•              

                राजा हेरोद मसीही विष्वासियों पर अत्याचार करने लगा। योहन के भाई याकूब को उसने तलवार के घाट उतार दिया। यह जान कर कि इससे यहूदी प्रसन्न हुए, उसने पेत्रुस को भी बन्दी बनाकर कारागृह में डाल दिया और उसे चार-चार सैनिकों के चार दलों के पहरे में रख दिया।  पास्का पर्व के बाद राजा उन्हें लोगों के सामने पेष करना चाहता था। सारी कलीसिया उनके लिए आग्रह के साथ ईष्वर से प्रार्थना करती रही (प्रेरित-चरित 12: 1-5)।

                येरूसालेम, यूदा और समीप के प्रान्तों में ही, जो ईसा और षिश्यों के अपने क्षेत्र थे, सबसे पहले सुसमाचार की घोशणा एवं स्वीकृति हुई थी। ये प्रांत उस समय रोमी साम्राज्य का हिस्सा था। ईसा के षिश्यों ने रोमी साम्राज्य के अन्य प्रान्तों में सुसमाचार की घोशणा जारी रखी। प्रेरितों का उत्साह  अनेकों को ख्रीस्तीय विष्वास में लाया। मसीही धर्म अपनाने वालों के आदर्ष जीवन ने अनेकों को कलीसिया के सदस्य बनने की प्रेरणा दी। लेकिन यहूदी लोग सुसमाचार के प्रचार में बाधा डालते रहे। वे षासकों के सामने झूठे आरोप लगा कर प्रेरितों को सज़ा दिलवाने की चाल बनाते रहे। उनके साथ साथ अन्य धर्म के याजक एवं मूर्ति बनाने वाले सुनार भी मसीही विष्वास के विरुद्ध उठ खडे हो गये।

     

    प्रेरितों की षहादत:  (Martyrdom of the Aposties)

     

                प्रेरितों ने, पवित्रात्मा से परिपूर्ण होकर दुनिया के अलग-अलग स्थानों में जाकर सुसमाचार की घोशणा की। इस के फलस्वरूप बहुत से लोग ईसा मसीह को अपना मुक्तिदाता मान कर कलीसिया के सदस्य बने। इसके साथ-साथ प्रेरितों के विरुद्ध अनेक षत्रु भी उठ खडे़ हुए। ईसा ने पहले ही सचेत किया था, “यदि उन्होंने मुझे सताया, तो वे तुम्हें भी सतायेंगे” (योहन 15: 20) तथा “वह समय आ रहा है, जब तुम्हारी हत्या करने वाला यह समझेगा कि वह ईष्वर की सेवा कर रहा है“ (योहन 16: 2)। इस चेतावनी के मुताबिक कलीसिया को आरंभ से ही अत्याचारों का सामना करना पड़ा। प्रथम-षहीद स्तेफ़नुस की षहादत प्रेरित-चरित में हम पढ़ते हैं (प्रेरित-चरित 6: 8; 7: 60)।

                इतिहास इस बात की साक्षी है कि योहन को छोडकर अन्य सभी प्रेरित षहीद बन गये। इतिहासकार एऊसेबियुस प्रेरितों के सुसमाचार प्रचार की जगहों तथा उनकी षहादत के बारे में विवरण देता है। पवित्र ग्रन्थ में लिखा है कि योहन के भाई याकूब को राजा हेरोद ने तलवार से मारा (प्रेरित चरित 12: 2)। सम्राट नीरो के धर्म-विरोधी अत्याचार के समय रोम में प्रेरित पेत्रुस को, सिर नीचे करके, क्रूस पर मारा गया। प्रेरित थाॅमस मैलापुर के चिन्नमला (छोटा पहाड) में भाले का मार खाकर षहीद बने। प्रेरित अन्द्रेयस ने क्रूस पर की मृत्यु द्वारा ईसा को महिमान्वित किया। ईसवी 62 में अलफाई के पुत्र याकुब का वध येरूसालेम में हुआ।  सिमोन, बरथोलोमी, फ़िलिप, मत्ती, थद्देयुस, मथियस आदि प्रेरितों ने भी ईसा के लिए षहादत अपनायी। ईष्वर के सुसमाचार का प्रचार करने के कारण प्रेरित योहन को डोमीश्यन के धर्म विरोधी अत्याचार के समय पात्मोस नामक टापू में निर्वासित किया गया। इस के बाद वे वापस आकर एफेसुस मंे रहे तथा बुढा़पे में उनकी स्वाभाविक मृत्यु हुई - इतिहासकार एऊसेबियुस इसका साक्ष्य देता है। प्रेरित पौलुस को भी रोम में तलवार से मारा गया।

    हम करें - 1

                प्रेरित-चरित ग्रन्थ से स्तेफ़नुस की षहादत के विशय पर एक विवरण तैयार कीजिए।

     

    धर्म विरोधी अत्याचार के कारण

     

                पेंतेकोस्त के दिन से लेकर ईसवी 313 तक कलीसिया के लिए उत्पीडनों का समय था। विष्वास को सुरक्षित रखने तथा उस का प्रचार करने में आदिम ख्रीस्तीय समूहों को बहुत ही कठिनाइयाँ सहनी पडीं। ख्रीस्तीय विष्वास अपनाने के कारण अनेकों को अपना जीवन खोना पड़ा। यहूदी धर्म  छोड़कर अनेक लोग  ईसाई बने; इस से यहूदी उत्तेजित हो गए। गैर-यहूदियों का ईसाई बनना भी वे स्वीकार नहीं कर सके। इसलिए वे ईसाइयों को षत्रु समझते थे और किसी भी प्रकार से उनका सर्वनाष करने का उपाय ढूँढते थे।

                रोमी साम्राज्य में सम्राट को देवता मान कर उनकी पूजा करने की परम्परा कायम रहती थी। इसके लिए ईसाई तैयार नहीं थे। बल्कि उन्होंने एकमात्र सच्चे ईष्वर पर अपने विष्वास की घोशणा की। यह रोमी षासकों और नेताओं को अच्छा नहीं लगा। इतना ही नहीं, ईसाइयों की प्रार्थना सभा को भी वे ष्ंाका की दृश्टि से देखने लगे। ईसाइयों ने यह घोशणा की कि पवित्र बलिदान में वे ईसा के षरीर और रक्त ग्रहण करते हैं। यह घोशणा उन पर नर हत्या एवं नर भोजन का आरोप लगाने का कारण बना। वे ईसाइयों को असभ्य एवं अंधविष्वास से घिरे हुए लोगों के रूप में देखते थे। इसी प्रकार यहूदियों की घृणा, रोमी षासकों की षत्रुता एवं यूनानी-रोमी लेखकों का उपहास - ये सब एक जुट हो कर उभर आने पर सम्राटों को ईसाइयों पर अत्याचार करना आसान हो गया। रोमी सम्राटों द्वारा ईसाइयों पर किये गये दस धर्म विरोधी अत्याचारों का विवरण इतिहास में है।

     

    रोमी-सम्राट एवं उनके धर्म विरोधी-अत्याचार

     

                सम्राट नीरो के षासन काल से लेकर सम्राट डयोक्लीशन के समय तक ईसाइयों को कठिन से कठिन दस अत्याचारों का सामना करना पडा। सम्राट नीरो (54-68) ने ही ईसाइयों पर, उनके विष्वास के आधार पर, अत्याचार षुरू किया था। 64 ईसवी में रोमा षहर में जो आगजनी हुई, उसके पीछे ईसाइयों के हाथ हैं - यह कह कर उन पर अत्याचार का प्रारंभ हुआ। बहुत लोगों की हत्या की गयी। आग फैलने से तो ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ, फिर भी उसके नाम पर ईसाइयों की हत्या करने की आज्ञा सम्राट ने ही निकाली। अग्निकांड के पीछे सम्राट के लोगों के ही हाथ थे। सम्राट नीरो के षासन काल में ही संत पेत्रुस और पौलुस षहीद हुए।

                सम्राट डोमीश्यन (81-95) नीरो के बाद गद्दी पर आया । उसने भी नीरो की तरह ईसाईयों पर निर्दय बर्ताव किया। फ्लावियस क्लमन्स और उसकी पत्नी डोमिट्टील्ला भी, जो डोमीश्यन के रिष्तेदार थे, इसी समय षहीद बने। सम्राट ट्राजन (98-117) के षासन काल में अन्ताखिया के धर्माध्यक्ष इग्नेश्यस, रोम के दो धर्माध्यक्ष क्लेमेन्ट और तेलस्फोरस, येरूसालेम के धर्माध्यक्ष सिमोन आदि षहीद हुए। कलीसिया के परमाध्यक्ष संत हिजिनूस, पीयुस प्रथम एवं महान् पोलीकार्प की षहादत अन्टोनियूस पयस के षासन काल में (138-161)हुई। मारकस औरेलियुस (161-180) ईसाइयों की हत्या करता, उन्हें निर्वासित करता तथा उनसे जीवन भर कठिन काम करवाता था। लियोनस के फोत्तिनुस और जस्टिन उस के षासन काल में षहीद हुए थे।

                सेप्तमियस सेवेरियुस (193-211) ने उन लोगों पर अत्याचार किया जो बपतिस्मा ग्रहण कर चुके थे और उन पर भी जो बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए तैयारी करते थे। जिसने भी विष्वास त्याग दिया है उसे छोड़ दिया। माक्सिमिन ट्रास (235-238) कलीसिया के अधिकारियों की हत्या करने पर उतारू था। सम्राट मैक्सियन डेष्यस (249-251) ने रोमी देवता की आराधना कर के प्रमाण-पत्र पानेवालों को छोड़ देता था और जो आराधना करने से इनकार करते थे उन्हें मार डालता था। सम्राट वलेरियन (253-260) ने जो डेब्यस के बाद गद्दी पर आया था, धर्माध्यक्षों, याजकों और उपयाजकों को रोमी देवताओं की आराधना करने को बाध्य किया। सम्राट का विचार यह था कि यदि वे इस प्रकार आराधना करेंगे तो लोग भी इसके लिए तैयार हो जायेंगे। लेकिन अपने विष्वास को त्याग देने एवं रोमी देवताओं की आराधना करने के लिए उन में से कोई भी तैयार नहीं हुआ। इसलिए बहुत सारों को बुरी तरह से सताया गया और अनेकों की हत्या भी की गयी। सिप्रियान, संत पापा सिक्सटस द्वितीय, धर्मसेवक लोरन्स आदि इस काल में षहीद हुए।

                सम्राट डयोक्लीशन (284-305) ने सभी ईसाइयों को नौकरी से निकाल दिया, उन पर अत्याचार किया और उनके पवित्र ग्रन्थों और अन्य किताबों को नश्ट कर दिया। उसने प्रार्थनालयों को तोड डाला, कलीसिया के अधिकारियों को बन्दीगृह में डाल कर मानसिक एवं षारीरिक रूप से उन पर अत्याचार किया। संत आगनस, संत सेबास्ट्यन, संत फेलिक्स आदि अनेक लोग इस सम्राट के षासन काल में षहीद हुए।

                सन् 313 ईसवी में सम्राट कोणस्टेन्टाइन की  ’मिलान घोशणा‘ के साथ कलीसिया आज़ाद हो गयी। किन्तु उस के बाद भी कलीसिया में अनेकों ने विष्वास के प्रति षहादत अपनायी है।

     

    हम करें - 2

                उन आधुनिक षहीदों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए जिन के विशय में इस पाठ में चर्चा नहीं की गयी है।

     

    पूर्वी षहीद 

     

                तीसरी सदी के आरंभ से सम्राट साप्पोर फारस के ईसाइयों पर निश्ठूर अत्याचार करते थे। इसी कालावधि में संत कान्डिडा, सेलूश्या-स्तेसिफेन के धर्माध्यक्ष सिमोन बरसबे, उनकी बहिनें, राज महल के नौकर-पोसी, उनकी बेटी मरथा, संत मारूत्ता आदि अपने विष्वास के लिए षहीद हुए थे। इनके साथ-साथ धर्माध्यक्षों, याजकों, समर्पितों एवं हज़ारों विष्वासियों को अत्याचार सहना पड़ा और अंत में वे षहीद हुए। मध्य युग में इरान, जापान, कोरिया, वियट्नाम और चीन में अपने विष्वास अटल रखने हेतु अनेकों ने अपनी जान की कुर्बानी दी है।

     

    उत्तर कालीन षहीद

     

                16-वीं सदी में संत थाॅमस मूर, जो राजा हेनरी आठवें का सचिव था, ख्रीस्तीय विष्वास एवं कलीसिया की षिक्षाओं की खातिर षहीद हुए। राजा अपनी पत्नी कातरैन को त्याग कर उसकी दासी आनि बोलिन से षादी करना चाहता था। लेकिन इस का विरोध करने के कारण ही थाॅमस मूर को षहीद बनना पड़ा। संत थाॅमस मूर सांसारिक उपलब्धियों से बढ़कर स्वर्गीय सौभाग्य को अमूल्य मानते थे। उन्होंने यह कहते हुए षहादत अपनायी, “एक ही, अविभाज्य कलीसिया को विभाजित करने का अधिकार किसी भी राजनीतिक षक्ति का नहीं है”।

                ख्रीस्तीय प्रेम के प्रति याजक संत माक्सिमिल्यन कोलबे ने अपना जीवन अर्पित किया। दूसरे विष्व युद्ध के समय हिटलर के कारागृह से एक कैदी भाग गया। उस के बदले में दस कैदियों को चेम्बर में बन्द करके मार डालने की आज्ञा निकाली गयी। उन में से एक के बदले में माक्सिमिल्यन कोलबे अपनी जान देकर षहीद हुए।

     

     

    भारत के षहीद

     

                भारत की धरती पर जो लोग षहीद हुए हैं उनमें जाँन ब्रिटो और दैवसहायम पिल्ला विषेश स्मरण के योग्य हैं। संत जाॅण ब्रिटो का जन्म पुर्तुगाल के लिस्बन में हुआ था। वे ‘येसु समाज‘ धर्म संघ के याजक थे। भारत पहुँच कर उन्होंने मदुराई मिषन में ‘अरूलानंदर‘ नाम से प्रेरिताई कार्य किया। सुसमाचार की घोशणा करने तथा ईसाई धर्म का प्रचार करने के कारण 1693 फरवरी 4 को उनका सिर काटा गया। इस प्रकार वे षहीद हुए।

                नागरकोविल के पास ‘नाट्टलम‘ गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में दैवसहायम पिल्ला का जन्म हुआ। वे मारथाण्डवर्मा महाराजा के मन्त्री थे। डच्च कप्तान डलनोई के साथ उनके अच्छे संबंध से वे ईसाई बने। ख्रीस्तीय विष्वास स्वीकार करने के कारण राजा ने उन्हें बन्दी बनाया और 1752 जनवरी 14 को ‘काट्टाडी‘ पहाड़ी पर गोली मारकर उनकी हत्या की गयी। इस प्रकार के अनेक बहादुर षहीद भारत की कलीसिया में हैं। सिस्टर राणी मरिया, फादर अरूलदास आदि उन में कुछ हैं।

     

    षहीदों की बहादुरी

     

                षहीदों ने अत्याचार सहते समय जो विष्वास प्रकट किया एवं बहादुरी दिखाई वे अनिर्वचनीय थे। जब स्मिरना के धर्माध्यक्ष संत पोलिकार्प को मार डालने के लिए खड़ा कर दिया गया तब उनके और न्यायाधीश के बीच जो संवाद हुआ वह इसका प्रमाण है। न्यायाधीश ने कहा:- “ईसा को षाप दो मैं तुम्हें स्वतंत्र करूँंगा“। तब संत ने जवाब दिया “छियासी साल तक मैंने उनकी सेवा की। उन्होंने कभी भी मुझे नहीं त्यागा। मेरे उस मुक्तिदाता राजा को अभी मैं कैसे षाप दॅँू ? मैं षपथ खाकर घोशणा करता हूँ कि मैं एक ईसाई हूँ”। जब यह कह कर धमकाया कि अग्नि में भस्म कर दिया जायेगा, तब संत पोलीकार्प ने बतायाः “तुम लोग मुझे आग दिखाकर डराते हो। वह जल्दी नश्ट होने वाली अग्नि है। नित्याग्नि के बारे में तुम लोग क्या जानते हो ? वह तुम्हारे लिए है। आओ, मेरे साथ कुछ भी करो”। संत पोलीकार्प का षरीर अग्नि में जल कर भस्म होते समय विष्वासियों के हृदयों में विष्वास के प्रति अपनी जान की कुर्बानी देने तक का साहस  जाग गया।\

                 धर्म विरोधी अत्याचारों ने कलीसिया को दुर्बल नहीं बनाया बल्कि उसे और भी बढ़ाया। षहीदों के विष्वास की दृढ़ता एवं पीड़ाओं में उनकी बहादुरी देख कर अनेक लोग ख्रीस्तीय विष्वास की ओर आकर्शित हुए। उन पर अत्याचार करनेवालों ने भी खुद को ईसाई घोशित कर मृत्यु अपनायी। षहीदों के पवित्र लोहू से सनी हुई मिट्टी में कलीसिया  मजबूती में बढ़ती गयी।

                यद्यपि विष्वास को कायम रखने के लिए जीवन की कुर्बानी सदा ज़्ारूरी नहीं होगी, फिर भी ईसा के बताये गये प्रेम और क्षमा के मार्ग पर चलने के लिए त्याग और बहादुरी की आवष्यकता है। क्षमा षील पे्रम और निस्वार्थ सेवा के जो अवसर हमें मिलते हैं उन्हें त्याग के मनोभाव से स्वीकार करते हुए विष्वास जीवन में हम भी षहीदों की बहादुरी अर्जित करें।

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें

    मत्ती 10: 16-23

     

    कंठस्थ करें

                “जो मुझे मनुश्यों के सामने स्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने स्वीकार करूँगा” (मत्ती 10: 32)।

     

    हम प्रार्थना करें

                हे प्रभु ईसा मसीह, षहीदों ने सत्य विष्वास के प्रति अपनी जान की कुर्बानी दी; उन के जीवन का नमूना अपनाने की षक्ति हमें भी प्रदान कीजिये।

     

    मेरा निर्णय

                इस दुनिया में विष्वास को कायम रखने के लिए जो लोग अत्याचार सहते हैं उन के प्रति मैं अपनी दुःख तक्लीफें समर्पित करते हुए प्रार्थना करूँगा/गी।

     

    कलीसिया के साथ विचार करें

                ईसा मसीह के आत्मा से संचालित कलीसिया को उस रास्ते से चलना चाहिए जिस पर ईसा चले थे। यह है निर्धनता, आज्ञापालन, सेवा एवं मृत्यु तक के आत्मसमर्पण का मार्ग। इस मृत्यु पर ही मसीह पुनरूत्थान द्वारा विजयी हुए। मसीह ने जिस तरह अपने षरीर (कलीसिया) के लिए दुःख भोगा उसी तरह प्रेरितों ने अनेक दुःख-तक्लीफें झेलीं। कई बार ईसाइयों का रक्त कलीसिया का बीज बन चुका है ;।(AG 5)।