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                       सलीब पर अर्पित येसु के बलिदान के बारे में इब्रानियों के नाम पत्र में लिखा हैः ‘‘अब युग के अंत में वह एक ही बार प्रकट हुए, जिससे वह आत्मबलिदान द्वारा पाप को मिटा दें’’ (इब्रानियों 9: 26)। ”मसीह ने संसार में आ कर यह कहाः तू ने न तो यज्ञ चाहा न चढ़ावा, बल्कि तू ने मेरे लिए एक षरीर तैयार किया है’’ (इब्रानियों 10: 5)। ‘‘प्रत्येक दूसरा पुरोहित खड़ा हो कर प्रतिदिन धर्म-अनुश्ठान करता है और बार-बार एक ही प्रकार के बलिदान चढ़ाया करता है, जो पाप हरने में असमर्थ होते हैं। किन्तु वह पापों के लिए एक ही बलिदान चढ़ाने के बाद, सदा के लिए ईष्वर के दाहिने विराजमान हो गये हैं’’ (इब्रानियों 10: 11-12)।
     
                 पिता द्वारा भेजे गये ईसा ने अपना प्रेरितिक दौत्य अपने जीवन की आहुति द्वारा पूरा किया सलीब पर की बलि के जरिये उन्होंने पिता के अनंत प्रेम की घोशणा की। सलीब पर उन्होंने जो बलि अर्पित की, वही सुसमाचार की सबसे बड़ी घोशणा थी। अपने जीवन को बलि के रूप में समर्पित करना पुरोहिताई जीवन का सर्वोच्च प्रेरितिक कार्य है। प्रभु ईसा एकमात्र पुरोहित हैं। अन्य सभी पुरोहित उनकी पुरोहिताई में भाग लेते हैं। ज्ञानस्नान एवं दृढ़ीकरण संस्कार द्वारा हर एक मसीही ईसा की पुरोहिताई में भाग लेता है। मगर ईष्वर कुछ लोगों को विषेश रूप से  पुरोहिताई  कार्य के लिए चुन कर नियुक्त करता है। पुरोहितों को इस प्रकार की बुलाहट प्राप्त हुई है।
     
                 समस्त ईसाई ईसा के षिश्यत्व में भाग लेने के लिए बुलाये गये हैं। मगर जिन्हें  पुरोहिताई कार्य की बुलाहट मिली है, वे षिश्यत्व के अधिक गहरे अनुभव में जीने के लिए बुलाये गये हैं। ईष्वर की विषेश बुलाहट एवं चुनाव इसके पीछे हैं। ईसा ने कहा, ‘‘तुम ने मुझे नहीं चुना, मैं ने तुम्हें चुना है” (योहन 15: 16)। जिस ने बुलाया है, उस ईष्वर को पूर्ण रूप से समर्पित करते हुए उत्तरदायत्वि के साथ पूरा करने का दौत्य है पुरोहिताई। अपने जीवन को समर्पित करते हुए ईष्वर द्वारा सौंपा हुआ प्रेरितिक दौत्य पूरा करने के लिए प्रत्येक पुरोहित बाध्य है। पुरोहित यह उत्तरदायित्व मुख्य रूप से वचन की घोशणा, पवित्र बलिदान एवं मेशपालन द्वारा निभाते हैं।
     

    हम करें 

    चर्चा कीजिए कि पुरोहित में आप क्या क्या गुण देखना चाहते हैं।

     

     

    पुरोहिताई का पद एवं कर्तव्य 

     
                  षुश्रूशा पुरोहिताई की पूर्णता ईसा ने प्रेरितों द्वारा धर्माध्यक्षों को प्रदान की है। पुरोहित गण धर्माध्यक्षों के सहयोगी हैं। कलीसिया के षीर्श और चरवाहा हैं ईसा; पुरोहित उन के प्रतिनिधि हैं। ईसा के साथ रहते हुए वचन की घोशणा करने, संस्कारों का अनुश्ठान करने और ईष्वर की जनता की अगुआई करने के लिये वे बुलाये गये हैं। जो मसीह का षरीर है, उस कलीसिया का, निर्माण करने के लिए वे मसीह के तीनों दौत्यों में भाग लेते हैं- यानी पढ़ाना, पवित्र करना और अगुआई करना। ईष्वर की जनता, मसीह का आध्यात्मिक षरीर एवं पवित्र आत्मा का मन्दिर है कलीसिया। दुनिया में कलीसिया का निरंतर निर्माण करना है पुरोहितों का मूलभूत दौत्य (PO . 1)। वे नित्य पुरोहित मसीह के पौरोहित्य में भाग लेते हैं। अतः वे उनके (कलीसिया के षीर्श-मसीह-के) नाम पर कार्य कर सकते हैं। इसलिए वे ईष्वर और मनुश्य के बीच मध्यस्थ के रूप में षुश्रूशा करते हैं। वे ईष्वर की जनता की प्रार्थनाएँ ईष्वर के समक्ष समर्पित करते हैं और ईष्वर की इच्छा जानने के लिए उनकी जनता की सहायता करते हैं।

     

    प्रवचन-षुश्रूशा द्वारा 

     
                      याजकीय षुश्रूशा का महत्वपूर्ण दौत्व है सुसमाचार की घोशणा। पुनरुत्थान के बाद ईसा ने षिश्यों को जो दौत्य सौंपा वह यही है, यानी, वे सुसमाचार की घोशणा द्वारा मसीह का प्रचार करें और कलीसिया का निर्माण करें। उन्होंने कहाः ‘‘तुम लोग जा कर सब राश्ट्रों को षिश्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैं ने तुम्हें जो-जो आदेष दिये हैं, तुम उनका पालन करना, उन्हें सिखलाओ’’ (मत्ती 28: 19-20)।
     
                  षिश्यों को यह दृढ धारण थी कि ईष्वर के वचन की उपेक्षा करते हुए भोजन परोसने में व्यस्त रहना ठीक नहीं है और उन्हें प्रार्थना एवं वचन की षुश्रूशा में निरन्तर लगे रहना है। इसलिए उन्होंने भोजन परोसने के लिए उपयाजकों को नियुक्त किया (प्रेरित-चरित 6: 2- 4)। इसके द्वारा उन्होंने स्पश्ट किया कि पुरोहित के जीवन का दौत्य ही वचन की घोशणा है। वे जिस वचन की घोशणा करते हैं उसे अपने जीवन में उतारने का भी उन्हें ध्यान रखना चाहिये। व्यक्तिगत एवं सामाजिक गलतियाँ सुधारने में भी प्रेरितों ने ध्यान दिया; विष्वासियों की ख्रीस्तीय जीवन षैली में जो गलतियाँ होती थीं, उन्हें सुधारने का निर्देष दिया। कुरिन्थ की कलीसिया में जब फूट पडी तब उन्होंने उसके विरुद्ध चेतावनी दी (1 कुरिन्थियों 1: 10-14, 11: 17-22)
     
                सुसमाचार की घोशणा एक पवित्र षुश्रूशा है। उसके अनुश्ठान द्वारा ईष्वर की जनता एकत्र की जाती है (PO 2)। जहाँ पहली बार वचन की घोशणा की जाती है, वहाँ सुसमाचार की घोशणा को अधिक महत्व दिया जाता है। क्योंकि वचन की घोशणा द्वारा कलीसियायी समूह का आरंभ होता है। जहाँ ख्रीस्तीय समूह की लंबी परम्परा है, वहाँ पर भी कलीसिया की षिक्षा की सही व्याख्या करने एवं समय समय के अनुरूप उसे समझाने के लिए पुरोहित बाध्य हैं। दूसरा वैटिकन महासभा सिखाती है कि सब को ईष्वर का वचन सुनाना पुरोहितों का प्रथम कर्तव्य है। ”पुरोहितों को चाहिये कि वे अपने को प्राप्त सुसमाचार-सत्य सब लोगों को इस प्रकार प्रदान करें कि वे सब प्रभु में आनन्द मना सकें। खुले खुले प्रवचन द्वारा वे मसीह-रहस्य की घोशणा करते हैं। अपने ज्ञान की षिक्षा देना नहीं, परन्तु ईष्वर का वचन सिखाते हुए सब को स्वयं का परिवर्तन एवं स्वयं के पवित्रीकरण की ओर ले चलना, यह है पुरोहितों का कर्तव्य” (PO 4)। वे अध्यापक एवं वक्ता हैं जो ईष्वर की प्रजा को विष्वास सिखाते हैं। पुरोहितों की प्रेरिताई उनकी घोशणा षुश्रूशा में प्रकट होती है। ‘सुसमाचार की घोशणा‘ नामक प्रेरितिक प्रबोधन हमें याद दिलाता है कि याजकीय षुश्रूशा का केन्द्र बिन्दु वचन की घोशणा है (EN 68)।

     

    पवित्रीकरण-षुश्रूशा द्वारा

     
             ”प्रत्येक प्रधानयाजक मनुश्यों में से चुना जाता है और ईष्वर-संबंधी बातों में मनुश्यों का प्रतिनिधि नियुक्त किया जाता है, जिससे वह भेंट और पापों के प्रायष्चित्त की बलि चढ़ाये” (इब्रानियों 5: 1)। पुरोहित अपनी याजकीय षुश्रूशा द्वारा विष्वासियों की आध्यात्मिक बलियाँ एकमात्र मध्यस्थ मसीह की बलि के साथ परम पिता ईष्वर को अर्पित करते हैं। याजकीय षुश्रूशा का लक्ष्य यह है कि पुरोहितों के हाथों द्वारा, समस्त कलीसिया के नाम पर, जो रक्त रहित एवं सांस्कारिक बलि (पवित्र बलिदान) अर्पित की जाती है, वह मसीह के पुनरागमन तक जारी रहे (PO  2)। पुराने विधान के पुरोहितों के समान नये विधान के पुरोहित केवल षुश्रूशाओं के अनुश्ठाता नहीं हैं। वे संस्कारों के अनुश्ठान एवं ईष्वर के वचन की घोशणा द्वारा पवित्रीकरण की षुश्रूशा करते हैं। जैसे आदिम कलीसिया में ”रोटी तोडने” की षुश्रूशा (पवित्र बलिदान) में प्रेरित गण अध्यक्ष थे, वैसे उपासना पद्धति में पवित्र बलिदान में पुरोहित समूह का नेतृत्व करते हैं। पुरोहित की षुश्रूशा कलीसिया के नाम पर है। 

     

    मेशापालीय षुश्रूशा द्वारा

     
                  पुरोहित वह गड़ेरिया है जो ईष्वर की प्रजा को जानते हैं। भले गड़ेरिये ईसा के जैसे वे अपनी भेडों के झूंड के प्रति दिलचस्पी एवं ध्यान रखने के लिए बुलाये गये हैं। भेडों के झुंड उनका अनुसरण करते हैं और अपने को सौंपे हुए झुंड के कल्याण एवं उन्नति के लिए वे अथक परिश्रम करते हैं। पुरोहित गड़ेरिये हैं जो ख्रीस्तीय भाईचारे की ओर अन्य लोगों की अगुआई करते हैं। उन्हें व्यक्तिगत प्रेम से ईष्वर की प्रजा को विष्वास की एकता में बनाये रखना चाहिये। जो सही मार्ग से भटक जाते हैं, उन्हें खोज कर वापस लाने और झुंडों की उन्नति एवं विकास को ध्यान में रखते हुए कार्य करने के लिए वे बाध्य हैं।
     

    हम करें 2

    धन्य तेवरपरम्पिल कुंजच्चन के जीवन-चरित का अध्ययन कर उनकी प्रेरितिक चेतना के बारे में एक लेख तैयार कीजिये।
     
     
                     पुरोहित की मेशपालीय षुश्रूशा के बारे में दूसरा वैटिकन महासभा पढ़ाती हैः ‘‘कलीसिया का निर्माण करते समय पुरोहित को ईसा का अनुकरण करते हुए प्रषांत भाव से सब के साथ बरताव करना चाहिये। मनुश्यों की प्रीति की इच्छा न रख कर ईष्वर के महत्व के लिए सब कुछ करना है। ईष्वर की प्रजा की सेवा करने के लिए उन्हें समय-असमय पर तत्पर रहना चाहिए। ईष्वर की प्रजा का विष्वास बढ़ाने में उन्हें उत्साही होना है। गरीब एवं कमज़ोर लोगों पर विषेश ख्याल रखना चाहिये। बालक-बालिकाओं, युवा-युवतियों, विवाहितों एवं माता-पिताओं पर विषेश ध्यान देना अनिवार्य  है। पुरोहित को यह सच्चाई सदा याद रखनी है कि ईष्वर के भवन में सन्यासी एवं सन्यासिनी गण का पद ऊँचा है। रोगियों एवं मरणासन्न लोगों के लिए अधिक दिलचस्पी रखनी है। प्रेरितिक उत्साह से पूरित होकर केवल विष्वासियों को नहीं बल्कि सभी लोगों को ईसा की ओर लाने का मार्ग तैयार करने के लिए पुरोहित बाध्य हैं। अपने को सौंपे हुए लोगों के लिए कठिन परिश्रम करना चाहिये। अपनी जनता की दुःख-तकलीफ में षीघ्र पहुँचना है। भवनों में लोगों से भेंट करने जाना चाहिये। रोगियों एवं पीड़ितों के लिए विषेश रूप से प्रार्थना करनी भी है। एक व्यक्ति के जन्म से ले कर मृत्यु तक के प्रत्येक चरण में पुरोहित की षुश्रूशा प्राप्त होनी चाहिये। जो पाप के बोझ से पीड़ित हैं और जो मानसिक व्यथा से अषांत हैं, उन्हें पापमोचन एवं सांत्वना देने के लिए पुरोहित बाध्य हैं। जाति एवं धर्म के भेदभाव के बिना समाज की उन्नति के लिए कठिन परिश्रम करने का मनोभाव उन में होना चाहिए। सर्वोपरि पुरोहितों का व्यवहार ऐसा होना चाहिये कि जो लोग उन से मिलने आते हैं वे सब ईसा की प्रेमपूर्ण उपस्थिति का अनुभव कर सकें” (PO 3)।
     
                 मेशपालकों को विवेक एवं प्रबोधन करने की निपुणता ज़रूरी है। उन्हें समाज का सही नेतृत्व करने में सक्षम होना चाहिये। ‘सुसमाचार की घोशणा‘ नामक प्रेरितिक पत्र के अनुसार याजकीय षुश्रूशा के विविध क्षेत्र निम्नलिखित हैं:-
     

    1. आधिकारिक रूप से ईष्वर के वचन की घोशणा करना।

    2. ईष्वर की जनता को एकत्र करना, उन्हें एकता में बनाये रखना।

    3. संस्कारों द्वारा उनका पालन पोशण करना।

    4. मुक्ति के मार्ग पर उन्हें सुदृढ़ करना।

    5. अपने विविध दौत्यों को निभाने में ईष्वर की जनता को प्रोत्साहित करना।

    6. हर एक को अपनी बुलाहट के अनुसार जीवन बिताने में सहायता देना।  (EN  68)।

     
                    इस प्रकार जब पुरोहित अपनी मानवीय कमियों को मानते हुए और ईष्वर पर भरोसा रखते हुए इन कर्तव्यों को निभाने का परिश्रम करते हैं तब वास्तव में सुसमाचार-प्रचार ही करते हैं। 
     

     

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें 

    योहन 21: 15-19
     

    कंठस्थ करें 

    ‘‘मैं इस पर गौरव नहीं करता कि मैं सुसमाचार का प्रचार करता हूँ। मुझे तो ऐसा करने का आदेष दिया गया है। धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ’’ (1 कुरिन्थियों 9: 16)।
     

    हम प्रार्थना करें 

    हे ईसा, नित्य पुरोहित, सभी पुरोहितों को पवित्रता में सुरक्षित रखिये और उन्हें प्रेरितिक उत्साह से परिपूरित कीजिये। 
     

    मेरा निर्णय 

    मैं पुरोहितों का आदर करूँगा/गी और उनके प्रेरितिक कार्यों में सहयोग प्रदान करूँगा/गी।
     

    कलीसिया के साथ विचार करें 

    ‘‘ज्ञानस्नान द्वारा पुरोहित मानवों को ईष्वर की प्रजा की एकता की ओर ले चलते हैं। मेलमिलाप के संस्कार द्वारा ईष्वर और कलीसिया के साथ पापियों का मेलमिलाप कराते हैं। रोगी लेपन द्वारा रोगियों को सांत्वना प्रदान करते हैं। सर्वोपरि पवित्र बलिदान के संस्कार में वे मसीह की बलि चढ़ाते हैं (PO 5)।