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            पुनरुत्थान के बाद प्रभु ईसा की विषेश आज्ञा के अनुसार उन के ग्यारह षिश्य गलीलिया की पहाड़ी पर गये। वहाँ प्रभु ने उन लोगों से इस प्रकार कहा - “मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जाकर सब राश्ट्रों को षिश्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो-जो आदेष दिये हैं, तुम लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो - मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हँ” (मत्ती 28: 18-20)।

     

    प्रभु की आज्ञा

     

            पास्का पर्व के दिन पवित्र बलिदान की स्थापना के बाद ईसा ने कहा - श्यह मेरी  स्मृति में किया करोश् (1कुरिन्थि 11 : 24)। ईसा जिन्होंने इसकी स्मृति मनाने की आज्ञा दी है  उन्होंने ही सुसमाचार की घोषणा करने की भी आज्ञा दी है। स्वर्गारोहण के समय ईसा ने कहा -श्संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओश् (मारकुस 16:15)। ईसा ने अपने प्रेरितो के ज़्रिए कलीसिया को जो दौत्य सौंपा है वह है सुसमाचार की घोषणा। पवित्र बलिदान चढ़ाकर कलीसिया ईश्वर को परम आराधना अर्पित करती है और ईश्वरानुभव प्राप्त करती है जिसकी घोषणा करना उसका परम कर्तव्य है । उसकी घोषणा किये बिना वह नहीं रह सकती है। कलीसिया के ईश्वरीय अनुभव में भाग लेने तथा उसके सुसमाचार की घोषणा के दौत्य में भागीदार होने से ही कलीसिया की सन्तानों का विश्वास सार्थक बन जाता है। 

     

    हम करें-1 

     
    वह सुसमाचारांश ढूँढ निकालिए जिसमें प्रभु ईसा अपने श्ष्यि¨­ को प्रेरितिक दौत्य सौंप देते हैं, तथा उस पर चर्चा कीजिए ।
     

    पिता ईश्वर ने अपने पुत्र को भेजा है

     

               ईश्वर के वचन ने देह धारण कर मनुष्य के बीच निवास किया। यह मानव जाति की मुक्ति के लिए ईश्वर की योजना थी। संत योहन कहते हैं -    ”ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाष न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे। ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषाी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा है कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे " (योहन 3:16-17)। पुत्र द्वारा ष्हमें अन्धकार की अधीनता से निकालनेश् (कलोसि 1:13) तथा उनके द्वारा अपने साथ संसार का मेल कराने के लिए पिता ईश्वर ने पुत्र को इस संसार में भेजा। पिता की इच्छा पूरी करना ही पुत्र का प्रेरिताई दौत्य था (योहन 5:30)।

    प्रभु ईसा प्रथम प्रेरित

     

              प्रभु ईसा, पिता ईश्वर का सुसमाचार है। पुत्र को संसार में भेजा जाना ही सभी प्रेरिताई दौत्यों की शुरूआत है। ईसा मसीह ही सुसमाचार का पहला प्रवक्ता है। ( Evangeli Nuntiandi EN -7 ) । वे अपने वचन और कर्म द्वारा पिता के प्रेम और करूणा दिखाते हैं। वेही सुसमाचार का सर्वश्रेष्ट प्रवक्ता एवं  प्रथम प्रेरित हैं। 

     

               ष्मिषनष्, ष्मिषनरी  - ये दोनों षब्द लातीनी भाषा के ष्मीत्तरे ष्षब्द से आये हैं जिसका मतलब है ष्भेजना। ष्मिषनष्षब्द भेजे जाने वाले के दौत्य को सूचित करता हैः ष्मिषनरी का मतलब है ष्भेजे जाने वाला। प्रभु मसीह ने, जो पहला प्रेरित हैं, नाज़रेत के सभागृह में अपने प्रेरिताई दौत्य की घोशणा की। ”प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का संदेष दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ और प्रभु के अनुग्र्ह का वर्ष घोषिात करूँश् (लूकस 4:18-19)। ईसा ने यह घोषणा की कि अपना दौत्य संसार की मुक्ति है तथा मुक्ति के दिन आरम्भ हो चुके हैंः ”धर्म ग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया हैश् (लूकस 4:21)। एक अन्य अवसर पर ईसा यह बात साफ-साफ व्यक्त करते हैं कि वे स्वर्गराज्य का सुसमाचार सभी देषा¨­ में घोषिात करने के लिए आये हैं। ”मुझे दूसरे नगरों को भी ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना है। मैं इसलिए भेजा गया हूँ“ (लूकस 4:43)।
     
              प्रभु ईसा का संदेष मानव जाति की मुक्ति एवं ईश्वर के राज्य के बारे में था। इसके लिए ईष्वरीय प्रेम और भ्रातृप्रेम पर आधारित एक नवीन जीवन ष्©ली को उन्होंने अपनाया और उसकी घोषणा की। ईसा ने अपने जन्म, जीवन, षिक्षा, चमत्कारों, दुःखभोग, मृत्यु, पुनरूत्थान एवं स्वर्गारोहण द्वारा अपने दौत्य की पूर्ति की।
     

    हम करें-2

    ईसा पिता द्वारा भेजे गये हैं। इस संदेष को व्यक्त करने वाले दो सुसमाचार भागां को संत योहन के सुसमाचार में से ढँूढ कर लिखिए।
     

    पवित्रात्मा की प्रेरिताई 

             ईश्वर ने पवित्रात्मा को भेजा कि प्रभु ईसा द्वारा हासिल की गयी मुक्ति अपनाने के लिए वह मानव जाति की मदद करे। वह कलीसिया में रह कर उसे सजीव बनाता है। पवित्रात्मा के सहयोग के बिना प्रेरितिक कार्य असंभव है। पवित्रात्मा का अभिष¢क स्वीकार करते हुए ईसा अपना सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ करते हैं (मत्ती 3:17)। पवित्रात्मा ही ईसा को प्रार्थना करने के लिए मरुभूमि में ले चला था। ईसा ने अपने षिष्या­ को सुसमाचार की घोषणा के लिए भेजते वक्त उन पर फूँककर पवित्रात्मा प्रदान किया। ईसा ने अपने षिष्या­ को याद दिलाते हुए कहा कि वे पवित्रात्मा को ग्रहण करने के बाद ही सुसमाचार की घोषणा के लिए निकल पडें : ”तुम लोग षहर में तब तक बने रहो जब तक ऊपर की षक्ति से सम्पन्न न हो जाओश् (लूकस 24:49)।

          पेंतेकोस्त के दिन प्रेरितों पर आग की जीभों के रूप में पवित्रात्मा उतर आने पर उन्हें सुसमाचार की घोषणा करने की षक्ति मिली। उसी समय पेत्रुस ने खडे़ होकर मुक्तिदाता प्रभु मसीह की घोषणा की। उसके फलस्वरूप तीन हज़ार लोगों ने ईसा के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण किया। इस प्रकार कलीसिया का उद्घाटन हुआ।

          सुसमाचार सुनने वालों को उसे स्वीकार करने के लिए पवित्रात्मा ही तैयार कराता है। पवित्रात्मा की षक्ति से ही सभी जनताओं एवं संस्कृतियों में सुसमाचार की स्वीकृति होती है। इसी प्रकार आज  पवित्रात्मा कलीसिया को बढ़़ावा देता तथा उसे ईसा की षिक्षा में सुदृढ़ बनाता है। 

          संक्षिप्त में पवित्र त्रित्व ही कलीसिया के प्रेरितिक स्वभाव का आधार है। द्वितीय वत्तिक्कान महासभा घोषणा करती हैः पिता ईश्वर की योजना के आधार पर पुत्र और पवित्रात्मा के प्रेरितिक कार्य से कलीसिया उत्पन्न हुई है (प्रेरितिक कार्य Ad Gentes AG 2)।

     

     

    मसीह द्वारा भेजी हुई कलीसिया

     

             पिता ईश्वर के प्रेम और करूणा का संदेष लेकर ईसा इस संसार में आये। अपने जन्म, जीवन, दुःख-भोग, मृत्यु, पुनरूत्थान एवं स्वर्गारोहण द्वारा उन्होंने संसार को मुक्ति प्रदान की। कलीसिया ईसा मसीह की निरन्तरता है। कलीसिया को ईसा का ही दौत्य इस संसार में जारी रखना है। इसके लिए वह बुलायी गयी है और भेजी गयी है। ईसा ने षिष्य¨­ से कहाः ”जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँश् (योहन 20:21)। कलीसिया ने ईसा से यह दौत्य स्वीकार किया है तथा वह प्रभु के मुक्ति-विधान में भाग लेकर मानव जाति को मुक्ति की ओर ले चलती है। इसलिए कलीसिया सार्वत्रिक मुक्ति का संस्कार है।

     

    प्रेषित कलीसिया

     

               जिस तरह मसीह पिता द्वारा भेजे हुए ह® उसी तरह कलीसिया मसीह द्वारा भेजी हुई है। प्रभु ईसा ने अपने षिष्य¨­ के द्वारा कलीसिया को जो उत्तरदायित्व सौंप दिए हैं वे निम्नलिखित हैं: सारी सृष्ठि को सुसमाचार सुनाना, उन्हें ज्ञानस्नान देना, प्रभु के आदेष¨ का पालन करना उन्हें सिखलाना एवं प्रभु के प्रेम के साक्षी बनना, (मत्ती 28:18-20)। कलीसिया की बुलाहट एवं जिम्मेदारी ये हैंः सुसमाचार की घोषणा करना, ज्ञानस्नान देना, पापों की क्षमा और पवित्र बलिदान के द्वारा सारी जनता को पवित्र करना तथा उन्हें एक झुण्ड के रूप में स्वर्गराज्य के वारिस बनाना। ईसा के ही दौत्य में भाग लेने के कारण प्रेषित होना कलीसिया का स्वभाव है।

               मसीह की आज्ञाओं का पालन करते हुए पवित्रात्मा की कृपा से प्रेरित होकर कलीसिया यह दौत्य जारी रखती है। वह अपनी षिक्षा, संस्कारों, कृपा के विभिन्न उपायों एवं जीवन के नमूने द्वारा लोगों को विष्वास एवं मसीह की स्वतंत्रता और षान्ति की ओर ले जाती है (A G 5)। 

              ” मिषनश् षब्द का मतलब है - उन लोगों को सुसमाचार सुनाना जिन्होंने कभी मसीह के बारे में नहीं सुना है तथा उनके बीच कलीसिया की स्थापना करना। ईष्वर के मुक्ति विधान तथा संसार एवं इतिहास में उसकी पूर्ति की घोषणा है प्रेरितिक कार्य (Redemptoris Missio - RM 41)। कलीसिया के सभी कार्यों का मकसद भी यही घोषणा है। इसलिए सामान्य रीति से देखा जाये तो कलीसिया के सभी कार्य  प्रेरिताई कार्य हैं।

    सब प्रेरित

     

                कलीसिया स्वभाव से प्रेषित होने के कारण ईश्वर की सभी सन्तानें प्रेरित हैं। दूसरों को सुसमाचार सुनाने की कलीसिया की ज़िम्मेदारी उसकी सन्तानों के द्वारा ही निभाई जाती है। प्रत्येक विष्वासी ज्ञानस्नान और तैलाभिषेक द्वारा यह दौत्य अपनाता है। इस दौत्य का एहसास होने पर संत पौलुस ने कहाः ”मैं इस पर गौरव नहीं करता कि मैं सुसमाचार का प्रचार करता हूँ। मुझे तो ऐसा करने का आदेष दिया गया है। धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ " (1कुरिन्थि 9:16)। कलीसिया की उपस्थिति संसार के लिए मुक्तिदायक तब बन जाएगी जब कलीसिया की प्रत्येक संतान इस चेतना के साथ अपने जीवन एवं कर्मों द्वारा सुसमाचार का साक्षी बन जाती है। कलीसिया सुसमाचार की घोषणा एवं पवित्र बलिदान में आधारित प्रेमपूर्ण जीवन के द्वारा अपना प्रेरिताई दौत्य पूरी करती है। हम भी, जो ईसा मसीह में कार्यान्वित मुक्तियोजना की प्रेषित कलीसिया  की संतान हैं, ज्ञानस्नान और तैलाभिषेक द्वारा प्राप्त इस प्रेरिताई दौत्य में निष्ठावान रहें। इस दौत्य की पूर्ति करते हुए जीवन बिताने पर हम भी स्वभाव से प्रेषित कलीसिया  की सच्ची संतानें  बन जायेंगे।

    ईश वचन पढ़ें ओैर मनन करें

     
    योहन 20ः 19-23
     

    कठस्थ करें

     
    ”जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हँूश् (योहन 20ः21)।
     

    हम प्रार्थना करें

     
    हे प्रभु ईसा मसीह, हमें प्राप्त प्रेरिताई बुलाहट एवं दौत्य के योग्य जीवन बिताते हुए आपके साक्षी बनने का अनुग्रह दें।
     

    मेरा निर्णय

     
    मैं हमेषा ईश्वर को धन्यवाद दूँगा/गी क्योंकि उसने ज्ञानस्नान एवं तैलाभिषेक द्वारा कलीसिया के प्रेरिताई दौत्य में मुझे भागीदार बनाया।
     
     
     

    कलीसिया के साथ विचार करें

     
    मानव जाति की मुक्ति के लिए जिस सुसमाचार की घोषणा एवं पूर्ति प्रभु ने की है, उसकी घोषणा एवं प्रचार यरूसालेम से लेकर दुनिया के सीमान्तों तक करने की आवष्यकता है। इस प्रकार सबों के लिए ईसा ने जो मुक्ति सम्पन्न की है उसे समय की पूर्ति में सभी लोगों में फलदायक बनाना है  (AG3)।