•                उनके भोजन करते समय ईसा ने रोटी ले ली और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए षि यों को दिया: ‘‘ले लो और खाओ यह मेरा ारीर है।’’ तब उन्होंने प्याला लेकर धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और यह कहते हुए उसे षि यों को दियाः  ‘‘तुम सब इसमें से पिओ, क्योंकि यह मेरा रक्त है, विधान का रक्त जो बहुतों की पाप-क्षमा के लिए बहाया जा रहा है’’ (मत्ती 26: 26-28)। इस प्रकार रोटी तथा दाखरस को अपने ारीर तथा रक्त के प्रतीक बनाकर ईसा ने पवित्र यूखरिस्त या पवित्र बलिदान की स्थापना की। पवित्र बलिदान में सक्रिय तथा फलदायक रूप से भाग लेना हो तो हमें पवित्र बलिदान से सम्बन्धित सभी चिह्नों का अर्थ तथा उनके द्वारा सूचित वास्तविकताओं को समझना चाहिए।

    स्थान

                               गिरजाघरः ईष्वर की आराधना का स्थान है गिरजाघर।समस्त संसार में उपस्थित ईष्वर के मुक्तिदायक सान्निध्यका प्रतीक भी है यह। मसीह में एक बने विष्वासियों कासमूह जब ईष्वर की आराधना के लिए एकत्र होता है तभीगिरजाघर का अर्थ और महत्व सिद्ध होता है। आराधकों का यह समूह समस्त कलीसिया का प्रतिनिधित्व करता है।इसलिए गिरजाघर कलीसिया का प्रतीक भी है।

    गतिविधि-1

    चिह्नों एवं प्रतीकों केविषय में आपने पिछले पाठ में जोकुछ समझा है उसके आधार परपवित्र बलिदान के चिह्नों कोढूँढकर लिखिए। उन चिन्हों का
    अर्थ भी सोच-विचार करके
     
      

    व्यक्ति

                         पवित्र बलिदान में जो भाग लेते हैं उन व्यक्तियों को भीचिह्न मानते हैं। इन्हें तीन भागों में विभाजित करते हैं:
    1. समूह: समूह उस कलीसिया का प्रतीक है जो पवित्र बलिदान में भाग लेती है। ईसा द्वारा मुक्ति प्राप्त समस्त समूह इसमें ाामिल है।
    2. याजक: मसीह का प्रतिरूप और ईष्वर तथा मानव के बीच के मध्यस्थ हैं याजक। वे समूह के प्रति बलि चढ़ाते हैं।
    3. उपयाजक (म्शम्शाने): उपयाजक और सहायक स्वर्गदूतों के स्थान पर हैं। पवित्र बलिदान के समर्पण में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए समूह को वे आवष्यक निर्देष देते हैं। वे ाुश्रू ाा में याजक के सहायक भी हैं। यह। यह धरती को सूचित करता है। पूजा-सामग्री-कक्ष: याजकों एवं उपयाजकों को पूजा परिधान पहनने तथा बलि अर्पण करने के लिए तैयार होने की जगह है यह।

    वस्तुएँ

    क्रूस (सलीब)ः मद्बहा में स्थापित सलीब मुक्ति का चिह्न तथा मसीह की बलि एवं पुनरुत्थान का प्रतीक है। यह ईसा मसीह का ही प्रतीक तथा महिमा एवं विजय का चिह्न है। क्रूस एक पुर्तगाली षब्द है। सिरियाई भाशा में यह ‘स्लीवा’ कहलाता है जिससे हिन्दी में ‘सलीब’ षब्द आया है।
    सुसमाचार ग्रन्थः स्वर्ग में पिता के दाहिने महिमा के साथ विराजमान मसीह को यह सूचित करता है। बलिवेदी की दाहिनी ओर स्थापित है यह।
    रोटी और दाखरसः ईसा के षरीर तथा रक्त के प्रतीक हैं रोटी और दाखरस।
    पूजा पात्रः प्याला, थाली और परमप्रसाद-पात्र हैं पवित्र बलिदान में प्रयुक्त मुख्य पूजा पात्र। पवित्र षरीर तथा रक्त लेने के लिए थाली और प्याले का तथा परमप्रसाद रखने के लिए परमप्रसाद  - पात्र का उपयोग होता है।
    यज्ञ-मण्डप- दीप: ईसा मसीह संसार की ज्योति है (योहन 8: 12)। यज्ञ-मण्डप-दीप उनके निरंतर सान्निध्य को सूचित करता है। मद्बहा में या मद्बहा के द्वार पर यह स्थित है।
     

    पवित्र परिधान

    प्रत्येक व्यक्तिसभा या कलीसिया में संस्कारों के परिकर्म हेतु परम्परा के अनुसार अलग-अलग पवित्र परिधान होता है। इन्हें पहनकर याजक तथा उपयाजक पवित्र बलिदान चढ़ाते हैं।
    कोत्तीनाः मसीह का तथा मसीह में नवीनीकृत नये मानव का प्रतीक है कोत्तीना। पुराना स्वभाव तज कर और नया स्वभाव धारण कर ही बलि चढ़ाना चाहिए - यह पवित्र वस्त्र यही सूचित करता है।
    कमरबंद (सूनारा)ः षुद्धता तथा सेवा का प्रतीक है यह। कोत्तीना के ऊपर कमरबंद के रूप में पहनने का यह वस्त्र यह संकेत देता है कि दुनिया के विचारों से दूर रहकर निर्मलता से प्रभु की सेवा करने में जागृत रहना चाहिए।
    ऊरारा: गले में पहनने का ऊरारा पवित्र सेवा के लिए नियुक्त होने का चिह्न है। यह पुरोहिताई के अधिकार तथा पवित्रता को सूचित करता है।
    सन्दे: कोत्तीना की बाँहों पर इन्हें पहनते हैं; इनसे यह सूचित किया जाता है कि याजक के हाथ पवित्र सेवा के लिए तैयार हैं।
    पाइना: याजक को अन्य सभी पवित्र वस्त्रों के ऊपर पहनने का पवित्र वस्त्र है पाइना। याजक धार्मिकता धारण करे - इसका स्मरण दिलाने का, धार्मिकता का, वस्त्र है पाइना। पाइना यह भी सूचित करता है कि पुरोहित विष्वासियों का चरवाहा है।
    शोशप्पा: पाइने के रंग में चतुर्भुज के आकार का पवित्र वस्त्र है यह। दिव्य रहस्यों (रोटी और दाखरस) को षोषप्पा से ढकना, ईसा मसीह को कब्र में रखने का प्रतीक है; षोषप्पा को मोड़कर दिव्य रहस्यों के चारों ओर रखना, मसीह के पुनरुत्थान का प्रतीक है। षोषप्पा को ईसा की कब्र के ढक्कन के, उनके पावन षरीर में जो कफन लपेटा था उसके तथा उनके सिर पर बंधे हुए अंगोछे के रूप में माना जाता है।

    इषारे तथा मुद्राएँ

    पवित्र बलिदान में विभिन्न प्रकार के इषारे तथा मुद्राएँ हम देख सकते हैं। इन सबका प्रतीकात्मक तथा मुक्तिदायक अर्थ होते हैं।

    खड़े रहना: आराधना के समय खड़े रहना है प्रायः हमारी रिवाज; पुनरुत्थान को यह सूचित करता है। हम पुनरुत्थान की संतान और स्वर्गीय आस्था रखने वाले हैं। ईसा पर विष्वास और ज्ञानस्नान द्वारा हम मृत्यु एवं सब प्रकार की दासता से मुक्ति प्राप्त जनता हैं।
    बैठना: पवित्र बलिदान में सुसमाचार वाचन को छोड़कर अन्य सभी वाचनों एवं प्रवचन के समय बैठ सकते हैं। बैठना ध्यानपूर्वक सुनने का सूचक है।
    घुटने टेकना: जो ऋणमोचन के लिए याचना करता है उसकी एवं पष्चाताप करने वाले पापी की मुद्रा है यह। सहायता के लिए ईष्वर से मानव की याचना यह प्रकट करता है एवं प्रायष्चित् को भी सूचित करता है।
    सिर झुकाना: अधीनता, सम्मान, आराधना, धन्यवाद। यह सब सिर झुकाने से प्रकट होते हैं।
    हाथ फैलाना: याचना तथा दूसरों के लिए मध्यस्थता करने का सूचक है यह।
    शांति का अभिवादन: याजक से उपयाजक षांति-अभिवादन लेकर दूसरों को देता है। यह आपसी प्रेम तथा एकता प्रकट करता है। दूसरों से मेल-मिलाप रखने का प्रतीक भी है यह। साथ ही साथ यह सूचित करता है कि सभी विष्वासी ईसा मसीह में एक षरीर हैं।
    चुम्बन करना: बलिवेदी, पवित्र बाइबल, सलीब आदि का चुम्बन करने से हम उनके प्रति हमारा प्रेम तथा सम्मान एवं उनमें हमारी आस्था प्रकट करते हैं।
    क्रूस का चिह्न: पवित्र बलिदान में क्रूस का चिह्न बनाते हैं तथा क्रूस के चिह्न से आषीर्वाद देते हैं। याजक खुली हथेली से या अंगूठे से अपने आप पर क्रूस का चिह्न बनाते हैं; दाहिने हाथ से उपयाजक, समूह, पवित्र वस्तुओं तथा धूप को आषीर्वाद देते हैं; सुसमाचार गं्रथ से समूह को आषीर्वाद देते हैं; अंगुठे से बलिवेदी पर क्रूस का चिह्न बनाते हैं; पवित्र षरीर तथा रक्त क्रूस के चिह्न से परस्पर अंकित करते हैं। क्रूस मानव के लिए मुक्ति का चिह्न है तथा ईसा मसीह का ही प्रतिनिधित्व करता है।
    धूपार्पण: पाप मोचन, मेल-मिलाप, आदर, प्रायष्चित, पवित्रीकरण आदि का प्रतीक है धूपार्पण। ईष्वर के सम्मुख हम जो प्राथनाएँ तथा स्तुति गीत अर्पित करते हैं उनका प्रतीक भी है यह।
    हाथ धोना: जैसे पवित्र बलिदान में हाथ धोने के समय की प्राथना सूचित करती है, हाथ धोने का कर्म पापों का मैल धो डालना और पापों का कलंक मिटाना सूचित करता है।
    जुलूस: पवित्र बलिदान में विभिन्न अवसरों पर कईं बार जुलूस होते हैं। प्रारंभिक जुलूस, सुसमाचार गं्रथ लेकर जुलूस, पवित्र षरीर और रक्त लेकर बलिवेदी की ओर जुलूस आदि ईसा के मनुश्यावतार, सार्वजनिक जीवन, येरुसालेम प्रवेष, कलवारी यात्रा आदि घटनाओं को संदर्भ के अनुसार सूचित करते हैं।
    दीप जलानाः ईसा मसीह जो संसार की ज्योति है, उनकी याद दिलाने के लिए पवित्र कर्मों के दौरान दीप जलाते हैं। विभिन्न प्रकार के इन कर्मों को तथा पवित्र वस्तुओं का अर्थ समझकर पवित्र बलिदान में भाग लेने से बलि अर्पण हमारे लिए अनुग्रहदायक बनता है। 

     
    गिरजाघर की कलाएँः गिरजाघर की संरचना, षिल्प कला, भित्ति चित्र, मूर्तियाँ, साज-सज्जाएँ, गीत, अनुश्ठानों की क्रमबद्ध प्रस्तुति की विषिश्टता आदि गिरजाघर की कलाओं में समाहित हैं। ये सब भक्ति संवर्धक और ईष्वर की आराधना में मददगार हैं।
    पूजन गीतः ईष्वर की आराधना में गीतों का स्थान अधिक महत्वपूर्ण  है। स्वर्ग में निरंतर आराधना अर्पित कर रहे हैं स्वर्गदूत; उनसे संयुक्त होकर गीत गाते हुए आराधना समूह ईष्वर की आराधना करता है। द्वितीय वाटिकन महासभा यह सिखाती है कि पूजन विधि के गीतों को इस प्रकार व्यवस्थित करें कि विष्वासी गण उनमें सक्रिय रूप से भाग ले सकें। (आराधना क्रम. 114)
    गिरजाघर की घंटियाँः ईष्वर की आराधना का समय विष्वासियों को बताने तथा पवित्र कर्मों के बीच के 

    ईष-वचन पढ़ें और मनन करें

    प्रकाषना ग्रंथ 15: 2-4

    कंठस्थ करें

    ’’स्वर्गदूत के हाथ से धूप का धुआँ, संतों की प्रार्थना के साथ ऊपर चढ़ा और ईष्वर

    हम प्रार्थना करें

    हे प्रेमी प्रभु ईसा, पवित्र बलिदान के चिह्नों तथा प्रतीकों का अर्थ समझ कर सक्रिय रूप से पवित्र बलिदान अर्पित करने की कृपा हमें प्रदान कीजिए। 

    मेरा निर्णय

    पवित्र बलिदान के चिह्नों तथा प्रतीकों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त 

    कलीसिया के आचार्य कहते हैं

    ’’मानव वंष दुर्बल, दुःखी एवं कमजोर हो गया है। तूने अपनी पवित्र रोटी से उसे षक्ति प्रदान की। तूने अपने मीठे दाखरस से उसे सांत्वना दी। तूने अभिशेक के तेल से उसे