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               एक बार ईसा ईष्वर के वचन की घोशणा कर रहे थे; तब पवित्र कुँवारी मरियम उनसे मिलने आयीं। भीड़ के कारण माँ अपने पुत्र के पास नहीं पहुँच सकीं। यह देखकर लोगों ने ईसा से कहा, “आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आप से मिलना चाहते हैं”। ईसा ने  उत्तर दिया, ‘‘मेरी माता और मेरे भाई वे ही हैं, जो ईष्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं” (लूकस 8: 19-21)।

     

    मरियम की मिसाल

     

                    मरियम ने ईष्वर का वचन ग्रहण करके उसकी पूर्णता में जीवन बिताया। जिस पल मरियम ने कहा, “मैं प्रभु की दासी हूँ आपका कथन मुझ में पूरा हो जाए”, तब से वचन उनमें निवास करने लगे। उन्होंने उस वचन को षरीर दिया और उस वचन (ईसा) का पालन-पोशण किया। माँ ने क्रूस के नीचे भी ईष्वर की इच्छा को स्वयं समर्पित किया। उन्होंने ईसा की मृत्यु के बाद षिश्यों के साथ रह कर साहस प्रदान करते हुए उन्हें पवित्रात्मा को ग्रहण कर के वचन के साक्षी बनने के लिए तैयार किया। मरियम ने पृथ्वी पर ईष्वर को महिमान्वित किया; ईष्वर ने मरियम को स्वर्ग में महिमान्वित किया।

     

    वे लोग  जिन्होंने वचन का साक्ष्य दिया

     

                    षिश्यों ने जीवन के उस वचन की घोशणा की, जो आदि से विद्यमान था, जिसे उन्होंने सुना था, अपनी आँखों से देखा था, जिसका अवलोकन किया था तथा जिस का अपने हाथों से स्पर्ष किया था (1 योहन 1ः1)। ईष्वर के वचन की घोशणा द्वारा उन्होंने कलीसियायी समूहों का गठन किया। धर्माचार्यों ने पवित्र वचन की सही व्याख्या देकर तथा उस पर आधिकारिक षिक्षा देकर वचन के अनुसार जीवन बिताने में ईष्वर की जनता की सहायता की। जब कभी कलीसिया में विष्वास और एकता के विरुद्ध मुसीबतें उठीं तब उन्होंने ईष- वचन की तलवार हाथ में लेकर लड़ाई की। उस वचन के प्रति पीड़ाएँ सहकर तथा धर्म-विरोधियों के हाथों से षहीद बनकर उनका स्वर्गवास हुआ।

    हम करें - 1

                    भारत में संत फ्रान्सीस ज़ेव्यर के प्रेरिताई कार्यों पर एक विवरण तैयार कीजिए और उसे कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

     

                    सन्तों का एक बडा झुण्डा स्वर्ग में है। उन में ऐसे लोग हैं जिन्होंने ईष्वर के वचन के अनुसार जीवन बिताने का प्रयास किया तथा ऐसे लोग भी जिन्हें ईष्वर के वचन के साक्षी होने के कारण जान की कुर्बानी करनी पडी। हर एक ईसाई सन्तों के इस विषाल समूह में बुलाया गया है।

     

    सन्त जनों का जीवन

                   

                    कलीसिया संतों का समूह है। संत वे लोग हैं जिन्होंने ईष्वर के वचन स्वीकार कर उस के अनुसार वीरोचित जीवन बिताया। ईष्वर के वचन के मार्ग पर हिम्मत के साथ आगे बढ़ने के लिए संतों का जीवन कलीसिया की संतानों को पेररणा देता है। प्रेरित पौलुस की षिक्षा के मुताबिक वे सभी संत हैं जिन्होंने बपतिस्मा ग्रहण किया है। वे हर कलीसिया को “संत“ कह कर (1 कुरिन्थि 1: 2; 2 कुरिन्थि 1: 1; फिलिप्पि 1: 1)। सुसमाचार के संदेषों के अनुसार वीरोचित जीवन बिताने वालों को ही कलीसिया औपचारिक रूप से “संत” कहती है।

                    “यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पँूंजी रखी रहेगी। तब आकर मेरा अनुसरण करो” (मत्ती 19: 21)। इस पवित्र वचन ने ही संत एन्थनी को सांसारिक सुख एवं धन सम्पत्ति छोड़ ने और एकान्त में जाकर तपस्या करने की प्रेरणा दी। इसी पवित्र वचन से संत बनड़िक्ट और  असीसी के संत फ्रान्सीस को तापसिक जीवन बिताने की प्रेरणा मिली। “मनुश्य को इससे क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गँवा दे?” (मत्ती 16: 26)। इस पवित्र वचन से प्रेरित होकर कुलीन फ्रान्सीस ज़ेवियर धन-सम्पत्ति एवं प्रतिश्ठा छोड़कर, एक मिषनरी बन कर, भारत में आये। भारत के दूसरे प्रेरित के नाम से वे जाने जाते हैं।      

                    “खोल कर पढ़ो” - अंतरात्मा में यह आवाज़ सुनकर जब संत अगस्तीन ने पवित्र ग्रन्थ खोला तब उन्हें यह पवित्र वचन मिला: “रात प्रायः बीत चुकी है, दिन निकलने को है, इसलिए हम अन्धकार के कर्मों को त्याग कर ज्योति के षस्त्र धारण कर लें। हम दिन के योग्य सदाचरण करें। हम रंगरेलियों और नषेबाजी, व्यभिचार और भोगविलास, झगडे और ईश्र्या से दूर रहें। आप लोग प्रभु ईसा को धारण करें और षरीर की वासनाएँ तृप्त करने का विचार छोड़ दें” (रोमि 13: 12-14)। वे उस दिन तक पाप के जिस रास्ते पर चल रहे थे उस से अलग रहने की ईष्वर की आज्ञा है यह-ऐसा समझ कर संत अगस्तीन ने इस पवित्र वचन को माना तथा वे पाप का मार्ग छोड़कर धार्मिकता के रास्ते में आये। वे उन धर्माचार्यों में एक बने, जिन्होंने पवित्र कलीसिया में आधिकारिक षिक्षा दी है।

                    कलीसिया में बहुत सारे सन्त जन हैं जो पवित्र वचन के अनुसार जीवन बिताकर धन्य बने हैं। असीसी के संत फ्रान्सीस, संत क्लारा, पादुवा के संत एन्थनी, संत थोमस अक्वीनास, आविला की संत तेरेसा, संत जाॅन मरिया वियानी, संत डोण बोस्को, संत पीयूस दसवाँ, लिस्यु की संत तेरेसा, संत मरिया गोरेत्ती जैसे अनेक संतों ने वचन के अनुसार जीवन बिताकर कलीसिया को धन्य बनाया। भारत में से संत और धन्य व्यक्तियों की सूची में षामिल संत अल्फोन्सा, धन्य कुर्याकोस एलियास चावरा, मरियम त्रेस्या, एवुप्रासिया, तेवरपरम्पिल कुंजच्चन, मदर टेरेसा आदि भी वचन के अनुसार जीवन बिताकर पवित्र बने हैं। याजक (पुरोहित), समर्पित लोग, लोकधर्मी, दीन-दुःखियों के प्रति करुणा के कार्य करने वाले जैसे अनेक लोग ईष्वर के वचन के जीवन्त साक्षी बन कर आज भी कलीसिया में विद्यमान हैं।

     

    हम करें - 2

                    संत मरिया गोरेत्ती के जीवन-समर्पण के बारे में पढ़कर एक टिप्पणी तैयार कीजिए।

     

    पुरोहित (याजक)

     

                    संस्कारों के अनुश्ठान, ईष्वर के वचन की षिक्षा एवं मेशपालीय षुश्रूशाओं द्वारा कलीसिया की संतानों को पवित्रता के मार्ग पर ले चलने के लिए नियुक्त हैं धर्माध्यक्ष और पुरोहित। द्वितीय वत्तिकान महासभा यह सिखाती है कि “ईष्वर के वचन का अनुश्ठान करने वाले पुरोहितों को चाहिये कि वे हर दिन उस वचन को पढें और उस पर मनन-चिन्तन करें जिसे दूसरों को पढ़ाने के लिए वे बाध्य हैं’’ (पुरोहित 13)। प्रेरित संत पौलुस ने एक कलीसियायी समूह का गढ़न किया और तिमत्ति को उस समूह का चरवाहा धर्माध्यक्ष नियुक्त किया। उस के बाद उसे इस प्रकार उपदेष देते हैं, “धर्मग्रन्थ का पाठ करने और प्रवचन तथा षिक्षा देने में लगे रहो” (1 तिमथि 4: 13)। यह पवित्र वचन हमें याद दिलाता है कि ईष्वर का वचन अपनाने, उसके अनुसार जीवन बिताने तथा वचन की घोशणा करने की बड़ी जिम्मेदारी है पुरोहितों को। संत जाॅंन मरिया वियानी, पुरोहितों के प्रेरिताई कार्य का सर्वोत्तम उदाहरण है जो आत्मीय अंधकार एवं अधार्मिकता में जीवन बिता रहे आर्स के हज़ारों लोगों को वचन की घोशणा, मेल-मिलाप संस्कार एवं अन्य संस्कारों के ज़्ारिए और सर्वोपरि अपने स्वयं के आदर्ष जीवन द्वारा पष्चाताप की ओर ले आये।

     

     

    समर्पित लोग

     

                    पवित्रात्मा से प्रेरित होकर ब्रह्मचर्य, निर्धनता और आज्ञापालन - इन सुसमाचारी सद्गुणों का विषेश रूप से पालन करने के लिए व्रत लेने वाले हैं समर्पित लोग। “समर्पित जीवन का सबसे बुनियादी नियम है सुसमाचार के ईसा का अनुकरण करना” (सन्यास जीवन PC2)। संत पापा योहन पौलुस द्वितीय  “समर्पित जीवन” नामक प्रेरितिक प्रबोधन के द्वारा यह षिक्षा देते हैं कि समर्पित व्यक्ति को अपने जीवन के द्वारा उस ईसा का साक्षी बनना चाहिए जो ब्रह्मचारी, दरिद्र एवं मृत्यु तक आज्ञाकारी थे। स्वयं के बुलावे के अनुसार प्रेम की पूर्णता की ओर बढते हुए वे कलीसिया की पवित्रता के साक्षी बनते हैं। दूसरों को पवित्रता में आगे बढ़ाने के लिए वे प्रेरणा बनते हैं। घर, देष, सुख-सुविधाएँ और सब कुछ छोड़कर मिषन प्रान्तों में, जहाँ आज तक ईसा का नाम नहीं सुनाया गया है, प्रेरितिक कार्य करने वाले समर्पित लोग अनेक हैं। समग्र विमोचन के क्रान्तिकारी ईसा का अनुकरण करते हुए अषिक्षित एवं षोशित लोगों को जागरूक करने तथा षोशण से बचाने के लिए समर्पितों की कोषिष कभी-कभी उन्हें षहादत तक ले जाती है।

     

    प्रेरित लोक धर्मी

     

                    ज्ञान-स्नान द्वारा मसीह के साथ जो एकता बनती है, उसी से विश्वासियों को प्रेरितिक कार्य करने का फज़र् एवं अधिकार मिलते हैं। अपने सभी कार्यों द्वारा आत्मिक बलि चढ़ाने तथा सारी दुनिया में ईसा के साक्षी बनने के लिए वे बुलाये गये हैं। विष्वास के प्रकाष में ईष्वर के वचन पर मनन करने से ही एक व्यक्ति सदा और सब कहीं ईष्वर से मिलने तथा ईष्वर का साक्ष्य देने के लिए समर्थ हो जाता है (धर्मसेवकों का प्रेरिताई कार्य AA 3, 4)। प्रेरितिक उत्साह के जरिये सांसारिक परिस्थितियों, घटनाओं और अनुभवों को पवित्र करने के लिए वे बाध्य हैं। संत मोनिका, धन्य फ्रेडरिक ओसानाम, हँगरी की संत एलिज़बत, संत डोण बोस्को की माँ संत मम्मा मार्गरट, बेरेत्ता, जान्ना मोला जिसने गर्भस्थ-षिषु की जान बचाने के लिए खुद की जान न्यौछावर की आदि संत लोक धर्मी के पे्ररिताई कार्य द्वारा संत बनने के अच्छे नमूने हैं।

     

    लोकोपकारी कार्य करने वाले

     

                    ईष्वर के वचन का मर्म पे्रम है। प्रेम से प्रेरित होकर ही ईष्वर ने अपने इकलौते (वचन) को इस संसार में भेजा (योहन 3: 16)। जो ईष्वर का वचन पढ़ना, उस पर मनन करना तथा उस के अनुसार जीवन बिताना चाहते हैं, वे सहज ही लोकोपकारी कार्यों में लगे रहेंगे। क्योंकि प्रेम की अभिव्यक्ति है लोकोपकारी कार्य। ईश्वर का वचन जीवन में कहाँ तक कार्यान्वित हुआ - इसका मापदंड भी है लोकोपकारी कार्य। “मैं भूखा था तुमने मुझे खिलाया...“ (मत्ती 25: 31-36) इन षब्दों से न्याय के दिन ईष्वर जो निर्णय सुनाएगा है वह लोपोपकारी कार्यों पर आधारित होगा। अनाथों और विधवाओं का संरक्षण एवं षारीरिक और मानसिक रूप से पीड़ित लोगों की सहायता करते हुए कलीसिया जो सेवा-कार्य करती है, वे ईष्वर के वचन का जीवन्त साक्ष्य हैं। संत याकूब हमें याद दिलाते हैं कि कर्मों के अभाव में विष्वास पूर्ण रूप से निर्जीव है (याकूब 2: 14-17)।

                    ईष्वर का वचन हमें पवित्र बनाता है। ईसा ने अपने षिश्यांे से कहा, ”मैंने तुम लोगों को जो षिक्षा दी है, उसके कारण तुम षुद्ध हो गये हो”(योहन 15: 3)। जो ईष्वर के वचन पर मनन-चिन्तन करते और उसके अनुसार जीवन बिताते हैं वे संत बन जायेंगे। हम भी उन संतों की सूची में षामिल हो जायं जिन्होंने ईष्वर का वचन पढ़ा और उस पर मनन करते हुए वचन को अपने जीवन में क्रियान्वित किया।

     

    ईश वचन पढें और मनन करें

    मारकुस 3: 31-35

     

    कंठस्थ करें

                    “मेरी माता और मेरे भाई वे ही हैं, जो ईष्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं“ (लूकस 8: 21)।

     हम प्रार्थना करें

                    हे प्रभु ईसा, जिन्हांेने जीवन में सक्रिय रहते हुए पवित्रता हासिल की, उनके जैसे हमें भी मेहनत भरे जीवन में पवित्रता प्राप्त करने की सहायता कीजिये।

     

    मेरा निर्णय

                    ईष्वर के वचन के अनुसार जीवन बिताते हुए पवित्रता के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मैं निरंतर कोषिष करूँगा/गी।

     

    कलीसिया के साथ विचार करें

                    अपनी बुलाहट और परिस्थिति कुछ भी हो, सभी मसीही खीस्तीय जीवन एवं प्रेम की पूर्णता प्राप्त करने के लिए बुलाए गए हैं। यह पवित्रता समाज में मानव जीवन बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहन देती है। ईसाइयों को हर बात में पिता की इच्छा पूरी करते हुए और खुद को पूर्ण रूप से ईष्वर की महिमा और पडोसी की सेवा के लिए अर्पित करते हुए, ईसा के पदचिन्हों पर चलना चाहिए (LG 40)