुद्रणालयों की स्थापना की ओर भी ध्यान दिया। सन् 1844 में मान्नानम में एक मुद्रणालय का आरंभ किया। कैनकरी में उन्होंने एक अनाथालय षुरू किया, जोकि निस्सहायों के संरक्षण के क्षेत्र में पहला उद्यम है। उन्होंने पैरिषों में आध्यात्मिक साधना का आयोजन कर के एवं पवित्र बलिदान में सुसमाचार के वाचन के बाद उसका सन्देष देते हुए वचन की घोशणा की। 1871 जनवरी 3 को इस कर्मयोगी का स्वर्गवास हुआ जिन्होंने वचन की घोशणा के लिए अनेक उपाय अपनाये। 1986 फरवरी 8 को संत पापा जाॅन पाॅल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोशित किया।
     

    हम करें 

     
    आधुनिक युग में लोकधर्मी किन किन उपायों से वचन की घोशणा कर सकता है - इस विशय पर चर्चा कर के एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। 
     
    समाज के तिरस्कृत दलित लोगों की उन्नति के लिए तेवरपरम्पिल कुंजच्चन ने अपना जीवन समर्पित किया। वे एक पल्लि पुरोहित थे। उन्होंने पाँच हज़ार से भी अधिक लोगों को बपतिस्मा दे कर उन्हें कलीसिया के सदस्य बनाये। वे उन्हें ‘मेरे बच्चे’ कहते थे। 1973 अक्टूबर 16 को वे स्वर्गीय पुरस्कार के लिए बुलाये गये। 2006 अप्रैल 30 को संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने उन्हें धन्य घोशित किया।

     

    सेवा की प्रेरिताई

     

                    संसार में अनेक महापुरुश हैं जिन्होंने निस्वार्थ सेवा द्वारा उस ईसा का साक्ष्य दिया। वे अपने जीवन द्वारा संसार में प्रभु ईसा का साक्ष्य देते हैं जो दूसरों की भलाई करते हुए घूमते फिरते थे। कलकता की मदर तेरेसा सेवा की प्रेरिताई के लिए उत्तम उदाहरण है जो ‘निराश्रितों की माँ’ के नाम से जानी जाती हैं। मदर तेरेसा इस पवित्र वचन का अर्थ भली भाँति समझ गयी थी, ‘एक ही आज्ञा में समस्त संहिता निहित है, यानी अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो‘ (गलातियों 5: 14)। प्रत्येक जरूरतमन्द व्यक्ति को उन्होंने अपना पड़ोसी समझा। उन्होंने कलकत्ता की गलियों में उपेक्षित वृद्धों, अनाथ षिषुओं, मरणासन्न लोगों, दुःखित एवं पीड़ित सबों की सेवा की। गरीबों की बीमारी, भुखमरी एवं अभाव मिटाने के लिए उन्होंने भरसक प्रयास किया। संत मदर तेरेसा ने षोशितों एवं गरीबों में प्रभु ईसा को ही देखा। उन लोगों का संरक्षण करने के लिए उन्होंने एक धर्मसंघ की स्थापना की।

                    जब हृदय ईष्वर के प्रेम से भर जाता है तब कर्मों द्वारा वही प्रेम दूसरों को बाँटने की तीव्र इच्छा मन में उत्पन्न होती है। मदर तेरेसा, जिन्होंने मानव-हृदयों में प्यार एवं करूणा का दीप जलाया, कहती है: ‘‘जब तक स्वयं वेदना का अनुभव न करे तब तक प्यार करते रहना, दूसरों के लिए स्वयं को देते रहना चाहिए। प्रभु ईसा ने साधारण कार्य असाधारण प्रेम से किया। यही मेरा प्रेरितिक दौत्य है”। उन्होंने अपने जीवन द्वारा दुनिया को अच्छी तरह सिखाया कि प्रेरितिक कार्य क्या होता है। ईसा ने कहा, ”मेरे इन भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ तुमने किया, वह तुम ने मेरे लिए ही किया” (मत्ती: 25-40)। प्रभु ईसा ने मदर तेरेसा की सेवा कार्यों के लिए इस दुनिया में ही उन्हें पुरस्कृत किया। दुनिया ने उन्हें ”परोपकार की नबिया ” नाम से पुकारा। उन्हें नाॅबेल पुरस्कार प्रदान करते हुए उनका सम्मान किया गया।

     

    दुखःभोग की प्रेरिताई

     

                    दुनिया ‘दुःख भोगना‘ बुरा मानती थी; लेकिन प्रभु ईसा ने दुःख भोग का मुक्तिदायक मूल्य दुनिया को समझया। उन्होंने अपने जीवन के दुःखों को पिता ईष्वर की इच्छा मानकर दुसरों के दुःख मिटाने का प्रयास किया। दुःख भोगने का मुक्तिदायक अर्थ उन्होंने क्रूस द्वारा साबित किया। दुःख भोग द्वारा ईसा ने संसार की मुक्ति हासिल की। जैसे गेहूँ का दाना मिट्टी में गिर कर मर जाने पर बहुत फल उत्पन्न करता है, वैसे ही दुःख भोग द्वारा बहुत फल उत्पन्न होते हैं।

                    कलीसिया में अनेक सन्त जन हैं जिन्होंने अपनी दुःख तकलीफों को मुक्तिदाता के दुःख भोग के साथ मिला कर मुक्तिदायक बनाया। उन में संत अल्फोन्सा और धन्य मरियम तेरेसा षामिल हैं।

                   ‘पवित्र परिवार धर्मसंघ‘ की संस्थापिका धन्य मरियम तेरेसा  भी दुःख भोगने का मुक्तिदायक मूल्य समझते हुए जीवन बिताती थीं। उनके मन में सदा यह विचार था कि वे प्रभु ईसा के साथ रोने, दुःख भोगने एवं उनके साथ जागते हुए प्रार्थना करने के लिए बुलायी गयी हैं। अपने ही प्रायष्चित कार्यों के फलस्वरूप एवं बीमारी के कारण उत्पन्न घावों को उन्होंने जीवन भर खुषी से झेल लिया। उन्होंने पापियों के मन परिवर्तन के लिए अनेक त्यागपूर्ण कार्य किये और अपनी दुःख तकलीफें उनके प्रति अर्पित करने का ध्यान दिया। 1926 जून 8 को उनका स्वर्गवास हुआ। 2000 अप्रैल 9 को संत पापा जाॅन पाॅल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोशित किया।

                    संत अल्फोन्सा ने दुःख भोग का जीवन बिताते हुए प्रेरितिक कार्य पूरा किया। वे फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसंघ की सदस्या थीं। व्रत धारण के दिन से लेकर वे अनेक बीमारियों से पीड़ित थीं। भरणंगानम आश्रम में षय्याग्रस्त होने पर भी हिम्मत न हारते हुए उन्होंने अपने दुःख-दर्दों को प्रभु ईसा की सलीब से जोडकर प्रभु के लिए अनेक आत्माओं की मुक्ति हासिल की। क्रूसारोपित ईसा के विशय में मनन चिंतन करने से रोगषय्या पर अल्फोन्सा को हिम्मत प्राप्त हुई। प्रेरित संत पौलुस का यह वचन उन्हें षक्ति प्रदान कीः ‘‘वास्तव में जो लोग मसीह के षिश्य बन कर भक्तिपूर्वक जीवन बिताना चाहेंगे, उन सब को अत्याचार सहना ही पड़ेगा” (2 तिमथी 3: 12) वे यह समझती थी कि दुःख तकलीफ के बिना सुख नहीं और मेहनत के बिना फल नहीं प्राप्त होता तथा जो लोग अधिक तकलीफ उठाते हैं वे ही उत्कृश्ट कार्य कर सकते हैं। 1946 जुलाई 28 को छत्तीस साल की उम्र में अल्फोन्सा स्वर्गीय पुरस्कार प्राप्त करने के लिए बुलायी गयीं। 1986 फरवरी 8 को संत पापा जाॅन पाॅल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोशित किया। 2008 अक्टूबर 10 को संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने उन्हें संत घोशित किया।

                    प्रेरितिक कार्य में लगे हुए लोगों के लिए प्रार्थना करते हुए और प्रेरितिक कार्यों की विजय के लिए छोटे-छोटे त्याग पूर्ण कार्यों को अर्पित करते हुए कलीसिया की प्रेरिताई के दौत्य में हम भी भाग ले सकते हैं। अवसर मिलने पर प्रभु ईसा मसीह के बारे में दूसरों को बोलते हुए और जहाँ तक संभव है पैरिष समूह और हमारे कर्मक्षेत्रों में सेवा कार्य करते हुए हम कलीसिया का प्रेरितिक दौत्य निभायें।

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें

    मत्ती 18: 1-5

     

    कंठस्थ करें

    ‘‘तुम सब से पहले ईष्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीज़्ों तुम्हें यों ही मिल जायेंगी‘‘

    (मत्ती 6: 33)।

     

    हम प्रार्थना करें

                    हे प्रभु हमें यह वर दे कि हम प्रार्थना, सहनषीलता एवं वचन की घोशणा द्वारा सुसमाचार के साक्षी बनें।

     

    मेरा निर्णय

                    मैं सभी बातों में ईमानदारी एवं निश्ठा रखते हुए प्रभु ईसा का साक्ष्य दूंगा/गी।

     

    कलीसिया के साथ विचार करें

                    ‘‘संत गण जो स्वर्गीय भवन में प्रवेष कर चुके हैं और प्रभु के साथ निवास करते हैं, वे मसीह द्वारा और मसीह के साथ सदा पिता के सामने हमारे लिए मध्यस्थता करते रहते हैं। वे पिता को वह योग्यता समर्पित करते हैं जिसे ईष्वर एवं मनुश्य के बीच के एकमात्र मध्यस्थ - मसीह - द्वारा उन्होंने पृथ्वी पर प्राप्त की थी। उन्होंने यहाँ समस्त कार्यों में ईष्वर की सेवा की थी। ‘मसीह के दुःख भोग में जो कमी थीं‘, उसे कलीसिया - जो मसीह का षरीर है - के लिए उन्होंने अपने षरीर में पूरा किया। (कलीसिया LG 49)