•                 एक बार एक धनी युवक ने ईसा के पास आकर उनसे पूछा, ‘‘भले गुरु, अनंत जीवन प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ?’’ ईसा ने उससे कहा, ‘‘तुम आज्ञाआंे को जानते हो...।’’ उसने उत्तर दिया ‘‘इन सबका पालन तो मैं अपने बचपन से करता आया हूँ’’ (लूकस 18: 18-21)। ईसा ने उसे ध्यानपूर्वक देखा और उनके हृदय में प्रेम उमड़ पड़ा; उन्हांेने उससे कहा, ‘‘यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। तब आकर मेरा अनुसरण करो’’ (मत्ति 19: 21)।
                   कलीसिया के आरंभ से ही विष्वासियों का एक ऐसा विभाग था जो पूर्णता प्राप्त करना चाहता था तथा उसके लिए प्रयास करता था। वे दुनियायी सुख-भोग तजकर तपस्या के जीवन द्वारा ईसा का अनुसरण करते थ

    सन्यास और शहादत

                                 धर्म के उत्पीड़क राजाओं के समय अपने विष्वास की सुरक्षा के लिए हज़्ाारों को अपने प्राण की कुर्बानी देनी पड़ी। जिन्होंने घोर यंत्रणाओं के बीच में भी ईसा में अपना विष्वास अटल रखते हुए जीवन त्याग दिया उन्हें कलीसिया संत मानती है तथा उनका सम्मान करती है। षाष्वत सौभाग्य प्राप्त करने का सरल मार्ग समझकर बड़े आवेष के साथ विष्वासीगण षहादत को अपनाते थे। किन्तु जब धर्म का उत्पीड़न समाप्त हुआ, तब विष्वासीगण सन्यास जीवन को पूर्णता प्राप्त करने का मार्ग समझने लगे। ऐसे बहुत से महान सन्यासी थे जिन्होंने जंगलों और मरुस्थलों में रहकर बिलकुल एकान्त में ईष्वर का मनन-चिन्तन करते हुए जीवन बिताया। 
                     सब प्रकार की बाधाओं से आज़्ााद होकर ईसा का अनुगमन तथा अनुसरण करने के लिए ही सन्यास जीवन का आरंभ हुआ था। ईसा के साथ व्यक्तिगत संबन्ध में सन्यासी लोग अपने जीवन का सौभाग्य तथा सफलता प्राप्त करते थे।

    सन्यास ईश्वर के राज्य का चिह्न

                   द्वितीय वैटिकन महासभा यह सिखाती है कि सन्यास-जीवन ईष्वर के राज्य का एक महत्वपूर्ण चिह्न के रूप में बना रहता है (सन्यास जीवन 1)। कलीसिया के सब सदस्यों को अपनी ख्रीस्तीय बुलाहट की जिम्मेदारियाँ साहस के साथ निभाने में प्रेरणा देने का एक सुषक्त, समर्थ एवं उत्तरदायी दृष्य चिह्न के रूप में कलीसिया में वह बना रहता है। दुनिया के नष्वर सुख भोगों को तजकर, अनष्वर स्वर्ग भाग्य को लक्ष्य बनाकर जीने के लिए कलीसिया के सदस्यों को सन्यास जीवन प्रेरित करता है। दुनिया के कुछ भी अपनायें, तो भी ईष्वर का राज्य उससे बहुत ही परे है तथा ईष्वर का राज्य कितना ही महत्वपूर्ण है - सन्यास जीवन यह सुस्पश्ट कर देता है (कलीसिया 44)।

    सन्यास जीवन-ईसा का निकटतम अनुकरण

               सुसमाचार के ईसा का निकटतम अनुकरण ही सन्यास जीवन का मुख्य लक्ष्य है। एकान्त में प्रार्थना करते हुए, रोगियों को चंगाई देते हुए, दुःखितों को सांत्वना प्रदान करते हुए, पापियों को सच्ची राह पर लाते हुए, बच्चों को आषीर्वाद देते हुए और सभी लोगों को भलाई करते हुए ईसा चलते-फिरते थे; उन्हें दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए सन्यासी विषेश रूप से बाध्य है। जिसने उन्हें भेजा उस पिता की इच्छा ईसा ने सदा पूरी की; सन्यास जीवन के जरिए कलीसिया उस ईसा को विष्वासियों तथा अविष्वासियों के सामने सुस्पश्ट रूप से प्रकट कर सकती है (कलीसिया 46)।

    सन्यास जीवन एवं व्रत

                            आज्ञाकारिता, ब्रह्मचर्य एवं निर्धनता - सुसमाचार के ये उपदेष हैं सन्यास जीवन का आधार। इन्हें व्रतों के रूप में मानकर, निश्ठापूर्वक इनका पालन करते हुए सन्यासी लोग मसीह के साक्षी बन जाते हैं। वे व्रतबद्ध सामूहिक जीवन के जरिए स्वर्गीय पिता की पूर्णता की ओर बढ़ने का परिश्रम करते हैं। मसीह का अनुकरण करने में आने वाली बाधाओं से मुक्त होने में सन्यास व्रत सन्यासियों को समर्थ बनाते हैं।
     

    त्याग और प्रतिफल

                               ईसा ने अपने षिश्यों से कहा ‘‘जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्म-त्याग करे और अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले; क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है वह उसे सुरक्षित रखेगा’’ (मत्ती 16: 24-25)। ईसा के इस आह्वान के अनुसार सबकुछ तजकर ईसा का अनुसरण करने वाले हैं समर्पित लोग। आज्ञाकारिता, निर्धनता तथा ब्रह्मचर्य - इन व्रतों का पालन करते हुए सन्यासी अपने जीवन ईष्वर को समर्पित करते हैं। 
                    ईसा है आज्ञापालन का सबसे उत्तम नमूना जो क्रूस पर मरण तक आज्ञाकारी थे उस ईसा के जैसे समर्पित लोग भी ईष्वर की इच्छा पूरी करने के लिए अपनी इच्छा तजते हैं। निर्धनता यह बताती है कि ईष्वर ही मनुश्य का सच्चा खजाना है (समर्पित जीवन 21)। धनी होकर भी ईसा हमारे लिए निर्धन बने (2 कुरिंथियों 8: 9); उनके उदाहरण के अनुसार सन्यासी लोग निर्धनता का व्रत लेते हैं। अविभक्त हृदय से ईष्वर को प्यार करने तथा ईष्वर की जनता की सेवा करने में ब्रह्मचर्य का व्रत समर्पितों की सहायता करता है (1 कुरिंथियों 7: 32-34)। 

    सन्यास जीवन कलीसिया में एवं कलीसिया के प्रति

                 पवित्र कलीसिया में है ख्रीस्तीय सन्यास जीवन का स्थान। प्रत्येक सन्यास समूह का अपना स्वभाव तथा अपनी गतिविधियाँ पवित्र कलीसिया की भलाई हेतु होने चाहिए (सन्यास जीवन 1)। कलीसिया के विकास के लिए ही सन्यासी लोग समर्पित बने रहते हैं। पवित्रात्मा की प्रेरणा के अनुसार वे मसीह तथा कलीसिया के लिए जीवन समर्पित करते हैं। सभी सन्यास समूहों को कलीसिया के जीवन में भागीदार होना चाहिए। पवित्र ग्रन्थ, आराधना क्रम, धर्म-विज्ञान, चरागाही के कार्य, पुनरैक्य, धर्मप्रचार, समाज-सेवा, आदि कलीसिया के अनेक प्रकार के उद्यम तथा योजनाएँ हैं; उन्हें प्रत्येक सन्यास समूह को अपने-अपने आदर्ष के अनुरूप अपनाना और यथा षक्ति बढ़ाना भी चाहिए (सन्यास जीवन 2)।

    सन्यास जीवन कलीसिया में एवं संसार में

                  ईष्वर के साथ निरंतर संबन्ध रखते हुए मनन-चिन्तन के जरिए सन्यासियों ने जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया, वह पवित्र कलीसिया के लिए हमेषा बड़ी आध्यात्मिक सम्पत्ति रही। पवित्र गंन्थ का अनुवाद, आध्यात्मिक ग्रन्थों की रचना आदि द्वारा आदिम कलीसिया के सन्यासियों ने कलीसिया की आध्यात्मिक पूँजी बढ़ायी।
                     आज प्रार्थना, व्रतबद्ध जीवन तथा नाना प्रकार के सेवा कार्यों के द्वारा सन्यासी जन कलीसिया में महत्वपूण् सेवा कार्य निभाते हैं। स्वर्गीय संत पापा जाॅन पाॅल द्वितीय के अनुसार समर्पित जीवन एक ऐसा जीवन है जो कलीसिया के हृदय में ही है (समर्पित जीवन 3)। सन्यास जीवन एक उपहार है जिसे पिता ईष्वर पवित्रात्मा के द्वारा कलीसिया को प्रदान करता है।
                            विद्यालय, अस्पताल, अनाथालय, मन्दबुद्धि वाले और अपंग लोगों के लिए संस्थाएँ, वृद्धाश्रम आदि संस्थाओं द्वारा कलीसिया के सुसमाचार प्रचार के दौत्य में सन्यासी समूह भागीदार होते हैं। बहुत सारे लोग इन संस्थाओं के जरिए षांति, आनन्द तथा ईष्वर के प्रेम का अनुभव करते हैं।
     

    बुलाहट - ईश्वर का दान

                               बुलाहट ईष्वर का दान है जिसे ईष्वर मनुश्यों को देता है। मनुश्य नहीं, बल्कि ईष्वर ही यह चुनाव करता है। यिरमियाह नबी से ईष्वर ने कहा, ‘‘माता के गर्भ में तुमको रचने से पहले ही मैंने तुमको जान लिया। मैंने तुमको राश्ट्रों का नबी नियुक्त किया’’ (यिरमियाह 1: 4-5)। ईसा ने कहा, ‘‘तुमने मुझे नहीं चुना, बल्कि मैंने तुम्हें चुना’’ (योहन 15: 16)। व्रतबद्ध जीवन द्वारा ईसा के अपने बनने के लिए ईष्वर आज भी युवाओं को बुलाता है। ‘‘मेरे पीछे चले आओ, मैं तुमको मनुश्यों के मछुए बनाऊँगा’’, - यह कहकर ईसा ने अपने प्रथम षिश्यों को बुलाया था। वही ईसा उसी प्रकार आज भी बुलाते हैं। इसलिए सबको यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि यदि ईष्वर मुझे बुलाता है या नहीं। जीवन के सम्पूर्ण समर्पण द्वारा ‘ईसा का अपना’ बनकर ईष्वर की जनता की सेवा करने की बुलाहट को उदारता से प्रत्युत्तर देने के लिए युवा-युवतियाँ बाध्य हैं। इसी कृपा के लिए हमें ईष्वर से प्रार्थना करनी भी चाहिए। 
     

    गतिविधि

    इस पाठ में दिए गए सन्तों के चित्रों पर ध्यान दीजिए। बताइये कि वे कौन-कौन हैं। किसी एक सन्त की जीवनी का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

    ईषवचन पढ़ें और मनन करें

    (1 कुरिंथियों 7: 25-35)

    कंठस्थ करें

    ‘‘यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपने सारी सम्पत्ति बेचकर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। तब आकर मेरा अनुसरण करो’’ (मत्ती 19: 21)।

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रभु ईसा, समर्पित जीवन की ओर आपके बुलावे को पहचानने तथा उसी बुलावे को स्वीकार कर आपकी सेवा करने की कृपा हमें प्रदान कीजिए।

    मेरा निर्णय

    मैं अपने बुलाहट पहचानने तथा उसका प्रत्युत्तर देने की कृपा के लिए रोज़्ा प्रार्थना करूँगा/गी।

    कलीसिया के आचार्य कहते हैं

    ‘‘समर्पित जीवन एक ऐसा जीवन है जो कलीसिया के हृदय में ही है। कलीसिया के दौत्य का एक निर्णायक तत्व है वह’’।     (सन्त पापा जाॅन पाॅल द्वितीय)।