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                   ‘‘तब मैं ने एक नया आकाष और एक नयी पृथ्वी देखी। पुराना आकाष तथा पुरानी पृथ्वी, दोनों लुप्त हो गये थे और समुद्र भी नहीं रह गया था। मैं ने पवित्र नगर, नवीन येरुसालेम को ईष्वर के यहाँ से आकाष में उतरते देखा। वह अपने दुलहे के लिए सजायी हुई दुल्हन की तरह अलंकृत था। तब मुझे सिंहासन से एक गम्भीर वाणी यह कहते सुनाई पड़ी, ‘‘देखो, यह है मनुश्यों के बीच ईष्वर का निवास ! वह उनके बीच निवास करेगा। वे उसकी प्रजा होंगे और ईष्वर स्वयं उनके बीच रह कर उनका अपना ईष्वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा। इसके बाद न मृत्यु रहेगी, न षोक, न विलाप और न दुःख; क्योंकि पुरानी बातें बीत चुकी हैं’’ (प्रकाषना-ग्रन्थ 21: 1-4)।
     
                विष्व जनसंख्या का अधिकांष लोग ऐसे हैं जो षांति और आनंद से परिपूरित एक नये विष्व का, निर्माण करना चाहते और उसके लिए प्रार्थना करते हैं। मगर एक ऐसे विष्व का निर्माण हो रहा है जो राश्ट्रों के बीच बढ़ती आ रही प्रतिस्पर्धा, अनैक्य, युद्ध एवं आतंक के कारण अषांत है। ईष्वर को अलग रखते हुए जो भी कार्य किया जाए, उससे षांति हासिल नहीं होगी। इस अषांत संसार में षांतिदाता ईसा को प्रदान करते हुए एक नये युग का निर्माण करना ईसाई लोगों का कर्तव्य है। क्योंकि ”उन्हें जो मुक्ति का सन्देष प्राप्त हुआ है, वह समस्त विष्व के लिए है” (कलीसिया आधुनिक युग में GS1)

     

     

    रीस्तीय संगठनों की प्रासंगिकता 

     
                   संघटित प्रेरितिक कार्य विष्वासियों की ख्रीस्तीय एवं मानवीय आवष्यकता है। वह मसीह के साथ कलीसिया की एकता को प्रकाषित करता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर जो कार्य करता है, उससे बहुत अधिक फल संघटित परिश्रम से प्राप्त होते हैं। केवल वही कार्य प्रेरिताई का समस्त लक्ष्य प्राप्त कर सकेगा और उसकी अभिरुचि का संरक्षण कर पायेगा जहाँ एक समूह की समस्त क्षमताएँ समन्वित हैं। मानव का महत्व एवं मूल्य बोध को बढ़ाने के लिए संघटित कार्य अनिवार्य है (AA 18)।
     
              जहाँ अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए मनुश्य कुछ भी करने में नहीं हिचकते हैं, ऐसे एक विष्व में मसीही को मूल्यों पर आधारित जीवन बिताने के लिये समर्थ होना चाहिए। सत्य, न्याय, प्रेम आदि मूल्यों के बिना विष्व में षांति स्थापित करना असंभव है। यदि इन मूल्यों को विष्व को प्रदान करना हो तो हम, मसीहियों, को इनका पालन करना होगा। इन मूल्यों का पालन करने के लिए आगामी पीढ़ी को भी प्रषिक्षण देना है। ”भविश्य के प्रेरित” को आध्यात्मिक एवं नैतिक तल पर विषेश षिक्षा प्राप्त होनी चाहिये; परिस्थिति के अनुरूप अगुआई करने की तत्परता, जो कार्य प्रारंभ किया गया उसे पूरा करने की सहनषक्ति, मुसीबतों में स्थिर रहने की दृढता तथा अकेलापन, थकावट एवं पराजय आदि का सामना करने की धीरता उसमें होनी चाहिए (AG 25)।
     
    द्वितीय वैटिकन महासभा के इस प्रबोधन के अनुसार, कलीसिया की संतानों के प्रषिक्षण एवं साक्षी बनने में सहायक होने के लिए मसीही लोगों को बचपन से ही अनेक संघटनों के कार्यकलापों में भागीदारी दी जाती है। इन संघटनों में कुछ कलीसिया के सामान्य प्रेरितिक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कार्य करते हैं। अन्य कुछ संघटनों का लक्ष्य सुसमाचार का प्रचार एवं मानव पवित्रीकरण है। कुछ अन्य संघटनों का लक्ष्य है भौतिक विष्व में ख्रीस्तीय चेतना भरना। और  कुछ संघटन लोकोपकारी एवं परोपकारी कार्यों द्वारा ईसा का साक्ष्य देते हैं (AA 19)।
     

    हम करें 

    आप की पैरिष के संघटनों के नाम बताइए। जिस में आप सदस्य हैं उस संघटन की कर्मषैली के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए ।

     

    पवित्र बालकपन मंडली (Holy Childhood)

     
                  पवित्र बालकपन मंडली का लक्ष्य है- ईसा में बच्चों का मनोविकास। ‘बच्चे बच्चों की सहायता करें‘: इस कहावत को स्वीकार करते हुए समस्त काथलिक कलीसिया की प्रेरितिक कार्यों में पवित्र बालकपन मंडली के सदस्य भाग लेते हैं। मुख्यतः प्रार्थना एवं चन्दा द्वारा वे इस दौत्य में भाग लेते हैं। प्रत्येक इकाई के सदस्य एकत्र हो कर प्रार्थना करने, पवित्र वचन पढ़ने एवं पवित्र बलिदान में भाग लेने का ध्यान रखते हैं। छोटी कहानियों एवं गीतों द्वारा बच्चों को नैतिक मूल्य प्रदान करते हुए बालक ईसा के समान ईष्वर और मनुश्यों के अनुग्रह में बढ़ाने में पवित्र बालकपन मंडली सहायता करती है।

     

    चेरुपुश्पा मिषन लीग (Little Flower Mission League) 

     
                       सन् 1947 में मिषन की सहायता करने के उद्देष से सात सदस्य मिल कर इस का आरंभ केरल के भरनंगानम (संत अलफोन्सा की जगह) में हुआ। ईसा ने अपने षिश्यों से कहाः ”तुम संसार के कोने कोने में जा कर सारी सृश्टि को सुसमाचार सुनाओ”। इस दौत्य को कार्यान्वित करते हुए मिषन लीग निम्न लिखित बातों पर ध्यान देता हैः व्यक्तियों, परिवारों, पैरिषों एवं संस्थाओं में प्रेरितिक चेतना बढाना, प्रार्थना, चन्दा, बुलाहट का प्रोत्साहन देना, संघटित रूप से प्रेरितिक कार्यों में मदद करना तथा बच्चों में £ीस्तीय व्यक्तित्व का रूप देना, आदि...। आगे चल कर इस की षाखाएँ केरल की सभी धर्मप्रान्तों, भारत के कुछ धर्मप्रान्तों, साथ ही साथ भारत से बाहर भी फैला गयीं। मिषन लीग का नारा है- प्रेम, त्याग, सहन, सेवा। बहुत से बालक-बालिकाओं, युवा-युवतियों ने इस में सदस्य होकर, प्रभावित होकर, समर्पित जीवन अपनाया है। भारत के अनेक स्थानों पर मिषनरी पुरोहित, सिस्टर गण, एवं धर्माध्यक्ष हैं जो इस के सदस्य रह चुके थे। आज मिषन लीग एषिया का सबसे बडा लोकधर्मी संगठन जाना जाता है। 

     

    सी.एल.सी. 

     
                       यह संघटन ‘मरियन सोडालिटी समूह‘ के  नाम से प्रारंभ हुआ। दूसरे वैटिकन महासभा के बाद कलीसिया और समाज की सेवा करने वाला अन्तर्राश्ट्रीय लोकधर्मी संघटन के रूप में ‘ख्रीस्तीय जीवन-समूह‘ (Christian Life Community) नाम से यह जाना जाता है। इसका लक्ष्य उत्तम ख्रीस्तीय समूहों का निर्माण करना है। समाज में ईष्वरानुभव, एकता एवं रक्षा का चिह्न बनने के लिए यह प्रयत्न करता है। सी.एल.सी. के सदस्य इन बातों पर ध्यान देते हैं: कुँवारी मरियम का अनुकरण करते हुए मसीह में केन्द्रित जीवन बिताना, स्वयं को पवित्र करना, दूसरों की मुक्ति के लिए उनकी सहायता करना और कलीसिया का विकास करना।

     

    मातृ-पितृ संगठन 

     
                     मातृ, पितृ संगठन के सदस्य परिवारों को, पवित्र करने के उद्देष्य से कार्य करते हैं। वे मातृ ज्योति, पितृवेदी आदि विविध नामों से जाने जाते हैं। माता-पिता यहाँ इस कार्य के लिए प्रषिक्षण प्राप्त करते हैं कि वे परिवारों में प्रेममय एवं प्रार्थनापूर्ण जीवन को बढ़ावा दें  और बच्चों को £ीस्तीय आदर्षों में बढने दें।

     

    विन्सेंट डी पाॅल 

     
               ‘निर्धनों के प्रेरित‘ संत विन्सेंट डी पाॅल के नाम पर धन्य फ्रडरिक ओसानाम ने इस संगठन की स्थापना की। इस के सदस्य मुख्य रूप से गरीबों की सहायता करते हैं। भोजन, कपड़ा, दवा, आवास आदि बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देते हुए वे पैरिषों में कार्यरत हैं। साप्ताहिक सम्मेलन में प्रार्थना और चर्चा के साथ साथ गुप्त रूप से चन्दा इकट्ठे करते हैं। जरूरत पडने पर वे दानी लोगों से माँगते भी हैं।
     
                लीजियन आॅफ मेरी, फ्रांसिस्कन लोकधर्मी संगठनों, जेल मिनिस्ट्री आदि धार्मिक तथा परोपकारी संगठन द्वारा कलीसिया की सेतानें अपने जीवन और कर्मों के जरिये मसीह का करूणामय प्रेम संसार में प्रकट करती हैं। 
     

    हम करें 2 

    आप के पैरिष के परिवार मिलन सभा के कार्यों के बारे में, उसकी गतिविधियों के आधार पर, एक चार्ट तैयार कीजिए।

     

    परिवार मिलन सभा 

     
                संगठनों के समान पैरिषों के विकास एवं ओजस्विता के लिए परिवार मिलन सभा सहायक है। एक पैरिष के अड़ोस-पड़ोस के भवनों को मिला कर परिवार मिलन सभा को रूप दिया जाता है। आदिम ख्रीस्तीय समूह के समान वे एक साथ प्रार्थना करते, पवित्र वचन पढ़ते हुए, प्रेम में बढ़ते हैं। परिवार मिलन सभा का प्रत्येक सदस्य उस समूह के अन्य व्यक्तियों एवं परिवारों के सुख-दुःख में भाग ले कर एक दूसरे का प्रोत्साहन करता और सांत्वना भी देता है। महीने में एक बार एक एक घर में एकत्र हो कर प्रार्थना करते और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हुए वे एकता का अनुभव करते हैं।
     
                कलीसिया की संतानों का कर्तव्य है कि वे उन संगठनों से जुड कर कार्य करें और प्रषिक्षण प्राप्त करंे और अच्छे फल उत्पन्न करें जिनकी स्थापना माता कलीसिया ने  अपनी संतानों की भलाई और विकास के लिए की है। दूसरी वैटिकन महासभा सिखाती है कि  प्रेरिताई कार्यों में लोग रहते रहे समस्त संगठनों का योग्यतानुसार सम्मान किया जाना तथा पुरोहितों, सन्यासियों एवं लोकधर्मियों को उनका प्रोत्साहन करना चाहिये (लोकधर्मी प्रेरिताई 21)।
     
               इन संगठनों एवं मिलन सभाओं का लक्ष्य कलीसिया को (जो मसीह का षरीर है) पोशित एवं पवित्र करना है। उसके द्वारा कलीसिया का प्रेरितिक कार्य अधिक सजीव एवं फलदायक हो जाएगा। पैरिष, जो कलीसिया के आधारभूत घटक है एवं स्थानीय कलीसिया (धर्मप्रान्त) से मिल कर, कार्य करने से यह फलदायक हो जाता है। कलीसिया के विविध संगठनों एवं गतिविधियों द्वारा विष्वास के जीवन में अग्रसर होकर साक्ष्य देने के लिए कलीसिया की संतानें सक्षम हो जाती हैं। इस संसार में अपनी उपस्थिति द्वारा वे संसार को पवित्र करने, जीवन के अनुभवों को ईष्वर का हित मानने और उनका सामना करने के लिए प्राप्त बन जाते हैं। इन संगठनों एवं गतिविधियों को यह लक्ष्य सामने रखते हुए कलीसिया के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए। उन्हें इस बात पर ध्यान देना होगा कि वे उस प्रतिस्पर्धा और साम्प्रदायिकताओं से दूर रहें जो इस लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग पर अड़चन बनती हैं (लोकधर्मी प्रेरिताई 23)।
     
               हमारे विकास एवं दुनिया की भलाई के लिए कलीसिया इस प्रकार की जो सुविधाएँ प्रदान करती है उनका उपयोग करने एवं अपना सहयोग देने के लिए हम दिलचस्प रहें। तभी हम संसार का नवीनीकरण करने और उसे मुक्ति के मार्ग पर ले चलने की कलीसिया के दौत्य में भाग ले सकते हैं। इस प्रकार  हम माता कलीसिया के साथ एक नव युग की सृश्टि के लिए मिल कर  कदम बढ़ायें। 

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें 

    कलोसियों 3: 12-17
     

    कंठस्थ करें 

    ‘‘इस प्रकार आप प्रभु के योग्य जीवन बिता कर सब बातों में उसे प्रसन्न करेंगे, हर प्रकार के
    भले कार्य करते रहेंगे और ईष्वर के ज्ञान में बढ़ते जायेंगे’’ (कलोसियों 1: 10)।
     

    हम प्रार्थना करें 

    हे प्रभु ईसा, कलीसिया द्वारा आप हमें जो अवसर प्रदान करते हैं, उनका सही उपयोग करते हुए विष्व की भलाई के लिए प्रयास करने की षक्ति हमें दीजिये। 
     

    मेरा निर्णय 

    मैं पैरिष के संगठनों में सजीव रूप से भाग लूँगा/गी।
     

    कलीसिया के साथ विचार करें 

    प्रेरिताई कार्य के लिए जो संगठन हैं योग्यतानुसार अनका सम्मान करना है। देष एवं समय के अनुसार धर्मतन्त्र कुछ संगठनों का प्रोत्साहन करते, उसकी सिफ़ारिष करते और उचित समझ कर तत्काल स्थापित करने का निर्णय लेते हैं। उन संगठनों को पुरोहित, सन्यासी एवं लोकधर्मी गण उचित समझें और अपनी क्षमता के अनुसार उनका प्रोत्साहन करें (AA  21)।