•                                
                        मिस्र की गुलामी से स्वतंत्र होकरकनान देष की ओर अपनी यात्रा में इस्राएलीजनता ईष्वर और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाई। तब ईष्वर ने जनता के बीचवि ौले साँपों को भेजा। उनके जहर से प्रभावित होकर बहुत सारे लोग मर गए। इस्राएल जनता ने मूसा के पास आकर कहा, ‘‘हमने ईष्वर तथा आपके विरुद्ध भुनभुनाकर पाप किया है। आप ईष्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह हमारे बीच से साँपोंको हटाए’’। मूसा ने जनता के लिए प्रभु सेप्रार्थना की। ईष्वर ने मूसा से कहा, ‘‘काँसेका एक साँप बनाओ और उसे डण्डे परलगाओ। जो साँप द्वारा काटा गया है वहउसकी ओर दृ िट डाले और वह अच्छा होजाएगा’’। मूसा ने काँसे का साँप बनवायाऔर उसे डण्डे पर लगवा दिया। जब किसीको साँप काटता था तो वह काँसे के साँप कीओर दृ िट डालकर अच्छा हो जाता था। (गणना ग्रंथ 21ः5-9)
                            काँसे का यह साँप एकचिह्न था, मुक्ति का चिह्न। यह चिह्न ईसामसीह में चरितार्थ हुआ। ‘‘मैं जब पृथ्वी केऊपर उठाया जाऊँगा तो सब मनु यों को अपनी ओर आर्क िात करूँगा’’ (योहन 12:32)। ईसा मसीह का यह कथन कलवारी

     

    दैनिक जीवन में चिह्न

                   मानव जीवन में चिह्नों का महत्वपूर्ण स्थान है।मानव निरंतर अनेक ाक्तियों के सम्पर्क में रहता है जिन्हेंवह सीधे देख, सुन, जान और महसूस न कर सकता। यहसम्पर्क कुछ माध्यमों की सहायता से ही होता है। उदाहरणके लिए, प्रेम एक अदृष्य तथ्य है; परन्तु दृष्य चिह्नों द्वाराहम प्रेम प्रकट कर सकते हैं, जैसे गले लगाकर या उपहारदेकर।
                      ठीक उसी प्रकार ताली बजाना, नाचना आदि कोखुषी एवं बधाई के चिह्नों के रूप में मान सकते हैं।सड़क संकेत और जगहों की दिषा बताने वाले फलक भी चिह्न हैं। हमारी वाणी तथा इषारे किसी अदृष्य तथ्य की ओर संकेत करने वाले चिह्न हैं। संक्षेप में, चिह्नों के बिना मानव जीवन असंभव है।

    स्वाभाविक तथा नियमित चिह्न

                            चिह्नों को दो भागों में बाँट सकते हैं: स्वाभाविकतथा नियमित चिह्न। स्वाभाविक चिह्न वे हैं जो सूचित कीगई वास्तविकता से सहज सम्बन्ध रखते हैं। उदाहरण -आग एक वास्तविकता है; धुआँ उसका चिह्न है। नियमितचिह्न वे हैं जिनका सम्बन्ध मानव की भावना से दिया गया है, जैसे रा ट्र ध्वज।

    चिह्न तथा प्रतीक

                          चिह्नों और प्रतीकों में अन्तर है। सभी प्रतीकचिह्न हैं, परन्तु सभी चिह्न प्रतीक नहीं हैं। प्रतीक वे हैंजिन्हें मानव अपनी स्वतंत्र बुद्धि से तय करता है। उदाहरण- तराजू न्याय का, जैतून की डाली लेकर उड़ने वाला कबूतर ाान्ति का और राजदण्ड राजकीय अधिकार का प्रतीक हैं।
     

    गतिविधि-1

    अलग-अलग दल बनाकरउन चिह्नों को ढँूढ निकालिए जोहमारे दैनिक जीवन में सामने आतेहैं। चिह्नों को लिख सकते हैं या
    उनका चित्रण कर सकते हैं। प्रत्येकचिह्न का अर्थ मालूम होना चाहिए।यदि दर्षक इन चिह्नों का अर्थ नहींसमझ सकते हैं, तो क्या-क्या हो
    सकते हैं - इसके बारे में कक्षा मेंचर्चा कीजिए।

    चिह्न तथा प्रतीक ईष्वर की आराधना में

                                     ईष्वर की आराधना मानव के लिए ईष्वरीय अनुभव की वेदी है। उसमें मानव ईष्वर के दर्षन तथा अनुभव करता है । अदृष्य तथा प्रभावषाली ईष्वर का अनुभव मानव कैसे कर सकताहै ? यहाँ है चिह्नों तथा प्रतीकों की प्रासंगिकता। चिह्न और प्रतीक वे माध्यम हैं जो अदृष्य ईष्वर का अनुभव करने में हमारी सहायता करते हैं।
                             ईष्वर की आराधना में औपचारिक रूप से स्वीकृत चिह्न तथा प्रतीक हमारी मुक्ति के स्वर्गीय सत्यों को सूचित करते और प्रस्तुत करते हैं। ईसा मसीह से प्राप्त अधिकार से माता कलीसिया ने जो चिह्न पवित्रात्मा के नियंत्रण तथा ाक्ति में निष्चित किए हैं वे ही पूजन विधि में प्रयुक्त हैं। वे मसीही रहस्यों का गहरा अनुभव करने मंे हमें सहायता देते हैं।

    संस्कार: चिह्न

                              संस्कार वह चिह्न है जो अदृष्य स्वर्गीय वास्तविकता को सूचित करता तथा प्रस्तुत करताहै। अदृष्य कृपावरदान संस्कारों के दृष्य चिह्नों द्वारा हमें प्राप्त होता है। इसके द्वारा हम उस मुक्ति के भागीदार बनते हैं जिसे ईसा ने अपने बलि समर्पण के द्वारा प्राप्त किया है।

    ईष्वर की आराधना के विभिन्न चिह्न

                             ईष्वर की आराधना के चिह्नों को प्रायः ाब्दों,कर्मों, वस्तुओं, स्थानों, व्यक्तियों, कलाओं एवं कालों मेंविभाजित किया गया है। ईष्वर की आराधना, विषे ाकर पवित्र बलिदान, में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए इनचिह्नों का अर्थ समझना जरूरी है

    शब्द

                              र की आराधना में सबसे अधिक प्रयुक्तचिह्न हैं ाब्द। सबसे महत्वपूर्ण वे ही हैं। सभी ाब्दप्रतीक हैं। वे विचारों को हस्तांतरित करने वाले चिह्न हैं।कर्मों के अनु ठानों का उद्देष्य तथा अर्थ ाब्द व्यक्त करते हैं।

    उदाहरण

    1. पवित्र बलिदान में हाथ धोते हुए याजक जो प्रार्थना बोलते हैं - ‘सबका प्रभु ईष्वरहमारे पापों और अपराधों का मैल अपने कृपा सागर में धो डालने की दया करे - हाथधोने का अर्थ यह प्रार्थना व्यक्त करती है।
    2. स्नान-संस्कार में स्नानार्थियों के सिर पर पानी डालते वक्त की प्रार्थना इस कर्म को संस्कार बना देती है।
     

    कर्म

                         ये हैं रीर के भिन्न-भिन्न चाल और मुद्राएँ। इनमेंप्रत्येक का अपना अर्थ भी होता है। कुछ कर्म अपनेआंतरिक मनोभावों के सूचक हो सकते हैं। उदाहरण: सिर झुकाना, हाथ फैलाना, खड़े होना, घुटने टेकना आदिविभिन्न आंतरिक भावों को सूचित करते हैं। परन्तु कुछ कर्मअन्य वस्तुओं पर केन्द्रित हैं। आषीर्वाद देना, तेल का लेपन करना, क्रूस का चिह्न बनाना, दीप जलाना आदि इसकेउदाहरण हैं।
     

    वस्तुएँ

                            ईष्वर की आराधना में प्रयुक्त वस्तुओं को दो भागोंमें विभाजित कर सकते हैं। प्रकृतिदत्त वस्तुएँ तथामनु य-निर्मित वस्तुएँ। जल, दाखरस, रोटी, तेल आदि प्रकृतिदत्त वस्तुएँ हैं। बलि वेदी, पूजा परिधान आदि मनु य निर्मित वस्तुएँ हैं।

    स्थान

                                  ईष्वर की आराधना से सम्बन्धित प्रत्येक स्थान काअपना प्रतीकात्मक अर्थ होता है। बलिवेदी (मद्बहा), वचनवेदी (बेमा), उपवेदी (बेसगस्सा), ज्ञान - स्नान कुण्ड आदि प्रत्येक स्थान अपना-अपना अर्थ सूचित करता है। 

    व्यक्ति

                                 ईष्वर की आराधना में भाग लेने वाले विष्वासियोंके समूह का हर एक व्यक्ति चिह्न है। उदाहरण: याजक ईसा मसीह के स्थान पर है; ईष्वर की आराधना में सेवा करने वाले उपयाजक स्वर्गदूतों के प्रतीक हैं।

    कलाएँ

                              ईष्वर की आराधना में कलाओं का प्रतीकात्मकअर्थ है। विभिन्न चित्रों से अलंकृत यज्ञ-मण्डप महिमामयस्वर्ग को तथा आराधना में प्रयुक्त गीत स्वर्गदूतों के स्वर्गीयसंगीतों को सूचित करते हैं।

    काल

                                 ईष्वर तथा ईष्वरीय रहस्य समय के परे हैं। परन्तु मनु य समय के अधीन हैं। इसीलिए समय के परे के ईष्वरीय रहस्यों को चिह्नों द्वारा ही समय के अंदर व्यक्त कर सकते हैं। इस प्रकार काल और इतिहास के परे के मुक्तिदायक रहस्यों को आराधना र्व ा और आराधना र्व ा के विभिन्न पर्वों द्वारा विष्वासियों के सामने कलीसिया प्रस्तुत करती है।
     
     
     
              
     
     
     
     
     
     

     

    संस्कार: चिह्न

                              संस्कार वह चिह्न है जो अदृष्य स्वर्गीय वास्तविकता को सूचित करता तथा प्रस्तुत करताहै। अदृष्य कृपावरदान संस्कारों के दृष्य चिह्नों द्वारा हमें प्राप्त होता है। इसके द्वारा हम उस मुक्ति के भागीदार बनते हैं जिसे ईसा ने अपने बलि समर्पण के द्वारा प्राप्त किया है।

    ईष्वर की आराधना के विभिन्न चिह्न

                             ईष्वर की आराधना के चिह्नों को प्रायः ाब्दों,कर्मों, वस्तुओं, स्थानों, व्यक्तियों, कलाओं एवं कालों मेंविभाजित किया गया है। ईष्वर की आराधना, विषे ाकर पवित्र बलिदान, में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए इनचिह्नों का अर्थ समझना जरूरी है

    शब्द

                              र की आराधना में सबसे अधिक प्रयुक्तचिह्न हैं ाब्द। सबसे महत्वपूर्ण वे ही हैं। सभी ाब्दप्रतीक हैं। वे विचारों को हस्तांतरित करने वाले चिह्न हैं।कर्मों के अनु ठानों का उद्देष्य तथा अर्थ ाब्द व्यक्त करते हैं।

    उदाहरण

    1. पवित्र बलिदान में हाथ धोते हुए याजक जो प्रार्थना बोलते हैं - ‘सबका प्रभु ईष्वरहमारे पापों और अपराधों का मैल अपने कृपा सागर में धो डालने की दया करे - हाथधोने का अर्थ यह प्रार्थना व्यक्त करती है।
    2. स्नान-संस्कार में स्नानार्थियों के सिर पर पानी डालते वक्त की प्रार्थना इस कर्म को संस्कार बना देती है।
     

    कर्म

                         ये हैं रीर के भिन्न-भिन्न चाल और मुद्राएँ। इनमेंप्रत्येक का अपना अर्थ भी होता है। कुछ कर्म अपनेआंतरिक मनोभावों के सूचक हो सकते हैं। उदाहरण: सिर झुकाना, हाथ फैलाना, खड़े होना, घुटने टेकना आदिविभिन्न आंतरिक भावों को सूचित करते हैं। परन्तु कुछ कर्मअन्य वस्तुओं पर केन्द्रित हैं। आषीर्वाद देना, तेल का लेपन करना, क्रूस का चिह्न बनाना, दीप जलाना आदि इसकेउदाहरण हैं।
     

    वस्तुएँ

                            ईष्वर की आराधना में प्रयुक्त वस्तुओं को दो भागोंमें विभाजित कर सकते हैं। प्रकृतिदत्त वस्तुएँ तथामनु य-निर्मित वस्तुएँ। जल, दाखरस, रोटी, तेल आदि प्रकृतिदत्त वस्तुएँ हैं। बलि वेदी, पूजा परिधान आदि मनु य निर्मित वस्तुएँ हैं।

    स्थान

                                  ईष्वर की आराधना से सम्बन्धित प्रत्येक स्थान काअपना प्रतीकात्मक अर्थ होता है। बलिवेदी (मद्बहा), वचनवेदी (बेमा), उपवेदी (बेसगस्सा), ज्ञान - स्नान कुण्ड आदि प्रत्येक स्थान अपना-अपना अर्थ सूचित करता है। 

    व्यक्ति

                                 ईष्वर की आराधना में भाग लेने वाले विष्वासियोंके समूह का हर एक व्यक्ति चिह्न है। उदाहरण: याजक ईसा मसीह के स्थान पर है; ईष्वर की आराधना में सेवा करने वाले उपयाजक स्वर्गदूतों के प्रतीक हैं।

    कलाएँ

                              ईष्वर की आराधना में कलाओं का प्रतीकात्मकअर्थ है। विभिन्न चित्रों से अलंकृत यज्ञ-मण्डप महिमामयस्वर्ग को तथा आराधना में प्रयुक्त गीत स्वर्गदूतों के स्वर्गीयसंगीतों को सूचित करते हैं।

    काल

                                 ईष्वर तथा ईष्वरीय रहस्य समय के परे हैं। परन्तु मनु य समय के अधीन हैं। इसीलिए समय के परे के ईष्वरीय रहस्यों को चिह्नों द्वारा ही समय के अंदर व्यक्त कर सकते हैं। इस प्रकार काल और इतिहास के परे के मुक्तिदायक रहस्यों को आराधना र्व ा और आराधना र्व ा के विभिन्न पर्वों द्वारा विष्वासियों के सामने कलीसिया प्रस्तुत करती है।
     
     
     
              
     
     
     
     
     
     

     

    ईष-वचन पढ़ें और मनन करें

    (प्रकाषना ग्रन्थ 4: 1-11)

    कंठस्थ करें

    ‘‘हमारे प्रभु ईष्वर, तू महिमा, सम्मान और सामथ्र्य का अधिकारी है’’।
    (प्रकाषना 4: 11)।

    हम प्रार्थना करें

    हे ईसा, आपने चिह्नों तथा प्रतीकों द्वारा अपने आपको प्रकट
    किया; पवित्र बलिदान तथा संस्कारों में सक्रिय रूप से भाग लेकर
    आपकी आराधना करने की कृपा हमें प्रदान कीजिए।

    मेरा निर्णय

    मैं गिरजाघर में तथा पवित्र वस्तुओं के साथ आदरपूर्वक व्यवहार करूँगा/गी।

    ‘‘कलीसिया के आचार्य कहते हैं

    ’’हम ईष्वर को बलि इसलिए नहीं चढ़ाते कि उसे यह आवष्यक है, वरन् इसलिए कि
    हम उसके कृपादान द्वारा धन्यवाद अर्पित करें एवं सृ िट को पवित्र करें।’’
                                                                                          (सन्त इरनेउस)