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                “योहन के गिरफ्तार हो जाने के बाद ईसा गलीलिया आये और यह कहते हुए ईष्वर के सुसमाचार का प्रचार करते रहे - समय पूरा हो चुका है। ईष्वर का राज्य निकट आ गया है। पष्चाताप करो और सुसमाचार में विष्वास करो” (मारकुस 1: 14-15)। ईसा को यह मालूम था कि स्वर्गराज्य का सुसमाचार सुनाने के लिए उनका अभिशेक हुआ है। ईसा ने अपनी उपस्थिति, संदेष एवं चमत्कारों द्वारा संसार को ईष्वर का राज्य प्रकट किया। उन्होंने स्वर्गराज्य के सुसमाचार की घोशणा करने का दौत्य प्रेरितों को सौंप दिया। कलीसिया के द्वारा आज भी यह दौत्य जारी है।

    कलीसिया: सुसमाचार की घोषणा का फल

     

                    पेररितों ने ईसा से स्वर्गराज्य का संदेष स्वीकार किया। प्रभु ने उसके भेद को उन्हें प्रकट किये। ईसा ने अपने सार्वजनिक जीवनकाल में ही षिश्यों को स्वर्गराज्य की घोशणा करने के लिए भेजा (मत्ती 10: 5-8)। ईसा ने उन्हें आदेष दिया कि वे ईष्वरीय परिपालन में पूर्ण आश्रय रख कर, दुःख-तकलीफों को सहन कर प्रेरिताई कार्य करें। लाठी के सिवा रास्ते के लिए कुछ भी नहीं ले जायें - न रोटी, न झोली, न फेंटे में पैसा। वे पैरों में चप्पल बाँधें और दो कुरते नहीं पहनें (मारकुस 6: 7-9)। ईसा ने उन्हें सिखाया कि सुसमाचार का घोशणा कार्य त्यागों एवं कठिनाइयों से भरा हुआ है। उन्होंने  यह चेतावनी दी कि वे भेडियों के बीच भेडों की तरह भेजे जा रहे हैं (मत्ती 10: 16)। ईसा ने उन्हें मुख्य रूप से यह घोशणा करने को कहा कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है (मत्ती 10: 7-8)।

                    पेररित गण प्रभु ईसा के वचनों एवं कार्यों तथा सर्वोपरि उनके मरण एवं पुनरूत्थान के साक्षी बने। पुनरूत्थित ईसा ने दर्षन देकर षिश्यों को विष्वास में सुदृढ़ बनाया।  ”मेरी भेडों को चराओ” - यह कहते हुए  ईसा ने पेत्रुस को कलीसिया का चरवाहा (षीर्श) नियुक्त किया (योहन 21: 15)। पेंतेकोस्त के दिन पवित्रात्मा से षक्ति पा कर षिश्यों ने सार्वजनिक रूप से सुसमाचार की घोशणा की षुरूआत की (प्रेरित चरित 2: 14)। उसी दिन पेत्रुस के सुसमाचार की घोशणा सुन कर उस समूह का मनपरिवर्तन हुआ और आदिम ख्रीस्तीय समूह का गठन हुआ। जिन्होंने विष्वास के साथ ज्ञानस्नान ग्रहण किया, वे सब, प्रेरितों की षिक्षा, प्रार्थना एवं पवित्र बलिदान में आनन्दपूर्वक भाग लेते थे (प्रेरित चरित 2: 46)। इस प्रकार कलीसिया बढ़ती रही।

                संसार के कोने कोने तक जा कर सुसमाचार सुनाने के प्रभु का आदेष ले कर प्रेरित गण दुनिया के भिन्न भिन्न स्थानों पर गये। वे जहाँ भी पहुँचे, वहाँ उन्होंने सुसमाचार की घोशणा की। अपने वचनों एवं साक्ष्य द्वारा वे अनेकों को प्रभु की ओर ले आये। प्रेरितों के कार्य ईसा के नाम पर एवं उनसे प्राप्त अधिकार और षक्ति से प्रभावित थे। जिस मुक्ति के बारे में प्रेरितों ने सिखाया और जिसका पवित्रात्मा ने साक्ष्य दिया उस मुक्ति को प्रभु चिन्हों एवं चमत्कारों द्वारा प्रमाणित करते रहे। हज़ारों ने प्रभु मसीह में विष्वास किया और ज्ञानस्नान स्वीकार किया। इस प्रकार कई जगहों पर कलीसियायी समूहों का गठन हुआ। भारत में संत थाॅमस ने सुसमाचार की घोशणा की जिसके फलस्वरूप  कलीसिया की स्थापना हुई।

    कलीसिया: सुसमाचार की घोशणा करती

     

                   कलीसिया, जिसका गठन सुसमाचार की घोशणा के फलस्वरूप हुआ था, सुसमाचार का प्रचार करती है। कलीसिया अपना यह दौत्य दो प्रकार से निभाती है:

    (1)          कलीसिया का उत्साह, उसकी षक्ति एवं नवीनता की रक्षा करने हेतु कलीसिया में ही सुसमाचार की घोशणा।

    (2)          गैर-ईसाइयों को सुसमाचार सुनाने का कार्य।

                    सुसमाचार की घोशणा कलीसिया की ज़िम्मेदारी है। यह उसकी बुलाहट एवं दौत्य है। कलीसिया के बिना सुसमाचार की घोशणा असंभव है। सुसमाचार की घोशणा द्वारा ही कलीसिया का व्यक्तित्व प्रकट होता है। सुसमाचार की घोशणा करना, लोगों को सिखाना, संस्कारों द्वारा कृपा पाने का अवसर तैयार करना, ये सब कलीसिया के सुसमाचार की घोशणा के भाग हैं  ( EN 14)

     

     

    घोषणा का विषय: स्वर्गराज्य

     

                 ईसा का दौत्य था स्वर्गराज्य की घोशणा एवं उसकी स्थापना। पवित्र वचन कहता हैः “ईष्वर का राज्य खाने पीने का नहीं, बल्कि वह न्याय, षान्ति और पवित्रात्मा द्वारा प्रदत्त आनन्द का विशय है” (रोमि 14: 17)। सबों के सृश्टिकर्ता एवं पिता ईष्वर के करूणामय प्रेम में विष्वास करते हुए सबों को भाई-बहिनों के समान प्यार करने की अवस्था है स्वर्गराज्य। तभी न्याय और षान्ति उत्पन्न होते हैं। स्वर्गराज्य का अनुभव प्रदान करने के लिए ही ईसा पापों की क्षमा करते हुए, रोगियों को चंगा करते हुए तथा मुक्ति का सुसमाचार सुनाते हुए गाँव-गाँव घूमते थे।

     

                   ईष्वर की इच्छा पूरी की जाने की अवस्था है स्वर्गराज्य। ईसा का पूरा ध्यान पिता की इच्छा पूरी करने में ही था। ईसा ने कई बार यह बात व्यक्त की है। ईसा समारी स्त्री को संजीवन जल की ओर ले चले। उस समय जब षिश्य रोटी लेकर ईसा के पास आये तब उन्होंने उन से कहा: “जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है” (योहन 4: 34)। पिता की इच्छा पूरी करने के लिए ही वे इस संसार में आये (इब्रानि 10: 9)। ईसा कहते हैं कि जो पिता की इच्छा पूरी करते हैं वे ही स्वर्गराज्य में प्रवेष करेंगे (मत्ती 7: 21)। ”तुम सब से पहले ईष्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीज़्ों तुम्हें यों ही मिल जायेंगी” (मत्ती 6: 33)।

     

    हम करें 1

    उन सुसमाचार भागों को ढूँढ कर लिखिए जो यह व्यक्त करते हैं कि ईसा पिता की इच्छा की पूर्ति करने में तत्पर थे।

     

    घोषणा एवं साक्ष्य

     

              ख्रीस्तीय जीवन के द्वारा दिये जाने वाले साक्ष्य ही सुसमाचार की घोशणा में सबसे महत्वपूर्ण तरीका है। कलीसिया यह सिखाती है कि सुसमाचार की घोशणा साकार करने में ख्रीस्तीयों का जीवन-साक्ष्य अनिवार्य है। “ईसाई लोग जहाँ भी हांे उनके आदर्ष जीवन एवं पवित्र वचनांे के द्वारा दूसरे लोगों को पिता ईष्वर की महिमा गाने की प्रेरणा मिलनी चाहिए” ; (AG11)। कलीसिया यह सिखाती है कि ईसाइयों को  ज्ञानस्नान, तैलाभिशेक, पवित्र बलिदान आदि संस्कारों के सच्चे फल उत्पन्न करने वाले एवं दूसरों के साथ आपसी प्रेम और आदर से व्यवहार करने वाले भी होना चाहिए ;(AG11)।

               समूह की भलाई के लिए स्वार्थता छोड़कर आपसी सहयोग से काम करने से तथा दूसरों की उन्नति के लिए अपना तन, मन, धन बाँटने के लिए तैयार होने से हम स्वर्गराज्य के साक्षी बनते हैं। अपनी ज़िम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना तथा षत्रुओं को प्यार करना - ये दोनों सबसे प्रभावषाली एवं फलदायक सुसमाचार की घोशणा हैं।

              गरीबों की माँ कोलकत्ता की धन्य मदर तेरेसा, धन्य तेवरपरम्पिल कंुजच्चन, जिन्होंने गरीबों एवं निम्न जाति के लोगों के बीच साहस के साथ सुसमाचार की घोशणा की और धन्य मरियम त्रेस्या जो पारिवारिक प्रेरिताई का उत्तम नमूना हैं - इन लोगों ने अपने जीवन के साक्ष्य द्वारा सुसमाचार की घोशणा की है। विष्वास जीवन में एक व्यक्ति का अनुभव दूसरे व्यक्ति को प्रदान करना ही सबसे सरल एवं फलदायक सुसमाचार की घोशणा है।

    हम करं - 2

              स्वर्गराज्य के साक्षी बनने के लिए आपको जो अवसर मिलते हैं उन्हें आपस में विचार-विमर्ष करके ढूँढ निकालिए तथा उनकी एक सारणी तैयार कीजिए।

     

    सुसमाचार की घोषणा एवं कलीसिया का गठन

     

                 कलीसिया के गठन का सबसे पहला कदम सुसमाचार की घोशणा है। कलीसिया को रोपने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है मसीह के सुसमाचार की घोशणा (।ळ 6द्ध। पष्चाताप या मनपरिवर्तन के लिए सुसमाचार की घोशणा की आवष्यकता ईसा स्पश्ट रूप से सिखाते हैं (लूकस 24: 47)। गैर ईसाइयों को मसीह के बारे में घोशणा करना यहाँ का मुख्य उद्देष्य है। ईसा ही इस घोशणा का खास विशय हैं। प्रेरित-चरित ग्रन्थ यह स्पश्ट करता है कि प्रेरितों ने उस मुक्ति के सुसमाचार की ही घोशणा की थी जो ईसा द्वारा संपन्न किया गया है।

                   सुसमाचार की मौखिक घोशणा हर काल में अनिवार्य है। संत पौलुस कहते हैं: “परन्तु यदि लोगों को उस में विष्वास नहीं, तो उसकी दुहाई कैसे दे सकते हैं ? यदि कोई प्रचारक न हो, तो वे उसके विशय में कैसे सुन सकते हैं?... इस प्रकार हम देखते हैं कि सुनने से विष्वास उत्पन्न होता है और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है” (रोमि 10: 14-17)। ‘‘मुझे ईष्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना है’’ (लूकस 4: 43), मसीह का यह वचन कलीसिया भी अपनाती है । संत पौलुस कहते हंै -‘‘सुसमाचार की घोशणा मेरा कर्तव्य है। धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ’’(1कुरिन्थि 9: 16)। संत पौलुस का यह धर्मोत्साह कलीसिया में भी बना रहता है । ईसा ने सार्वत्रिक स्वभाव के एक ऐसे समूह की कल्पना की जो संसार के सीमान्तों तक फैले तथा संसार के अंत तक बना रहे। सुसमाचार की षिक्षा प्रदान करते समय कलीसिया इस बात पर ध्यान देती है कि उसको इस तरीके से और भाशा में पेष करे कि प्रत्येक इलाके के लोग उसको समझ सकें और अपनी ही भाशा में उसकी घोशणा करें।

                 केवल मनुश्य के सांसारिक उन्नति एवं समृद्धि ही कलीसिया का मक़सद नहीं है; बल्कि विष्वास एवं धार्मिकता के संबन्ध में ईसा की षिक्षा सिखाना, मानव के महत्व एवं भाईचारे को बढ़ावा देना और धीरे धीरे मानव जाति को ईष्वर की ओर ले जाने का मार्ग बन जाना, उसका मक़सद है। इस प्रकार ईष्वर और पड़ोसियों के प्रति पे्रम के द्वारा मुक्ति प्राप्त करने के लिए कलीसिया मानव जाति की मद्द करती है।

                   जो सुसमाचार की घोशणा के फलस्वरूप उत्पन्न हुई है, जिसे सुसमाचार की घोशणा का दौत्य प्राप्त है, उस कलीसिया की संतानें हैं हम। ज्ञानस्नान, तैलाभिशेक तथा पवित्र बलिदान के द्वारा हम भी कलीसिया के सुसमाचार की घोशणा के दौत्य में भागीदार बनाये गये हैं। इसलिए हम अपने जीवन साक्ष्य के द्वारा तथा दूसरों को ईष्वर का वचन बाँटते हुए अपना दौत्य निभायें।

     

    ईश  वचन पढ़ें और मनन करें

    मारकुस 16: 14-17

     

    कंठस्थ करें

    “संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृश्टि को सुसमाचार सुनाओ” (मारकुस 16: 15)।

     

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रभु ईसा, हमारे कार्य-क्षेत्रों में आपके साक्षी बन कर जीने की कृपा हमें प्रदान कीजिये।

     

    मेरा निर्णय               

        जिस स्कूल में मैं पढ़ रहा/रही हूँ वहाँ सुसमाचार के सन्देषों का प्रचार करने का प्रयास करूँगा/गी।

     

    कलीसिया के साथ विचार करें               

                    ईष्वरीय योजना के अनुसार ईसा सारी दुनिया की मुक्ति का केन्द्र नियुक्त है; उसकी सफलतापूर्ण पूर्ति में सहयोग देने के लिए पवित्रात्मा कलीसिया को प्रेरित करता रहता है। इस लिए विष्वास स्वीकार करने एवं सुसमाचार की घोशणा करने के लिए कलीसिया अपने श्रोताओं को आमन्त्रित करती है (पवित्र कलीसिया  LG 17)।