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                     एली इस्राएल का पुरोहित थे। बालक समूएल एली की उपस्थिति में प्रभु की सेवा करता था। एक दिन प्रभु ने समूएल को बुलाया जो प्रभु की मंजूशा के पास सो रहा थाः ‘‘समूएल, समूएल’’। समूएल ने यह सोचते हुए कि एली बुला रहे हैं, उत्तर दिया, ‘‘मैं प्रस्तुत हूँ’’। एली के पास दौड़ते हुए पहुँचने पर समूएल को मालुम हुआ कि एली ने नहीं बुलाया। इस प्रकार तीन बार होने पर एली ने एमूएल से कहा, ’’जा कर सो जाओ, यदि तुम को फिर बुलाया जाएगा तो यह कहना: ”प्रभु बोल, तेरा सेवक सुन रहा है’’। समूएल जा कर अपनी जगह लेट गया। तब पुनः यह पुकार सुनी गयी: ”समूएल, समूएल ”। जैसे एली ने निर्देष दिया था उसने उत्तर दिया। तब प्रभु ने उससे बात की। समूएल प्रभु की बुलाहट स्वीकार कर उनके नबी बन गये। पवित्र ग्रंथ में षुरू ले कर अंत तक हम अनेक व्यक्तियों को देखते हैं जिन्होंने ईष्वर के प्रेमपूर्ण बुलावा स्वीकार कर उसका उत्तर दिया। प्रत्येक मसीही इसलिए बुलाया जाता है कि वह मसीह में सम्पूर्ण एवं संपुश्ट जीवन बिताते हुए ईष्वर के बुलावे का उत्तर दे। जो यह बुलावा अपने जीवन में विषेश रूप से चरितार्थ करते हैं वे हैं समर्पित लोग। 

     

    कलीसिया में समर्पित जीवन 

     
                      तीसरी सदी में मसीही धर्म में सन्यास ने जड़ पकड़ी। ख्रीस्तीय सन्यास का पालना मिस्र देष है। मिस्र के संत एन्थनी ‘एकान्त जीवन के सन्यास‘ का पिता जाने जाते हैं। मिस्र के संत पक्कोमियुस ने (290-346) पहली बार एक आश्रम की स्थापना की जहाँ अनेक सन्यासी लोग एकसाथ रह सकते हैं। संत बेनेडिक्ट ने इटली में, डूर्स के संत मार्टिन ने फ्रांस में और संत पाट्रिक ने ऐरलैन्ड में सन्यास आश्रमों की स्थापना की। इसके बाद यूरोप के अनेक देषों में सन्यास आश्रमों की स्थापना हुई।

    हम करें 1

    किसी भी एक धर्म संघ की जीवन-चर्या एवं उनके कार्यकलाप के बारे में अध्ययन कर, एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
     
     
                 भारत में प्रारंभ से ही ख्रीस्तीय सन्यास जीवन बिताने वाले थे। मगर जब एक संगठित सन्यास समूह का अ्रारंभ तब हुआ, जब 11 मई 1831 को आदरणीय फादर पालय्कल थाॅमस, फादर पोरूक्करा थाॅमस एवं धन्य फादर चावरा कुरियाक्कोस ने मिल कर केरल के मान्नानम में ‘अमलोद्भव दास संघ’ सन्यास समूह की स्थापना की। आज यह समूह ”कार्मलैट्स आॅफ मेरी इमाॅक्युलेट” (सी.एम.आई.) नाम से जाना जाता है। 13 फरवरी 1866 को धन्य फादर चावरा कुरियाक्कोस और माननीय फादर लेयोपोलद बोक्कारो ने मिल कर महिलाओं के लिए भारत में प्रथम  सन्यासिनी समूह की स्थापना की जिसका नाम है काॅनग्रिगेषन आॅफ दि मदर आॅफ कार्मल (सी.एम.सी)। इसके पष्चात् समय एवं काल की ज़रूरत के अनुसार पवित्र आत्मा की प्रेरणा से भारत में अनेक सन्यास समूहों की स्थापना हुई।

     

    समर्पित जीवन का सार

     
                   कलीसिया के जीवन, पवित्रता एवं दौत्य का भाग है समर्पित जीवन (VC 3)। ख्रीस्तीय बुलावे का आन्तरिक स्वभाव प्रकट करते हुए कलीसिया के दौत्य के निर्णायक घटक के रूप में सन्यास कायम रहता है। समर्पित जीवन वह जीवन-चर्या है जिसके द्वारा  ईष्वर और भाई-बहनों के प्रति अपने को सदा के लिये समर्पित करते हैं। वे सुसमाचार के सन्देष के आधार पर अपने जीवन में आज्ञापालन, ब्रह्मचर्य एवं निर्धनता के तीन व्रतों का पालन करते हैं। 
     
              मसीह और उन में मानव परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति प्रेम से प्रेरित हो कर जो मौलिक आत्मदान होता है, उसमें समर्पित जीवन का सार निहित है (VC 3)। सुसमाचार के आधार पर जीवन का जो समर्पण होता है, उस से यह आत्मदान प्रकट होता है। इस परम स्नेहार्पण द्वारा समर्पित लोग सम्पूर्ण रूप से ईष्वर के सामने आत्मार्पण करते हैं और इस प्रकार ईष्वर के महत्व एवं षुश्रूशा के लिए विषेश रूप से प्रतिश्ठित हो जाते हैं। मसीह और उनकी दुलहन, कलीसिया के बीच के अभेद्य संबन्ध को यह प्रतिश्ठा सूचित करती है (LG 44)।

     व्रत 

     
                  व्रत एक ‘प्रेम का करार‘ है जिसे एक व्यक्ति ईष्वर के साथ करता है और ईष्वर उस व्यक्ति से कलीसिया द्वारा स्वीकार करता है। आज्ञापालन, ब्रह्मचर्य एवं निर्धनता के व्रतों द्वारा सम्पूर्ण समर्पण करते हुए ईष्वर और मनुश्य को सर्वोच्च प्रेम देने के लिए समर्पित लोग प्रतिश्ठित हो जाते हैं। व्रतधारी-जीवन का मूल्य ईसा मसीह के साथ व्यक्तिगत संबंध में निहित है। ये व्रत अपने आप में एक लक्ष्य नहीं, बल्कि मार्ग मात्र हैं। सन्यास का आधारभूत नियम सुसमाचार के ईसा का अनुकरण करना है ( PC 2)। समर्पित लोगों को उस निर्मल और निर्धन मसीह का अनुकरण करना है जिन्होंने क्रूस पर की मृत्यु तक पिता की इच्छा के अधीन बन कर मानव जाति की रक्षा की और उसको पवित्र किया (PC 1)। सुसमाचार के उपदेषों के अनुसार मसीह का अनुकरण करते हुए समर्पित लोग ईष्वर के साथ एकता स्थापित करते हैं। ईष्वर की संगति में रहना सन्यास जीवन का मुख्य लक्ष्य है। इसलिए समर्पित लोगों को पवित्रता एवं ईष्वर की संगति में रहने के लिए सदा परिश्रम करना चाहिए।

     

    समर्पित लोगों का प्रेरितिक दौत्य 

     
               पेररितिक कार्य प्रेम का जीवन है जहाँ आत्मदान  होता है। उसके द्वारा हम सभी भाई-बहनों में ईश्वर के विकल बने हुए रूप की सेवा करते हैं। आज कलीसिया और समाज में उन व्यक्तियों की ज़रूरत हैं जो ईष्वर के प्रति अपने आप को पूर्ण रूप से ईष्वर और भाई-बहनों के लिए समर्पित कर सकते हैं। आज दुनिया ऐसे लोगों का इंतज़्ाार करती है जो ईष्वर का पितृ तुल्य चेहरा और कलीसिया का मातृ तुल्य मुँह दुनिया के समक्ष प्रकट करने और दूसरों को जीवन एवं आषा प्रदान करने के लिए जीने को तैयार हैं। समर्पित लोगों के प्रेरितिक क्षेत्र मुख्य रूप से निम्नलिखित है: 

     

    प्रार्थना द्वारा प्रेरिताई 

     
                उस ईसा के समान, जो सब से बड़ा प्रेरित हैं, समस्त समर्पित लोगों को, प्रार्थना द्वारा ईष्वर की संगति में बढ़ना चाहिए। जो ईष्वर के अनन्त प्रेम की घोशणा करते हैं, उन समर्पित लोगों को ईष्वर की संगति का गहरा अनुभव होना जरूरी है। प्रभु के सामने मौन रहते हुए उनको सुनते हुए समय बिताने से समर्पित लोगों के प्रेरितिक कार्य सषक्त हो जाएँगे। जो प्रेरित प्रार्थना एवं मनन चिंतन द्वारा ईष्वर का गहरा अनुभव नहीं करता,उस का आध्यात्मिक प्रभाव एवं प्रेरितिक कार्यों में विजय नगण्य होगी।
     
              समर्पित लोग सारे विष्व के लिए प्रार्थना करने को बाध्य हैं। पापियों के मन परिवर्तन, रोगियों के स्वास्थ्य, विष्व की षांति, एकता और स्थिरता के लिए प्रार्थना करना बहुत महत्वूर्ण प्रेरितिक कार्य है। सन्यास संघ जिनकी स्थापना केवल ध्यानयोग के लिए की गयी है, उनकी प्रार्थना द्वारा कलीसिया प्रचुर मात्रा में अनुग्रह प्राप्त करती है।

     

    पैरिषों में प्रेरितिक कार्य 

     
                     सन्यास भवन किसी एक पैरिष की सीमा के अन्दर स्थित है। पल्ली पुरोहित के साथ समर्पित लोग पैरिष के अनेक विकास कार्यों में भाग लेते हैं। इस प्रकार वे पैरिष की जनता की आध्यात्मिक एवं भौतिक उन्नति के हेतु अपनी क्षमता का उपयोग पूर्ण रूप से करने के लिए बाध्य हैं। पैरिष को एक विषाल परिवार ही मान सकते हैं। पैरिष को पवित्र बलिदान एवं अन्य सांस्कारों की ओर ले चलने में समर्पित लोगों का योगदान महत्वपूर्ण है। परिवार मिलन सभाओं का आरंभ करने और उन्हें सषक्त बनाने में समर्पित लोग भी पल्ली पुरोहित के साथ कार्य करते हैं। विष्वास जीवन सुदृढ़ करने के लिए समर्पित लोगों को अपनी क्षमता एवं षक्ति का उपयोग करना चाहिए। पैरिष की ज्योति बनकर समर्पित लोग अंधकार में चलने वालों के पथप्रदर्षक हो सकते हैं।

     

    धर्मषिक्षा प्रेरिताई 

     
                 धर्म षिक्षा कक्षाओं में बालक-बालिकाओं तथा युवा-युवतियों को ख्रीस्तीय विष्वास के मूलभूत सिद्धांत एवं कलीसिया के प्रबोधन इस प्रकार प्रदान किये जाते हैं कि ज्ञानस्नान में उन्हें प्राप्त विष्वास देदीप्यमान एवं जीवन्त हो जाए। धर्मषिक्षा के मुख्य लक्ष्य ये है: पवित्र बलिदान में पूर्ण एवं सजीव, रचनात्मक एवं सक्रिय सहभागिता द्वारा सत्य और आत्मा में ईष्वर की आराधना करने के लिए पढ़ाना, ख्रीस्तीय व्यक्तित्व को रूप देने के लिए प्रषिक्षण देना, बच्चों में ख्रीस्तीय अन्तःकरण को रूप देने में उनकी सहायता करना, सर्वोपरि मसीह के षरीर का निर्माण करना आदि हैं (CT1)। युवा हृदयों में पवित्र कलीसिया के प्रति गहरा प्रेम और निश्ठा अंकुरित करने से ईष्वर के राज्य के विकास के हेतु अपने आप को समर्पित करने के लिए वे तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार उत्साही विष्वासियों का गठन करने की कलीसिया के प्रयास में समर्पित गण भाग लेते हैं। सर्वोपरि वे अपने ही उत्साहपूर्ण विष्वास एवं प्रेरितिक चेतना द्वारा युवा पीढ़ी को सुदृढ़ ख्रीस्तीय जीवन की ओर ले चलते हैं।

     

    परिवारिक प्रेरिताई 

     
                     व्यक्ति एवं परिवार हैं समाज का आधार। परिवारों में जीवन का स्वागत, संरक्षण एवं पालन-पोशण होता है। समर्पित गण पारिवारिक प्रेरिताई द्वारा पारिवारिक जीवन की पवित्रता के बारे में ज्ञान प्रदान करने, उसके उत्तरदायित्व को कायम रखने एवं टूटे (पारिवारिक) संबंधों का पुनः निर्माण करने के लिए समर्थ हैं।
     
                 आज, जब परिवार का भविश्य खतरे की ओर अग्रसर हो रहा है, परिवारों में लोगों से भेंट करते हुए प्रौढ़ पीढ़ी के लोगों से ले कर युवा पीढ़ी तक के लोगों को विष्वास में सुदृढ़ बनाने में समर्पित लोग अधिक ध्यान देते हैं। परिवार का नवीनीकरण आज की सख़्त ज़रूरत है क्योंकि उदात्त व्यक्तित्व का ‘रूप लेना‘ भवनों में होता है। भवनों में लोगों से भेंट करते हुए उनकी वेदना, दुर्दषा एवं उतार-चढ़ाव में भाग ले कर ईसा का करुणामय प्रेम बाँटने के लिए समर्पित लोग ध्यान देते हैं।

     

    समाज सेवा 

     
                    ‘‘तुम ने मेरे इन भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया, वह तुम ने मेरे लिए ही किया’’(मत्ती 25: 40)। ईसा ने निर्धनों एवं दीनहीनों के साथ तादात्म्य स्ािापित कर मानव जाति की व्यथा अपनाई। सन्यासी गण, जो ईसा के प्रेम एवं करुणा का अनुभव करते हैं, अपने अड़ोस-पड़ोस के गरीब, पीड़ित, षोशित भाई बहनों की आवष्यकताओं को समझते हुए उनके पास जा कर उनकी मदद करने के लिए विषेश दिलचस्पी प्रकट करते हैं। विविध कल्याणकारी योजनाओं का आयोजन कर लोगों की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्तर की उन्नति करते हुए वे उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर ले चलते हैं। निराषा, मद्यपान, नषे की गुलामी, सामाजिक पृथक्करण आदि के अधीन हो कर दुःखित लोगों की मदद करने के लिए समर्पित लोग तैयार हो जाते हैं। आवास, भोजन, षिक्षा आदि मूलभूत सुविधाओं से वंचित गरीब लोगों की सहायता करने के लिए वे आगे आ जाते हैं। समाज से बहिश्कृत अनाथों एवं निस्सहाय लोगों के लिए वे आषा का षरणस्थान बन जाते हैं।

     

    मिषन कार्यकलाप 

     
                  कलीसिया अपना सुसमाचार कार्य द्वारा अविष्वासियों को विष्वास की ओर ले चलते और विष्वासियों को विष्वास में सुदृढ़ बनाने का प्रयास करती है। जैसे पिता ने मानव पर अपना प्रेम प्रकट करने के लिए अपने पुत्र को भेजा, वैसे प्रत्येक सन्यासी समस्त मानव जाति को सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा गया है। समर्पित लोग प्रार्थना, सेवा एवं दुःख भोग द्वारा विष्व के प्रत्येक क्षेत्र में ईसा का नाम फैलाने के लिए प्रयास करते हैं। जिस स्थान पर और समूह में  समर्पित लोग रहते हैं और सजीव रूप से मसीह का साक्ष्य देते हैं, वहाँ सब लोग मसीह को जानेंगे और मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार करेंगे।
     
                सन्यास जीवन कलीसिया की प्रेरिताई का अनिवार्य और महत्वपूर्ण इकाई है। समर्पित लोगों के लिए प्रार्थना करते हुए उनके दौत्य को पूरा करने में उनकी मदद करना हमारा कर्तव्य है। हम आग्रह एवं प्रार्थना करें कि हज़ारों की संख्या में लोग आगे आयें और समर्पित जीवन की बुलाहट स्वीकार करें ।

    ईष वचन पढ़े और मनन करें 

    फिलिप्पियों 3: 12-21
     

    कंठस्थ करें

    ‘‘हमारा स्वदेष तो स्वर्ग है और हम स्वर्ग से आने वाले मुक्तिदाता प्रभु ईसा मसीह की राह देखते रहते हैं’’ (फिलिप्पियों 3: 20)।
     

    हम प्रार्थना करें 

    हे प्रभु ईसा, समर्पित लोगों को सहायता कीजिये कि वे ब्रह्मचर्य, निर्धनता एवं आज्ञापालन के व्रतों का पालन करते हुए जीवन बिता कर आप के सुसमाचार के साक्षी बनें तथा सुसमाचार का प्रचार करें।
     

    मेरा निर्णय 

    मैं समर्पित लोगों के साथ आदर एवं श्रद्धापूर्वक व्यवहार करूँगा/गी।
     

    कलीसिया के साथ विचार करें 

     
    इस बात को स्वीकार करना है कि समर्पित जीवन वास्तविक रूप से महत्वपूर्ण है जो कलीसिया की पवित्रता को प्रकट करने के उपाय के रूप में मसीह के ही जीवन-चर्या को प्रतिबिम्बित करता है। इसलिए वह सुसमाचार के मूल्यों का विषेश रूप से समृद्ध प्रकटीकरण और कलीसिया के लक्ष्य का महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति भी है। उसका लक्ष्य तो मानव जाति का पवित्रीकरण है। समर्पित जीवन आगामी युग की घोशणा करता है ; एक प्रकार से वह उसका पूर्व आस्वादन है (VC 32)।