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                       करनेलियुस और उनके परिवार जो गैर यहूदी थे, ईष्वर के विषेश हस्तक्षेप से विष्वासी बन गये। ईष्वर ने एक दर्षन में करनेलियुस से कहा कि वे आदमियों को भेज कर पेत्रुस को बुलायें। साथ ही साथ दूसरे दर्षन में ईष्वर ने पेत्रुस से कहा कि वे करनेलियुस द्वारा भेजे गये लोगों के साथ जायें। इस प्रकार करनेलियुस के भवन में जा कर पेत्रुस ने ईष्वर के वचन की घोशणा की जिसके फलस्वरूप केवल करनेलियुस और उनके परिवार  नहीं, बल्कि अनेक लोगों ने भी बपतिस्मा ग्रहण किया जो वहाँ उपस्थित थे (प्रेरित-चरित 10)। आदिम कलीसिया में अनेक लोग थे जो परिवार सहित बपतिस्मा ग्रहण करके ईसा के प्रेरित बन गये। उदाहरण- लिदिया और परिवार (प्रेरित-चरित 16), स्तेफनुस और परिवार (1 कुरिन्थियों 16: 15) आदि। प्रेरित संत पौलुस प्रिस्का और आक्विला दम्पतियों को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने अपने प्राण दाँव पर रखते हुए पौलुस के प्राण की रक्षा की और उस कलीसिया को नमस्कार करते हैं जो उनके भवन में एकत्र होती है(रोमियों 16: 3-5)। यह उस बात का संकेत देता है कि आदिम कलीसिया में परिवार द्वारा सम्पन्न प्रेरिताई सजीव था।

     

    रिवार - ईष्वर द्वारा स्थापित

     
                  ईष्वर ने प्रेम से प्रेरित हो कर मनुश्य की सृश्टि की और प्यार बाँटने के लिए पारिवारिक जीवन की ओर उन्हें बुलाता है। विवाह केवल एक मानवीय संस्थापन अथवा व्यवस्था नहीं है। मगर एक संयोजन है जिसके द्वारा मनुश्य ईष्वर के सृश्टि कर्म एवं मुक्ति योजना में भाग लेता है।  स्त्री और पुरूश के बीच जीवन भर का एक चिरस्थायी और सुदृढ़ संबंध है वैवाहिक करार। उसका उद्देष्य स्वभावतः दंपतियों की भलाई और बच्चों को जन्म दे कर उनका पालन पोशण उचित रूप से करना है । सब के सृश्टिकर्ता ईष्वर ने मानव समूह के आधार एवं आरंभ के रूप में वैवाहिक संबन्ध की स्थापना की। इसलिए पारिवारिक जीवन द्वारा प्रेरितिक कार्य कलीसिया एवं समाज के लिए विषेश रूप से महत्वपूर्ण है (AA 11)

     

    परिवार प्रेरितिक समूह 

     
                       प्रेरिताई का आधार उस प्यार का साक्ष्य देना है जिसे ईष्वर ने ईसा द्वारा मानव जाति पर प्रकट किया है। कलीसिया एवं समाज के आधार एवं सजीव इकाई के रूप में परिवार के ईष्वरीय दौत्य के बारे में दूसरा वैटिकन महासभा इस प्रकार सिखाती है: ‘‘परिवार के सदस्यों के आपसी प्रेम एवं एकजुट हो कर प्रार्थना द्वारा परिवार को इष्वर के मंदिर में बदलना चाहिये। दम्पतियों के आपसी प्रेम एवं समर्पण उन्हें दूसरों के, विषेश कर बच्चों के, करीब लाते हैं। माता-पिताओं के निस्वार्थ प्रेम, निश्ठा, त्याग मनोभाव एवं अच्छा उदाहरण बच्चों को नवचेतना प्रदान करते हैं। प्रार्थना परिवार को पवित्र एवं दाम्पत्य संबंध को सषक्त बना देती है (।। 11 )। जो परिवार एक साथ प्रार्थना करता है वह बना रहता है। प्रार्थना द्वारा पूरे परिवार में, विषेश कर बच्चों में सुसमाचार कार्यान्वित रहता है। इसलिए कलीसिया में प्रेरितिक कार्य का एक महत्वपूर्ण माध्यम है परिवार (सीरो मलबार कलीसिया के प्रेरितिक कार्य का मार्ग दर्षक 7:6)।
     

    हम करें 1  

    यह ढूँढ कर लिखिये कि परिवार में पवित्र वचन को अधिक महत्व देने के लिए हम क्या-क्या कर सकते हैं ?

    परिवार - वचन की घोशणा की वेदी 

     
                        ईष्वर का वचन मानव के विष्वास-जीवन का आधार है। मानव का उद्धार ईष्वर के वचन द्वारा ही होना चाहिए। ईसा ने कहा, ‘‘जो मेरी षिक्षा सुनता और जिसने मुझे भेजा, उसमें विष्वास करता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है (योहन 5: 24)। परिवार में वचन को महत्व देना चाहिए। इस्राएली लोगों से ईष्वर ने कहा, ‘‘जो षब्द मैं तुम्हें आज सुना रहा हूँ, वे तुम्हारे हृदय पर अंकित रहें। तुम उन्हें अपने पुत्रों को अच्छी तरह सिखाओ। घर में बैठते या राह चलते, षाम को लेटते या सुबह उठते समय, उनकी चर्चा किया करो। तुम उन्हें निषानी की तरह अपने हाथ पर और तावीज़ की तरह अपने मस्तक पर बाँधे रखो और अपने घरों की चैखट तथा अपने फाटकों पर लिख दो” (विधि-विवरण 6: 6-9)। परिवार के सदस्यों को एक साथ बैठ कर प्रार्थनापूर्वक ईष्वर के वचन का अध्ययन करना चाहिये। ईष्वर अपने वचन द्वारा आज भी हम से बातें करता है। जो ईष्वर का वचन सुन कर उसका पालन करते हैं वे सब ईष्वर के अपने हैं (लूकस 11: 28, मारकुस 3: 35)।

     

    परिवार - विष्वास प्रषिक्षण का गुरुकुल 

     
                     परिवार ख्रीस्तीय जीवन का प्रथम विद्यालय और ‘उच्च मानवता की पाठषाला‘ है। सब से पहले माता-पिताओं को ही बच्चों से विष्वास की घोशणा करनी है और विष्वास के विशय में उन्हें षिक्षा देनी है। इस अर्थ में माता-पिता बच्चों के प्रथम अध्यापक एवं प्रधान अध्यापक हैं। वे अपने स्वयं के उदाहरण एवं उपदेष द्वारा बच्चों के ख्रीस्तीय एवं प्रेरितिक जीवन को रूप देते हैं। बच्चों को उचित ख्रीस्तीय षिक्षा देने का अधिकार एवं कर्तव्य माता-पिताओं का है। ये कर्तव्य ख्रीस्तीय परिवार के प्रेरितिक कार्यों के प्रमुख अंगों के रूप में देखा जाता है ( AA 1. LG11)।
     

    हम करें 2  

    ख्रीस्तीय परिवार की सुरक्षा के लिए कौन-कौन सी बातें हानिकारक हैं ? उनके बारे में चर्चा करके उनका हल ढँूढ़ निकालिए।
     
                 स्वयं को भूल कर दूसरों को प्यार करने का महत्व बच्चे माता-पिताओं से सीखते हैं। उनके मार्गदर्षन एवं प्रषिक्षण से वे एक दूसरे को स्वीकार करते एवं गलतियाँ सुधारते हुए बढ़ते हैं। वे बच्चों को धार्मिक जीवन बिताने का भी प्रषिक्षण देते हैं। माता-पिताओं के आदर्षपूर्ण जीवन से बच्चे प्रेरणा प्राप्त करके दूसरों के बारे में विचार करने एवं दीन दुःखियों की मदद करने के लिए दिलचस्प हो जाते हैं। घर से प्राप्त प्रषिक्षण से कंजूसी एवं ठाटबाट से दूर रहने और भले कार्यों के लिए दान देने का मनोभाव उनमें बढ़ता है। मजदूरों को उचित मज़दूरी देने, उन से मानवता के साथ व्यवहार करने एवं जाति, धर्म आदि भेदभाव के बिना पड़ोसियों के साथ अच्छा आचरण करने के लिए भी माता-पिता अपने उदाहरण द्वारा बच्चों को प्रषिक्षण देते हैं।
     
            जो परिवार विष्वास जीवन में बढ़ते हैं, वे समाज में ख्रीस्तीय जीवन के आदर्ष बनते हैं। संसार का उद्धार जो कलीसिया द्वारा पूरा हो जाता है, प्रत्येक परिवार द्वारा कार्यान्वित होना चाहिए। कलीसिया के समान मसीही परिवार को भी सजीव सुसमाचार-जीवन की वेदी बननी चाहिए; साथ ही साथ समाज में सुसमाचार का सत्य पहुँचाना भी है। इस प्रकार परिवार कलीसिया के सुसमाचार-प्रचार की एक सषक्त वेदी बन जाती है।

     

    परिवार के प्रेरितिक कार्य के मार्ग

     
                 परिवार के प्रेरितिक कार्य के मुख्य मार्ग निम्नलिखित हैं - प्रेम पर आधारित दांपत्य जीवन, बच्चों के ख्रीस्तीय जीवन के लिए प्रषिक्षण, संस्कारों में भागीदारी, प्रार्थना एवं जीवन साक्ष्य, परोपकारी कार्य, आदि। कलीसिया की उपासना पद्धति में समस्त परिवार को सजीव रूप से भाग लेना है। पवित्र बलिदान और अन्य संस्कारों में दिलचस्पी से भाग ले कर कलीसिया के जीवन में गहराई तक पहुँचना है। पैरिष की गतिविधियों में सहयोग एवं कलीसिया की आवष्यकताओं में मदद देने से कलीसिया के प्रेरितिक कार्य में हम भागीदार बनते हैं। गरीबों के साथ बाँटना, दिलचस्पी से आतिथ्य सत्कार करना, दुःखी-पीडित एवं गरीब लोगों को न्याय और मदद मिलने के लिए प्रयास करना, परित्यक्त बच्चों को गोद लेना, आदरपूर्वक परदेषियों का स्वागत करना, धर्मषिक्षा के लिए आवष्यक मदद करना, विद्यालयों के संचालन में सहायता करना, आदि प्रेरितिक कार्यों में पारिवारिक जीवन बिताने वाले भाग ले सकते हैं (AA 11)। सर्वोपरि अपने बच्चों को प्रेरितिक बुलाहट स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करते एवं उसके लिए आवष्यक मदद करते हुए माता-पिता कलीसिया के प्रेरितिक कार्य में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
     
                 यदि कलीसिया स्वभाव से ही प्रेरितिक हो, तो प्रत्येक मसीही परिवार भी स्वभाव से ही प्रेरितिक है। सुसमाचार प्रचार कार्य में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान समझते हुए कलीसिया परिवार द्वारा प्रेरितिक कार्य को परम महत्व देती है। इस दौत्य को स्वीकार करते हुए हम प्रेरितिक कार्य में भाग लेने का प्रयास करें। आधुनिक मसीही परिवारों की समस्याओं को हल करने में, हम कलीसिया के साथ, प्रयास करें।

    ईष वचन पढ़ें और मनन करें 

    इब्रानियों 13: 1-6
     

    कंठस्थ करें

    ‘‘तुम्हारी ज्योति मनुश्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें’’ (मत्ती 5: 16)।
     

    हम प्रार्थना करें 

    हे ईसा परिवारों के प्रभु, प्यार एवं एकता में रहने के लिए हमारी और हमारे माता-पिताओं की सहायता कीजिये।
     
     

    मेरा निर्णय 

    महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले मैं माता-पिताओं की राय पूछूँगा/गी।
     

    कलीसिया के साथ विचार करें

    परिवार के सदस्य एकत्र हो जाते समय प्रार्थना, बाइबिल वाचन, मनन चिंतन और माता-पिताओं की देखरेख मनोरंजन आदि द्वारा उन अवसरों को महत्वपूर्ण बनाने के लिये माता-पिताओं को प्रयास करना चाहिये। इस से प्रत्येक सदस्य ईष्वरीय प्रेम का अनुभव कर उसे दूसरों को बाँटने का माध्यम बन सकेगा। मसीही परिवार को सुसमाचारीकरण की बेदी बनने में ऐसे अवसर सहायक हैं (एषिया की कलीसिया 46)।