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                      मूसा भेड़ों को चराते-चराते होरेब पर्वत पहुँचे। वहाँ उसे एक झाड़ी के बीच में से निकलती हुई आग की लपट के रूप में प्रभु का दूत दिखाई दिया। उसने देखा कि झाड़ी में तो आग लगी है, किन्तु वह भस्म नहीं हो रही है। तब मूसा वह दृष्य देखने के लिये उसके निकट पहुँचे। झाड़ी के बीच में से ईष्वर ने उसे पुकाराः ‘‘मूसा, मूसा’’। मूसा ने उत्तर दिया, ‘‘प्रस्तुत हूँ’’। ईष्वर ने कहा, ‘‘पास मत आओ। पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि तुम जहाँ खड़े हो, वह पवित्र भूमि हैं’’ (निर्गमन 3: 1-5)।
     
                ईष्वर पवित्र है। ईष्वर की पवित्रता के बारे में पवित्र ग्रंथ में कई स्थानों पर चर्चा हुई है। चूँकि ईष्वर पवित्र है, इसलिए हमें भी, जो उनकी संतान हैं, पवित्र जीवन बिताना है। ‘‘मैं, प्रभु, तुम्हारा ईष्वर हूँ,  इसलिए अपने आप को पवित्र करो और पवित्र बने रहो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ। ... मैं वह प्रभु हूँ जो तुम्हें इसलिए मिस्र से निकाल लाया कि मैं तुम्हारा अपना ईष्वर बनूँ। पवित्र बनो क्योंकि मैं पवित्र हूँ’’ (लेबी ग्रंथ 11: 44-45)। अपनी चुनी हुई प्रजा इस्राएल को ईष्वर का दिया हुआ आह्वान है यह।

    हम करें 1

    आप की पसंद के एक संत की जीवनी पढ़ कर, उन के बारे में एक लघु विवरण  लिखिए।
     
     
               ज्ञानस्नान द्वारा ईष्वर की प्रजा बनी हुई कलीसिया की संतानों को भी, पवित्रता की ओर का बुलावा ही प्राप्त है। संत पौलुस के अनुसार समस्त मसीही सन्त बनने के लिए बुलाये गये हैं। वे कुरिन्थ की कलीसिया को इस प्रकार सम्बोधित करते हैं, ‘ईसा मसीह द्वारा पवित्र किये गये और संत बनने के लिए बुलाये गये‘ (1 कुरिन्थियों 1: 2; रोमियों 1: 7; एफेसियों 2: 19)। जो ज्ञानस्नान द्वारा कलीसिया के सदस्य बन गये हैं, वे सब संत हैं और संत बनने के लिये बुलाये गये हैं । अतः कलीसिया, जो विष्वासियों का समूह है, पवित्र है और पवित्रता की ओर बुलायी गयी है।

     

    पवित्रता का स्रोत एवं स्वभाव 

     
                     त्रियेक ईष्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा में जीवन बिताना है ख्रीस्तीय जीवन । ईष्वर पवित्र एवं पवित्रता का स्रोत है। प्रत्येक ईसाई, जिसने पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर ज्ञानस्नान ग्रहण किया है, उनकी पवित्रता में भाग लेता है। संत योहन साक्ष्य देते हैं कि ईष्वर प्रेम है (1 योहन 4: 8)। चूंकि ईष्वर प्रेम की पूर्णता है, इसलिये वह पवित्र है। ईष्वर प्रेम ही है और चाहता है कि हम, उसकी संतान, भी उसके समान पवित्र बनें। इसलिए सभी मनुश्यों को ईष्वर और भाई-बहनों को प्यार करते हुए पवित्रता की ओर, जो ईष्वरीय प्रेम और भ्रातृप्रेम की पूर्णता है, अग्रसर होना है।
     
                  परम पवित्र ईष्वर के समक्ष होते समय मनुश्य को अपनी बुराइयों और कमज़ोरियों का ध्यान आता है। यह बोध उस में ईष्वर के प्रति मुक्तिदातयक भय उत्पन्न करता है। पाप से दूर रहते हुए ईष्वर पर आश्रय ले कर पवित्रता प्राप्त करने के लिए यह भय उसे प्रेरणा देता है। जलती हुई झाड़ी के निकट पहुँचने पर मूसा को (निर्गमन 3: 1-3) और ईष्वर के दर्षन करने पर इसायाह को भी (इसायाह 6: 17) यही अनुभव प्राप्त हुआ था। इसलिए ईष्वर की पवित्रता के समक्ष मनुश्य को नम्र एवं पष्चात्तापी रहना चाहिए।
                 प्यार का उदात्त भाव है करुणा। ईष्वर की पवित्रता का सब से बड़ा महन्वपूर्ण गुण है उसकी करुणा। ईष्वर मनुश्य की भलाई या बुराई न देखते हुए उस पर अनुग्रह बरसाता है तथा भले और बुरे, दोनों पर सूर्य उगाता एवं धर्मी और अधर्मी, दोनों पर पानी बरसाता है। ईष्वर अपनी कृपा अपने श्रद्धालु भक्तों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बरसाता रहता है (लूकस 1: 50)। उनकी करुणा, जो उसने इब्राहीम, इसहाक और याकूब पर प्रकट की थी, प्रत्येक पापी पर आज भी प्रचुर मात्रा में बरसाता है (इसायाह 54: 7, लूकस 15: 1-2, 11-24)।

     

    ईसा के साथ होना

     
                      ईष्वर की पवित्रता का सब से अधिक अनुभव हमें ईसा में प्राप्त हुआ। पवित्र बनने का प्रथम उपाय ईसा के साथ होना है। जो पवित्र है, उसके साथ जुड़े रहने से ही हम भी पवित्र हो जाते हैं। जिस प्रकार जो डाली दाखलता में रहती है वह बहुत फल उत्पन्न करती है (योहन 15: 4) उसी प्रकार जो ईसा की संगति में रहता है उसका जीवन भी पवित्रता का फल उत्पन्न करता है।
     
                  जो ईसा की संगति में रहते हैं उन में यह ओजस्विता सदा प्रकट होती हैंः वे पैरिष की गतिविधियों में सजीव रूप से भाग लेंगे, प्रतिदिन पवित्र बलिदान में भाग लेने और अन्य सांस्कारों को स्वीकार करने में दिलचस्पी रखेंगे, मिलन सभा में तहे दिल से भाग लोंगे, प्रतिदिन पारिवारिक प्रार्थना में भाग लेंगे, परिवार के सदस्यों और मित्रों की सहायता करेंगे तथा दूसरों की आवष्यकताओं और सुख-दुःखों में भाग लेंगे। ‘खाते समय, सोते समय और काम में लगे रहते समय ईसा के साथ हैं‘ यही विचार संतों को पवित्रता में बढ़ने के लिए सहायक था। पवित्र वचन, संस्कारों एवं वचन पर आधारित धार्मिक जीवन द्वारा ही आज हम ईसा की संगति में रह सकते हैं।
     

    हम करें 2

    पवित्र बलिदान में भाग लेने से मैं पवित्रता में बढता /ती हूँ - चर्चा करके सन्देष व्यक्त कीजिए।
     

     

    प्रेम पवित्रता का मापदण्ड

     
                     ईसा की संगति में होने का तात्पर्य है- उनकी आज्ञाओं का पालन करना। उनकी आज्ञा है- प्रेम करना। इसलिए पवित्रता में बढ़ने के लिए हमें प्रेम का अभ्यास करना चाहिए। प्रेम ही है व्यक्ति की पवित्रता का मापदण्ड। प्रेम, जो परिपूर्णता का संबंध एवं आज्ञाओं की पूर्ति है, पवित्रता प्राप्त करने के समस्त मार्ग हमें दिखाता रहता, उन्हें संचेत बनाता और लक्ष्य की ओर ले चलता है। इसलिए वैटिकन महासभा सिखाती है कि ईसा के सही षिश्यों का पहचान ईष्वर के प्रति और दूसरों के प्रति प्रेम ही है (LG 42)।
     
                  इसा ने अपने आखिरी बूँद तक रक्त बहा कर हमें प्यार किया। उन्होंने सिखाया कि मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित करने से बड़ा प्रेम नहीं है (योहन 15: 13) तथा प्रभु ने अपने ही जीवन में वही कर दिखाया। सच्चा प्रेम वह है जो मित्रों के लिए कुछ भी तकलीफ उठाने को तैयार है। प्रेरित संत पौलुस भी हमें सिखाते हैं कि प्रेम ही सब से महान है (1 कुरिन्थि 13: 13)।
     
                जब हम अपनी क्षमताएँ, स्वास्थ्य, ज्ञान, समय और भलाई दूसरों के साथ बाँटने के लिए तैयार हो जाते हैं तब हम प्रेम एवं पवित्रता में आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार बाँटना षत्रु- मित्र के भेद बिना होना चाहिए। ईसा पूछते हैं, ‘‘यदि तुम उन्हीं से प्रेम करते हो जो तुम से प्रेम करते हैं, तो पुरस्कार का दावा कैसे कर सकते हो’’ (मत्ती 5: 46)। उन्होंने कहा, ‘‘अपने षत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो। जो तुम्हें षाप देते हैं, उन को आषीर्वाद दो, जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो’’ (लूकस 6: 27-28)। ख्रीस्तीय प्रेम तभी प्रकाष देता है जब बुराई के बदले बुराई नहीं, बल्कि भलाई करते हुए बुराई पर विजय पाते हैं।

     

    कलीसिया-माँ - पवित्रता में पालन पोशण करती 

     
                      कलीसिया ही, जो मसीह की निरन्तरता एवं संस्कार है, हमें पवित्र करती और प्रभु के वचन के जरिये हमारी अगुआई करती है। संस्कारों, वचन एवं मिलन सभाओं द्वारा आज  कलीसिया ही हमें पवित्रीकरण का अनुभव प्रदान करती है। कलीसियायी जीवन में हमारी भागीदारी जितना गहरी होती है, उतना ही ईसा द्वारा प्राप्त मुक्ति और पवित्रता हम अपना सकते हैं; संस्कारों, ईष्वर के वचन एवं मिलन सभा पर आधारित जीवन द्वारा पवित्रता में बढ कर स्वर्गीय आनन्द का अनुभव करने के लिए हम योग्य बन जाते हैं।

     

    पवित्रता-दैनिक जीवन में 

     
                ईष्वर की आज्ञाओं का पालन करते हुए ईष्वर के इच्छानुसार जीवन बिताने से हम दैनिक जीवन में पवित्रता हासिल करते हैं। ईष्वर के वचन, कलीसिया और समाज के नियमों तथा माता-पिताओं, गुरुजनों एवं कलीसिया के अधिकारियों के निर्देषों द्वारा ईष्वर की इच्छा प्रकट हो जाती है। दैनिक जीवन में भलाई करने के लिए अंतरात्मा की प्रेरणाओं और सुख-दुःखों के अनुभवों द्वारा ईष्वर की इच्छा प्रकट हो जाती है। यदि हम प्रेम एवं आदर से ईष्वर की इस इच्छा के अधीन हो जाते हैं, तो यह कह सकते हैं कि हम ईष्वर को प्यार करते हैं। जब हम माता-पिताओं, अध्यापकों एवं अधिकारियों के आदेषों का पालन करते हैं, उनका आदर करते हैं तथा नियमों और षिश्टाचारों का पालन करते हैं, तब हम ईष्वर की इच्छा का पालन करते हुए  ईष्वर को प्यार करते हैं और पवित्रता में बढ़ते हैं।
     
                 ईष्वर के प्रति प्रेम की कसौटी है भ्रातृप्रेम। ईष्वर के प्रति प्रेम जितना गहरा होता है उतना ही हम दूसरों को प्रेम कर सकते हैं। संत योहन साक्ष्य देते हैंः ”यदि कोई अपने भाई को, जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता, तो वह ईष्वर को, जिसे उसने कभी देखा नहीं, प्यार नहीं कर सकता” (1 योहन 4: 20)।
     
               हम दूसरों की आवष्यकताओं में उनकी सहायता करते हुए, दुःखों में सांत्वना देते हुए, आनन्द में भाग लेने हुए, बीमारी की हालत में उन से मुलाकात कर के सांत्वना प्रदान करते हुए, विजय में प्रोत्साहन देते हुए तथा पराजय में दिलासा और आषा प्रदान करते हुए भ्रातृप्रेम प्रकट कर सकते हैं। जब हम दूसरों की भलाई चाहते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं, बिछुडे हुए लोगों के बीच मेलमिलाप स्थापित करते हैं, अपने अपराधियों को क्षमा करते हैं एवं बुराई के बदले भलाई करते हैं, तब संसार जान जाएगा कि हम पवित्रता में बढे चढे मसीही षिश्य हैं। ‘‘प्रिय भाइयो, हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईष्वर से उत्पन्न होता है। जो प्यार करता है, वह ईष्वर की संतान है और ईष्वर को जानता है’’ (1 योहन 4: 7-8)।
     
               सब से बड़ा प्रेरितिक कार्य पवित्र जीवन द्वारा साक्ष्य है। प्रेरितिक कार्य का तात्पर्य हैः ईसा मसीह का अनुभव करने में सहारा बनना, सभी क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति एवं कार्य पहुँचाना। सुसमाचार के अनुसार जीवन बिता कर आस-पास के लोगों को विष्वास का प्रकाष प्रदान करते हुए हम भी पवित्रता के प्रेरित बनें। 

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें 

    (इसायाह 6: 1-6)
     

    कंठस्थ करें

    ‘‘ईष्वर की इच्छा यह है कि आप लोग पवित्र बनें’’ (1 थसलनीकियों 4: 3)।
     

    हम प्रार्थना करें 

    हे प्यार भरे ईसा, सदा आपकी संगति में रह कर पवित्रता में बढ़ने में हमारी सहायता कीजिये।
     

    मेरा निर्णय 

    अपने मित्रों की आवष्यकताओं में उनकी सहायता करते हुए मैं ईसा के प्रेम का साक्ष्य देने का प्रयास करूँगा/गी।
     

    कलीसिया के साथ विचार करें 

    कलीसिया की पवित्रता विष्वासियों पर पवित्र आत्मा द्वारा बरसाये जाते कृपादानों के फलों के जरिये योग्यतानुसार प्रकाषित होती है, प्रकाषित होनी भी चाहिए। जो अपनी बुलाहट के अनुसार प्रेम की पूर्णता की ओर बढ़ते हैं और उसके द्वारा दूसरों को पवित्रता में बढ़ने की सहायता करते हैं उन लोगों के जरिये यह पवित्रता विविध रूप में प्रकाषित होती है (पवित्र कलीसिया 39)।