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                    संत पौलुस गलातिया के ईसाइयों को यह उपदेष देते हैं: ‘‘मुझे आष्चर्य होता है कि जिसने आप लोगों को मसीह के अनुग्रह द्वारा बुलाया, उसे आप इतना षीघ्र त्याग कर एक दूसरे सुसमाचार के अनुयायी बन गये हैं। दूसरा तो है ही नहीं, किंतु कुछ लोग आप में अषांति उत्पन्न करते और मसीह का सुसमाचार विकृत कर देना चाहते हैं। लेकिन जो सुसमाचार मैंने आप को सुनाया, यदि कोई - चाहे वह मैं स्वयं या कोई स्वर्गदूत ही क्यों न हो - उससे भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिषप्त हो! मैं जो कह चुका हँू वही दुहराता हूँ - जो सुसमाचार आप को मिला है, यदि कोई उससे भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिषप्त हो!” (गलाति 1: 6-9)।

                    विष्वास के स्रोत पवित्र ग्रन्थ एंव परम्परा हैं। इनकी व्याख्या करने एवं षिक्षा देने का अधिकार कलीसिया का है। माता कलीसिया की गोद में बैठकर ही हमें पवित्र वचन सीखना है। कलीसिया के प्रारम्भ से ही सच्चे विष्वास के विरुद्ध षिक्षा देने वाले विद्यमान थे। उनके सिद्धान्तों से विष्वासियों को दूर रखने तथा सही षिक्षा प्रदान करने में कलीसिया हमेषा ध्यान देती थी।

     

    विच्छेद एवं पाखण्ड

     

                    कलीसिया से एकता न रख कर उस से अलग रहने को विच्छेद कहलाता है। ऐसे सिद्धान्तों को पाखण्ड कहते हैं जो ख्रीस्तीय विष्वास के विरुद्ध हैं। पाखण्ड का आरंभ विष्वास संबन्धी बातों में भिन्नता के कारण हुआ। कलीसिया के विष्वास की षिक्षाओं का खंडन करके उसके विरूद्ध षिक्षा देना है पाखंड। मुख्य पाखंडों का आरंभ पवित्र-त्रित्व, पुत्र-ईष्वर एवं पवित्रात्मा से संबन्धित था। मोनार्कियनिसम, आर्यनिसम, अप्पोलिनारिसम, नेस्तोरियनिसम, एबियोणैट्टिसम, अडोप्शनिसम, मनिक्केयिसम, एकस्वभाव-वाद जैसे अनेक पाखडों का उदय कलीसिया के इतिहास में हुआ है। इन पाखंडों के बढ़ने से कलीसिया को समय≤ पर सच्चे विष्वास की परिभाशा देने की आवष्यकता उत्पन्न हुई।

                    मोनार्कियनिसम का सिद्धान्त है कि ईष्वर एक होने के कारण उसमें पिता, पुत्र और पवित्रात्मा, तीन व्यक्ति नहीं हैं। इसका मुख्य वक्ता सबेल्लियुस था जो तीसरी सदी में एषिया-मैनर में रहा था। ‘निख्या महासभा‘ यह पढ़़ाती है कि पवित्र-त्रित्व से संबन्धित यह पाखंड अस्वीकार्य है। चैथी सदी में ‘आर्यनिसम‘ पाखंड के कारण कलीसिया में बडी अषान्ति फैली। इसका मुख्य प्रचारक अलक्साण्ड्रिया का रहने वाला आरियुस नामक एक पुरोहित था। उसने सिखाया कि वचन रूपी ईष्वर-पुत्र वास्तव में ईष्वर नहीं है; दूसरे सृश्टियों की तरह षून्यता से उसकी सृश्टि हुई। 325 में निख्या महासभा ने आर्यानिसम का खंडन किया।

     

    हम करें - 1

                  अपने षिक्षक के साथ चर्चा कीजिए कि आज हमारे चारों ओर कलीसिया के सिद्धान्तों के विरुद्ध कौन-कौन सी गलत षिक्षाएँ विद्यमान हैं।

     

                    अप्पोलिनारिसम यह सिखाता है कि ईष्वरीय स्वभाव और मानव स्वभाव उसकी पूर्णता में एक ही व्यक्ति में होना असंभव है; पुत्र ने बिना आत्मा का मानव षरीर अपनाया था;  इस षरीर में ईष्वर के वचन ने आत्मा की तरह कार्य किया है। लौदिकिया के धर्माध्यक्ष रहे अप्पोलिनारिस था इस पाखंड का आरंभक। 362 में अलक्साण्ड्रिया में संपन्न धर्माध्यक्षों की स्थानीय धर्मसभा ने इन षिक्षाओं का, पाखंड के रूप में, खंडन किया। पहली कोण्स्टान्टिनोप्पिल महासभा ने इन समस्याओं पर अंतिम निर्णय सुनाया ।

                    नेस्तोरियनिसम, ईसा मसीह में विद्यमान ईष्वरीय स्वभाव और मानव स्वभाव की व्याख्या करते समय, यह सिखाता है कि इन दोनों स्वभावों के आधार पर ईसा में दो व्यक्ति  हैं। कोण्स्टान्टिनोप्पिल के धर्माध्यक्ष रहे नेस्तोरियस के नाम से यह सिद्धान्त जाना जाता है। 431 के एफेसूस महासभा ने इस सिद्धान्त को अस्वीकार किया।

     

    आधुनिक युग के अपसिद्धान्त

     

                    मार्टिन लूथर के नेतृत्व में हुए प्रोटेस्टेन्ट नवीकरण के बाद कैथलिक कलीसिया के विष्वास-सत्यों के विरुद्ध अनेक अपसिद्धान्तों का उदय हुआ। प्रोटेस्टेन्ट कलीसियायी विभागों में तथा पेंतेकोस्तीय समूहों में इस प्रकार के अपसिद्धान्त देख सकते हैं। पहली सदी के आर्यनिसम, मोनार्कियनिसम जैसे अपसिद्धान्तों का अलग रूप है यहोवेसाक्षी जो ईसा के ईष्वरत्व को नकारते हैं। 

                    समय≤ पर उभर आये इस प्रकार के पाखंडों ने विष्वास-सत्यों पर आधिकारिक षिक्षा देने के लिए कलीसिया को प्रेरणा दी। पहली सदी की महासभाओं का मुख्य उद्धेष्य अपसिद्धन्तों के विरुद्ध षिक्षा देने का था। सच्चे विष्वास को अविकल रखने तथा अपसिद्धान्तों के विरूद्ध षिक्षा देने के लिए अनेक संत एवं ज्ञानी धर्मगुरु आगे आये। इस प्रकार के अपसिद्धान्तों से दूर रहने तथा कैथलिक कलीसिया के विष्वास के अनुसार जीवन बिताने के लिए हमें सतर्क रहना चाहिए।

     

    प्रेरितिक धर्माचार्य ( Apostolic Fathers)

     

                    उन ख्रीस्तीय ग्रन्थकारों को प्रेरितिक धर्माचार्य कहते हैं जो पहली सदी और दूसरी सदी के पूर्वार्द्ध में जीवित रहते थे। प्रेरितों से या उनके अनुयायियों से इन लोगों का प्रत्यक्ष संबन्ध था। उन्होंने प्रेरितों की षिक्षा, बिना मिलावट के, ग्रहण की थी। इसी कारण वे प्रेरितिक धर्माचार्यों के नाम से जाने जाते हैं। इनकी कृतियों में आधा भाग चिट्ठियाँ और निबन्ध हैं, बाकी युक्तिमूलक सिद्धांत हैं। रोम के संत क्लेमेन्ट, संत बर्णाबस, संत इग्नेश्यस, संत पोलीकार्प, हीरापोलीस के पप्पियास - ये सब प्रेरितिक धर्माचार्यों की श्रेणी में आते हैं।

     

    धर्मसमर्थक ( Apologists)

     

                     धर्मसमर्थक वे लोग हैं जिन्होंने दूसरी सदी में ईसाई धर्म के खिलाफ उठे आरोपों और धमकियों के विरुद्ध विष्वास की सुरक्षा के लिए लिखा और कार्य किया। ईसाइयों पर अत्याचार करने वाले अधिकारी षासकों के सामने भी उन्होंने हिम्मत के साथ, सच्चे विष्वास की घोशणा की; बहुत सारे लोगों को विष्वास में दृढ़ बनाया। इनकी कृतियाँ ”धर्म समर्थन शास्त्र” के नाम से जानी जाती हैं। विष्वास के रहस्यों की व्याख्या करते हुए उनकी सुरक्षा करने के लिए लिखे गये ग्रन्थों एवं प्रामाणिक लेखों को धर्म-समर्थन-शास्त्र कहते हैं।

     

    हम करें - 2

                    विष्वास के अनुसार जीवन बिताने में आपको कौन-कौन सी बाधाएँ होती हैं ? उन पर किस प्रकार पिजयी हो सकते हैं ?  कक्षा में चर्चा कीजिए और उसकी रिपोर्ट तैयार कीजिए।

     

    कलीसिया के धर्माचार्य ( Fathers of the Church)

     

                    उन संतों को कलीसिया के धर्माचार्य कहते हैं जो पहली सात सदियों में जीवित रहे, जिन्हें कलीसिया ने आधिकारिक रूप से मान्यता दी है तथा जिन्होंने कलीसिया में आधिकारिक षिक्षा दी है। विष्वास की सुरक्षा करने में धर्माचार्यों ने महत्तम भूमिका निभायी है। संत अत्तनेश्यस, संत बेसिल, संत जाॅंन क्रिसोस्टोम, संत अगस्तीन, संत अप्रेम आदि धर्माचार्यों में प्रमुख हैं।

     

    संत अत्तनेश्यस  (295-373)

     
                         संत अत्तनेश्यस का जन्म सन् 295 में अलक्साण्ड्रिया में हुआ था। वे 328 में वहाँ के धर्माध्यक्ष बने। वे बडे धर्मविज्ञानी तथा धर्माचार्य थे। उन्होंने ‘आर्यनिसम‘ पाखंड का विरोध किया और ‘निख्या धर्मसार‘ की घोशणा की एवं उसे विष्वासियों को पढ़ाया। उन्होंने पवित्र ग्रन्थ की व्याख्याएँ तथा विष्वास की सुरक्षा संबन्धी एवं सैद्धान्तिक ग्रन्थों की रचना की। 373 में उनका स्वर्गवास हो गया।

    संत बेसिल (329-379)

        
                         स्त बेसिल का जन्म सन् 329 में एषिया मैनर के केसरिया में हुआ था। वे केसरिया के धर्माध्यक्ष थे। निख्या महासभा के सिद्धान्तों का प्रचार करने तथा आर्यनिसम एवं सेबल्यनिसम  का विरोध करने के लिए संत बेसिल ने कठिन परिश्रम किया। पूर्वी धर्मसंघों के पिता के नाम से वे जाने जाते हैं।

     

    संत  जाॅन  क्रिसोस्टोम  (344-407)

     

                    अन्ताखिया ( ।दजपवबी) के एक कुलीन परिवार में सन् 344 में संत जाॅन क्रिसोस्टोम का जन्म हुआ। 386 में वे याजक बन गये। एक अच्छा  वक्ता होने के कारण उनका मुख्य प्रेरिताई कार्य अपने प्रवचन के ज़्ारिए लोगों को षिक्षा देने का था। 397 में वे कोण्स्टान्टिनोप्पिल (Constantinople) के धर्माध्यक्ष बने। विष्वास के रहस्यों की, सरल रूप से, व्याख्या करने में वे निपुण थे। उन्होंने बहुत सारे ग्रंथ कलीसिया को प्रदान किये हैं। सन् 407 में पोन्तूस में संत जाॅंन क्रिसोस्टोम का देहान्त हुआ।

     

     

    संत अगस्तीन (354-430)

     
    संत अगस्तीन का जन्म अफ्रीका के ‘तगास्ते‘ में सन् 354 में हुआ था। उनके पिता, पट्रीश्यस, गैर-ईसाई थे। उनकी माँ मोनिक्का ईसाई थी। अगस्तीन जवानी के कई प्रलोभनों में पड़ गये; लेकिन माँ की निरन्तर प्रार्थना के फलस्वरूप उनका मन परिवर्तन हुआ। उन्होंने षेश जीवन ईष्वर की अविराम खोज में बिताया। वे पहले पुरोहित और बाद में धर्माध्यक्ष बने। उन्होंने बहुत सारे धार्मिक ग्रन्थों की रचना की है। उनमें “पापस्वीकार”, ( Confessions) और “ईष्वर का नगर” (City of God)  आत्मकथाएँ प्रमुख हैं।
     
     

    पूर्वी-सीरियायी धर्माचार्य

     

                    सीरियाई धर्माचार्यों के कार्यक्षेत्र वेही थे जो ईसा मसीह के प्रबोधनों एवं कर्मों के साक्षी बने। ईसा ने जिस अरमाया भाशा का प्रयोग किया, उस से उत्पन्न सीरियाई भाशा थी इनकी भाशा। अपसिद्धान्त प्रबल होने पर ईष्वरीय और धार्मिक कार्यों की, परम्परा के अनुसार, व्याख्या करते हुए सीरियायी-कलीसियाओं की श्रेश्ठता को ऊँचा दिखाने के लिए उन्होंने कोषिष की। पूजन-विधि को धन्य बनाने तथा सीरियाई कलीसिया में समर्पित जीवन को प्रत्याषा और उत्साह प्रदान करने के लिए वे हमेषा उत्सुक थे। तासियान, अफ्रातस, संत अप्रेम, सारूग के संत याकूब, निसिबिस के नर्साई आदि धर्माचार्यों में संत अप्रेम विषेश महत्व रखते हैं।

     

    संत अप्रेम (306-373)

     

                    सीरियायी धर्माचार्यों में सब से यषस्वी हैं संत अप्रेम। उनका जन्म सीरिया के निसिबिस में सन् 306 में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का आखिरी काल एदेस्सा में बिताया। पवित्र ग्रन्थ की पढ़ाई करने, लोगों को षिक्षा देने तथा ग्रन्थों की रचना करने में वे उत्सुक थे। सुन्दर काव्यों और कीर्तनों के ज़्ारिए ईष्वरीय सत्यों के गूढ़ रहस्यों को सरल रीति से वे प्रस्तुत करते थे । उनके अधिकांष कृतियाँ काव्य रूप में थीं। उन्होंने विष्वास के महत्वपूर्ण रहस्यों को सरल एवं सुन्दर काव्यों में रचा। वे ”पवित्रात्मा की वीणा” के नाम से जाने जाते हैं। एदेस्सा और निसिबिस, ये दोनों विद्यापीठ उनकी देख-रेख में विकसित हुए थे। इन दोनों विद्यापीठों ने पूर्वी-कलीसिया को, विषेशकर सीरियाई कलीसिया को, महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सन् 373 जून 9 तारीख को कलीसिया के प्यारे, ज्ञानी, संत अप्रेम की मृत्यु हुई।

     

                                    धर्माचार्य सत्यविष्वास के प्रति निश्ठवान थे; वे विष्वास के रहस्य दूसरी पीढ़ि़यों को सही रूप से प्रदान करने में दिलचस्प थे। हम भी, कलीसिया के सन्तानें, उनके आदर्षों के अनुसार विष्वास के प्रति निश्ठा पूर्वक जीवन बिताने की कोषिश करें।

    ईश वचन पढ़ें और मनन करें

    1 योहन 2: 18-27

     

    कंठस्थ करें

                    ”जो सुसमाचार मैंने आप को सुनाया, यदि कोई - चाहे वह मैं स्वयम् या कोई स्वर्गदूत ही क्यों न हो - उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिषप्त हो ! ”

    (गलाति 1: 8)।

     

    हम प्रार्थना करें

                    हे प्रभु ईसा मसीह, हमारी सहायता कीजिये कि हम गलत षिक्षाओं और सिद्धान्तों से वषीभूत होकर सच्चे विष्वास से भटक न जाएँ।

     

    मेरा निर्णय

                    जो विष्वास एंव नैतिकता के विरुद्ध हैं, ऐसी पत्रिकाओं को मैं नहीं पढूँगा/गी।

     

    कलीसीया के साथ विचार करें

                    मानव बन कर अवतरित वचन की वधू एवं पवित्रात्मा से पूरित पवित्र कलीसिया, पवित्र ग्रन्थों पर अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए कोषिष करने में हमेषा उत्सुक है। उसके द्वारा वह अपनी सन्तानों को ईष्वरीय वचन से निरंतर पोशित करना चाहती है। इसी कारण से  पष्चिमी और पूर्वी संत पिताओं की कृतियाँ और पवित्र पूजन-विधि को पढ़ कर समझने के लिए कलीसिया सबों को प्रोत्साहित करती है (DV 24)।