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                 पेंतेकोस्त के दिन पवित्रात्मा से परिपूर्ण होकर संत पेत्रुस ने दूसरे षिश्यों के साथ मिलकर यह घोशणा की कि ईसा ही मुक्तिदाता एवं प्रभु है। उनका भाशण सुन कर लोगों ने उनसे पूछा - ‘‘भाइयो, हमें क्या करना चाहिए? पेत्रुस ने उत्तर दिया, “आप लोग पष्चाताप करें। आप लोगों में प्रत्येक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए ईसा के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण करें। इस प्रकार आप पवित्रात्मा का वरदान प्राप्त करेंगे, क्योंकि वह प्रतिज्ञा आपके तथा आपकी संतान के लिए है, और उन सबों के लिए, जो अभी दूर हैं और जिन्हें हमारे प्रभु ईष्वर बुलाने वाला है” (प्रेरित-चरित 2: 37-39)। प्रेरितों का साक्ष्य अनेकों को ईसा मसीह की ओर ले आया।

               प्रेरित-चरित के अनुसार कलीसिया मुक्ति का मार्ग एवं विष्वासियों का समूह  है। कलीसिया के स्वभाव को सूचित करने के लिए इस ग्रन्थ में “मार्ग” षब्द का प्रयोग किया गया है। पे्ररित-चरित ग्रन्थ इस “मार्ग“ को “मुक्ति का मार्ग”, “मसीह का मार्ग” आदि कहता है (प्रेरित-चरित 16: 17, 9: 2)।

             ईसा मसीह से होकर ही मनुश्य को पिता की सन्निधि में प्रवेष मिलता है (योहन 14: 6)। इसलिए ईसा हमारे लिए मुक्ति का मार्ग है। हमारे पवित्र बलिदान में हम इस प्रकार प्रार्थना करते हैं - “उस हमारे ईष्वर ने अपने जीवनदायी सुसमाचार द्वारा नबियों, पे्ररितों, षहीदों, संतों, धर्माचार्यों, धर्माध्यक्षों, याजकों और उपयाजकों की तथा पावन स्नान संस्कार के जीवंत और जीवनदायी चिन्ह से अंकित हुई पवित्र एवं सार्वत्रिक कलीसिया की सब संतानों की षुद्धता और पवित्रता का मार्ग हमें सिखलाया“। इसी कारण कलीसिया भी जो ईसा मसीह की निरंतरता है, मुक्ति का मार्ग है। मुक्तिदाता ईसा मसीह की ओर सभी जनताओं को ले जाने के लिए कलीसिया निरंतर आग्रह करती है तथा उसके लिए परिश्रम भी करती है। आदिम कलीसिया के समय से यह उत्साह स्पश्ट रूप से हम देख सकते हैं।

     

    एक समूह जिसने सुसमाचार सुना था

            

                    आदिम ईसाई ईष्वर का वचन सुनने के लिए सदा तत्पर रहते थे। प्रेरित-चरित ग्रन्थ में आदिम कलीसिया को प्रेरितों की षिक्षा, भाईचारा, प्रार्थना एवं पवित्र बलिदान में तत्परता के साथ भाग लेने वाले एक समूह के रूप में प्रस्तुत किया है। वे इसलिए प्रेरितों के पास एकत्रित होते थे कि वे ईष्वर का वचन सुनें, ग्रहण करें तथा उस के अनुसार जीवन बितायें। प्रेरितों की षिक्षा का सारांष था वह षाष्वत मुक्ति जिसे ईष्वर ईसा मसीह के जरिये प्रदान करता है। जिन्होंने ईसा के साथ रह कर ईसा से ही षिक्षा ली थी, उन प्रेरितों से ईष-वचन सुनना ही जनता बडा सौभाग्य मानते थे। प्रेरितों ने, जो पवित्रात्मा के प्रकाष में मसीही रहस्यों की गहराई तक पहुँच चुके थे, अपने अनुभव एवं विष्वास की घोशणा की । उन्होंने श्रोताओं को पुनरूत्थित मसीह का परिचय कराने का भरसक परिश्रम किया। इसलिए ईसा का जन्म, जीवन, वचन, कार्य, दुःखभोग, मृत्यु, पुनरूत्थान, पवित्रात्मा का आगमन, कलीसियाई समूहों का आरंभ आदि के बारे में प्रेरितों ने लोगों को सिखाया।

     

    हम करें - 1

                    चर्चा कीजिए कि आदिम कलीसिया का प्रेरितिक उत्साह आपकी पल्ली में वास्तविक रूप से कहाँ तक विद्यमान है।

     

    एक समूह जिसने सुसमाचार के अनुसार जीवन बिताया

     

                    जो सुसमाचार की ओर आकर्शित हुए थे, वे सब एक समूह बन गये। विष्वासियों का समूह एक हृदय और एक प्राण था (प्रेरित-चरित 4: 32)। यह एकता तब प्रकट हुई जब उन्होंने स्वयं को और अपना सब कुछ, समूह एवं उसके हर एक व्यक्ति के लिए पूर्ण रूप से समर्पित किया। कोई बाहरी मजबूरी नहीं बल्कि विष्वास से प्राप्त आत्मा की प्रेरणा ही उन्हें इस प्रकार की एक एकता में ले आया। भौतिक वस्तुओं को बाँटने में ही यह एकता सीमित नहीं थी, बल्कि ईसा मसीह के पुनरूत्थान में विष्वास करने से उत्पन्न एक नया आपसी संबन्ध इस एकता में प्रकट था। सांसारिक सम्पत्ती में उन्होंने आश्रय नहीं रखा। ईष्वरीय परिपालन की प्रत्याषा ही उन्हें आगे ले चली। इसी कारण भौतिक सम्पत्ति को बाँटने में उन्होंने आनन्द और संतुश्टि का अनुभव किया।

                     समूह के सदस्य मसीह के साथ तथा आपस में जो एकता रखते हैं वही एक समूह को कलीसिया बनाती है। इसी कारण सम्पत्ति बाँटने में जो कमी और गलतियाँ होती थीं उन्हें प्रेरित गण गम्भीर अपराध मानते थे। विष्वासियों के बीच भिन्नता उत्पन्न होने पर (1कुरि 10: 13) तथा पवित्र बलिदान में बिना बाँटे अपनी-अपनी रोटी झटपट खाने पर भी (1 कुरन्थि 11: 17-22) संत पौलुस ने कुरिन्थ की कलीसिया पर कठोर षब्दों में आरोप लगाया। अननियास और सफीरा दम्पति की मृत्यु इस पाप की गम्भीरता दर्षाती है (प्रेरित-चरित 5: 1-11)। इस एकता का महत्व जानकर ही प्रेरितों ने, विष्वासियों के समूह में यूनानी विधवाओं की उपेक्षा की जाने पर, सख्त कार्यवाही की। कलीसियायी समूह की एकता को बनाये रखने तथा दृढ़ बनाने हेतु प्रेरितों ने धर्मसेवकों को नियुक्त किया (प्रेरित-चरित 6: 1-7)। दरिद्रों की उपेक्षा की सूचनाएँ पाने पर उस पर तुरन्त कार्रवाई करने के लिए प्रेरितों के साथ लोग भी तैयार होते थे । दरिद्रों के लिए चन्दा इकट्ठा करने के लिए भी वे तैयार हो गये (2 कुरिन्थि 8: 14-15)। ये सब विष्वास से उत्पन्न एकता की षक्ति को दर्षाते हैं।

     

    समूह जिसने पवित्र बलिदान को षक्ति-केन्द्र माना 

                   

                    जो विष्वास में एक बना था, उस कलीसियायी समूह का षक्ति केन्द्र वास्तव में पवित्र बलिदान ही था। एक मन, निष्कलंक हृदय एवं आनंद के साथ वे पवित्र बलिदान में भाग लेते थे। अंतिम भोज की याद में सम्पन्न पवित्र बलिदान को वे ईसा मसीह के षरीर-रक्त में भागीदारी मानते थे। वे दृढ़ विष्वास करते थे कि जो रोटी और दाखरस वे स्वीकार करते थे वे प्रभु ईसा का षरीर और रक्त हैं। पवित्र बलिदान में भागीदारी से ही दुःख-तकलीफों एवं कठिनाइयों में उन्हें विषेश षक्ति मिलती थी। इसी भागीदारी से ही उन्हें विष्वास-जीवन में बढ़ावा मिला।

    हम करें - 2           

                    पवित्र बलिदान की प्रणाम-प्रार्थनाओं की जाँच कर उनमें प्रेरिताई दौत्य को दर्षाने वाले वाक्यों को ढूँढ कर लिखिए।

     

    समूह जो प्रार्थना करता है 

     

                   जिसने सुसमाचार के अनुसार जीवन बिताया उस आदिम कलीसिया का, सर्वश्रेश्ठ गुण था उसका प्रार्थना-जीवन।  यहूदियों की प्रार्थना की तरीका ही आदिम ईसाइयों ने अपनायी थी। पूरे दिन को पवित्र करने के लिए वे अलग-अलग पहर में प्रार्थना करते थे।   पवित्र ग्रन्थ में हम देखते हैं कि प्रेरित गण तीसरे पहर (सुबह 9 बजे) छठवें पहर (12 बजे) नौवें पहर (3 बजे) और बारहवें पहर (6 बजे) को प्रार्थना करते थे। पेंतेकोस्त के दिन प्रार्थना में लीन रहे षिश्यों पर तीसरे पहर ही पवित्रात्मा उतर आया था (पेररित-चरित 2: 15)।  छठवें पहर में जब पेत्रुस प्रार्थना कर रहे थे तब एक दर्षन के ज़रिए ईष्वर ने उन्हें यह प्रकट किया कि विजातीय लोग भी कलीसिया में स्वीकार्य हैं। तीसरे पहर की प्रार्थना के लिए मन्दिर जाते समय पेत्रुस और योहन ने लँगडे़ को चँगा किया जो ’सुन्दर‘ नामक फाटक के पास भीख माँग रहा था (पेररित-चरित 3: 1)।  प्रेरित-चरित में सामूहिक एवं व्यक्तिगत रूप से प्रार्थना करने के उदाहरण हम देख सकते हैं (पेररित-चरित 4: 23-24, 7: 59-60)। महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले वे मन लगाकर प्रार्थना करते थे (प्रेरित-चरित 1: 24-25, 13: 3)। ख्रीस्तीय विष्वास को अपनाने के कारण जब उन्हें अत्याचार सहना पड़ा तथा विश्वास के प्रति दुःख-तक्लीफें झेलनी पड़ीं तब प्रार्थना ही उन्हें सांत्वना और षक्ति प्रदान की थीं।  बन्दीगृह में भी वे ईष्वर की स्तुति करते हुए हिम्मत जुड़ाते रहे (पेररित-चरित 16: 25)।

     

     

    समूह जिसने सुसमाचार की घोषणा की               

                    पवित्र वचन में हम देखते हैं कि जिन्होंने भी ईसा से सुसमाचार का सन्देष स्वीकार किया है वे सब सुसमाचार के उद्घोशक बन जाते हैं (योहन 4: 7-26, 9: 1-12, लूकस 19: 1-10)। प्रेरितों की घोशणा के फलस्वरूप स्थापित आदिम कलीसिया में भी यह उत्साह सक्रिय था। उनकी जीवन-षैली ही सुसमाचार की घोशणा थी। सुसमाचार का संदेष उनके विचारांे, मनोभावों एवं जीवन की षैली में भर जाने से उनके मानवीय रिष्ते प्रेममय बन गये। इसी वजह से विष्वासियों की संख्या बढ़ती गयी (प्रेरित - चरित 2: 47)। उन्होंने अपना विष्वास एवं नये समुदाय मंे अपने अनुभव - ये सब दूसरों को बताये और निर्भीकता से  ईष्वर का वचन सुनाया (प्रेरित - चरित 4: 31)।

                    जब प्रेरितों को सज़ा देते हुए यह चेतावनी देकर भेजा कि ईसा के नाम पर षिक्षा न दें, तब उन्होंने जवाब दिया,“हम ने जो देखा और सुना है, उसके विशय में नहीं बोलना हमारे सामथ्र्य के बाहर है” (प्रेरित - चरित 4: 20)। विष्वास के कारण जब वे बिखरे हुए थे तब भी उनका ध्यान घूम-घूम कर सुसमाचार का प्रचार करने में था (प्रेरित - चरित 8: 4)।

               ईष्वर का वचन सुनकर तदनुसार जीते हुए, सुसमाचार की घोशणा करते हुए तथा पवित्र बलिदान द्वारा षक्ति प्राप्त करते हुए आदिम कलीसिया विष्वास एवं एकता में आगे बढ़ी। इसी प्रकार कलीसिया के प्रेरिताई उत्साह में भाग लेकर हम भी आगे बढ़े; ईसा मसीह के सुसमाचार की घोशणा करें।

    ईश वचन पढें और मनन करें

    प्रेरित-चरित 4: 32-37

     

    कंठस्थ करें

    ”विष्वासियों का समूह एक हृदय और एक प्राण था” (प्रेरित-चरित 4: 32)।

     

    हम प्रार्थना करें

                    हे प्रभु ईसा मसीह, जैसे आदिम ख्रीस्तीय समूह पेरम और एकता में बढ़ा, वैसे हमें भी प्रेम और एकता में बढ़ा दीजिये।

     

    मेरा निर्णय

                    मैं जिस कलीसियायी संगठन का सदस्य हँ, उस में अन्य सदस्यों के साथ कम से कम महीने में एक बार पवित्र वचन पढ़कर उस में निहित संदेष पर चर्चा करूँगा/गी।

     

    कलीसिया के साथ विचार करें

                    ईसा मसीह  के साथ दृढ रूप से संयुक्त कलीसिया एक संस्कार है जो ईष्वर की निकट संगति और सारी मानव जाति की एकता में सहायक सिद्ध होता है या फिर कलीसिया उसी प्रकार की संयुक्तता और एकता के चिन्ह और साधन है ?